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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 121

From जैनकोष



हरिततृणांकुरचारिणि मंदा मृगशावके भवति मूर्च्छा ।

उंदरनिकरोंमाथिनि मार्जारे सैव जायेते तीव्रा ।।121।।

मूर्च्चापरिणाम की विशेषता से हिंसा और परिग्रह में विशेषता का उदाहरण―पहिले तो यह देखिये कि हिरण का बच्चा जो घास खाता है वह घास की खोज में अधिक नहीं रहता, जैसे बिल्ली चूहे को बहुत लुक छिपकर यहाँ वहाँ ढूंढ़ती फिरती है उस तरह से यह हिरण का बच्चा घास के लिये खोज नहीं करता और न उतनी आसक्ति से वह खाता है, क्योंकि थोड़ी भी आहट किसी हिंसक जीव की पाये तो उस घास को छोड़कर तुरंत भाग जाता है । बिल्ली का तो बहुत क्रूर परिणाम होता है । उसे अगर अपना खाद्य मिल जाये तो इतनी आसक्ति रहती है कि कोई उसके सिर पर लट᳭ठ भी पटके तो भी नहीं छोड़ती है । इसके अलावा इतना क्रूर परिणाम होता है बिल्ली का कि चूहे को पकड़ ले तो जल्दी खाती नहीं है, सताकर, खेलकर तोड़कर खाती है । तो यह जो भीतर में क्रूरता पड़ी हुई है उसकी उसे हिंसा लगी । उसी क्रूरता के कारण पंचेंद्रिय जीवों तक का वह बिल्ली भक्षण करती है । एक जीव दूसरे जीव को खाये तो उसे बड़ा संक्लेश परिणाम करना पड़ता है । तो तीव्र संक्लेश में भी हिंसा है और अज्ञान हो तो अज्ञान में महाहिंसा है ही । इससे जीव का वध जो करता है उसके परिणाम में अवश्य संक्लेश है, आसक्ति है इसलिये उसे हिंसा लगती है । तो जैसे हिंसा में दो भेद पड़ गये कि किसी को तीव्र हिंसा लगी, किसी को मंद हिंसा लगी । इसी प्रकार परिग्रह में भी दो भेद पड़ जाते हैं―किसी को ज्यादा मूर्छा है किसी को कम । जिसके अधिक मूर्छा है उसके अधिक पाप है और जिससे कम मूर्छा है उसके कम पाप है । मूर्छा नाम इसलिये रखा है कि उसमें बेहोशी रहती है । उसे अपनी भी कुछ सुध नहीं रहती है ꠰ परिग्रह की मूर्छा में दूसरे का तिरस्कार करे, दूसरे को नीचा गिने, अपना अहंकार बड़े, गरीबों को सताये, ऐसी अनेक बातें करनी पड़ती हैं, वह मूर्छा हैं, पर ज्ञानी जीव ऐसे परिग्रही को देखकर उस पर दया ही करता है कि देखो इसे सम्यग्ज्ञान नहीं है । इसलिए बाह्यपरिग्रह में इतनी मूर्छा लगाये हैं जो कि निःसार है । परिग्रह किसी का बनकर रहता नहीं । कुछ समय को मिला है, कुछ समय बाद समाप्त हो जायेगा लेकिन इस परिग्रह में इतनी मूर्छा रखकर यह जो इतनी बरबादी कर रहा है जिससे जन्म मरण की परंपरा बढ़ायेगा । अज्ञानी जन तो धनी को देखकर ईर्ष्या करते हैं कि मैं क्यों ऐसा न हो गया, पर ज्ञानी जीव परिग्रही को देखकर दया करता है कि देखो ज्ञान न होने से यह कितना बाह्य में फंसकर दुःखी हो रहा है । तो जिसके ममत्व परिणाम है उसको उसी प्रकार का परिग्रह है और वैसी ही हिंसा लगती है ।


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