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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 128

From जैनकोष



योऽपि न शक्यस्त्यक्तुं धनधान्यमनुष्यवास्तुवित्तादि ।

सोऽपि तनूकरणीयो निवृतिरूपं यतस्तत्त्वम् ।।128꠰।

परिग्रहपरिमाण अणुव्रत का निर्देश―यदि धन धान्य घर संपदा आदिक परिग्रह बिल्कुल छोड़े जाने में शक्य नहीं है तो ये कम तो किये ही जाने चाहिये । जितना परिग्रह सुगमता से त्याग देने में कोई कठिनाई नहीं हो उसे कम अवश्य करना चाहिये । इस परिग्रह परिमाण के प्रकरण में श्रावकों की ओर संकेत किया है । श्रावकजन घर में रहते हुए परिग्रह के सब प्रकार के त्यागी नहीं हो सकते तो सब चीजों में कमी कर लें । उन्हें जितने में संतोष हो, जितने से विकल्प न बड़े उसे निकालकर परिग्रह में कुछ कमी अवश्य करें । किसी जमाने में ऐसे लोग होते थे कि उनका नियम रहता था कि इतने का माल बिक चुकने पर हम दुकान बंद कर देंगे । सो ग्राहक यह समझ कर रोज जल्दी ही इकट्ठा हो जाते थे कि कहीं ऐसा न हो कि देर में पहुंचने से सामान न मिले । यों घंटा दो घंटा में ही उतने का माल बिक जाता था । बाकी समय दुकान बंद करके वे पूजन मंदिर दर्शन, स्वाध्याय तत्त्वचिंतन आदि में अपना समय लगाते थे । तो जिन्हें भी अपना कल्याण करना हौ उन्हें चाहिए कि वे अपने कल्याण का लक्ष्य बनायें, परिग्रहों में अपनी सामर्थ्य के अनुसार कमी करें । जो यह चाह करता है कि मेरा नाम अधिक बढ़े, मेरे वैभव अधिक हों, यों बाह्य पदार्थों की जिनके आकांक्षा लगी है वे पुरुष धर्मपालन नहीं कर सकते । बाह्य पदार्थों की इच्छा करना यह सब अनर्थों का मूल है । प्रथम तो इस जीव को सम्यक्त्व पालन करना चाहिए जिससे कि उसका चित्त स्वच्छ हो जाये । याने व्यर्थ की इच्छायें न बढ़े और अपने आपको महागर्त में न डुबायें, यह सम्यक्त्व का प्रताप है, क्योंकि सम्यक्त्व में उसे स्पष्ट भान है कि मेरा आत्मा ज्ञानमात्र है, मैं मात्र ज्ञान को ही कर सकता हूँ और ज्ञान को ही भोग सकता हूँ, ज्ञान को छोड़कर मुझमें कुछ भी करने और भोगने की सामर्थ्य नहीं है । सम्यक्त्व के ही कारण उसमें क्रोध, मान, माया, लोभादिक कषायें भी नहीं ठहर पाती हैं । वह परिग्रह में भी कमी रखता है । जो कुछ थोड़ी सी पूंजी है उसी में वह गुजारा रहा है, बाकी समय धर्मपालन में लगाता है । उसके उस छोटे व्यापार को देखकर कहीं यह शंका न करें कि वह लोभी पुरुष है और कोई पुरुष धनी है, खूब खर्च करता है अपने आराम के लिए, बढ़िया भोजन करता है तो यह न समझिये कि वह लोभी नहीं है । जो अपने विषय साधनों के लिए बहुत धन खर्च भी करता है तो भी लोभी है और कोई पुरुष परिग्रह कम रखकर थोड़े में ही गुजारा करता है अपना अधिक समय धर्मपालन में लगाता है तो वह पुरुष लोभी नहीं हैं । उद्देश्य देखना चाहिए । लोभी पुरुष बाह्य पदार्थों का संचय करने का लक्ष्य रखता है और जो लोभी नही है, वह बाह्य पदार्थों के संचय से अति दूर रहता है । यदि श्रावक अवस्था में परिग्रह का त्याग नहीं कर सकते तो उन्हें चाहिए कि अपनी शक्ति के अनुसार बहुत कम कर लें क्योंकि तत्त्व निवृत्तिरूप है । जो बाह्यपरिग्रहों को हटाता रहेगा उतनी ही उसके लिए सारभूत बात है । जो सर्वथा निवृत्ति रखते हैं वे मुनिजन हैं और जो प्रवृत्ति रखते हैं वे श्रावकजन हैं । तो अपना भाव यह रखना चाहिए कि प्रवृति से तो हटे और निवृत्ति में लगें और अपने आत्मा के निकट रहकर प्रसन्न रहा करें और शुद्ध आनंद का अनुभव कर सके ।


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