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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 132

From जैनकोष



नैवं वासरभुक्ते: भवति हि रागाधिको रजनिभुक्तौ ।

अन्नकवलस्य भुक्ते: भुक्ताविय मांसकवलस्य ।।132।꠰

हिंसा कम करने के लिये दिन भोजन त्यागकर रात्रिभोजन करने की शंका व उसका समाधान―जब रात दिन खाते रहने में रागादिक की विशेषता है और उस कारण हिंसा लग रही है तब तो यह काम करना चाहिए कि दिन के भोजन का त्याग कर लें और रात्रि में भोजन कर लिया करें । इससे दिन की हिंसा तो बच जायेगी । शंकाकार का कहने का मतलब यह है कि दिन के भोजन को त्यागकर रात्रि में भोजन ग्रहण किया करें तो उसमें सदाकाल हिंसा तो न होगी, दिन की हिंसा तो बच जायेगी, केवल रात्रि की हिंसा रह जायेगी । तो शंकाकार की इस शंका के उत्तर में आचार्य देव कहते हैं कि यह शंका ठीक नहीं है क्योंकि दिन के भोजन की अपेक्षा रात्रि के भोजन में निश्चय से रागभाव अधिक रहता है । और कुछ अनुभव करके, कुछ चिंतन करके भी आप सब समझ सकते हैं कि रात्रि के भोजन करने में । मनुष्य कितना राग करता है, कितनी आसक्ति करता है? दिन के भोजन की अपेक्षा इसमें अधिक राग है । यहाँ अंतरड्ग से जवाब दिया जा रहा है । जैसे कोई यह शंका करने लगे कि पेट ही तो भरना है । अन्न खाकर पेट भरे अथवा मांस खाकर पेट भरे, इन दोनों में कुछ भी तो अंतर नहीं है, बात एक है । तो देख लो ना, अन्न खाने में जीव को रागभाव कैसा रहता है और मांस खाने में जीव के कैसा तीव्र राग रहता है? उदर भरने की अपेक्षा से सब प्रकार के भोजन समान हैं । पर मांस खाने में रागभाव विशेष होता है क्योंकि अन्न तो सभी मनुष्यों को सहज मिल जाता है और मांस की जब बहुत अधिक इच्छा हो अथवा शरीर आदिक का बड़ा स्नेह हो तो बड़ा प्रयत्न किया जाता है तब थोड़ा मांस का भोजन प्राप्त होता है । अतएव मांस खाने में रागभाव अधिक है । तो यह रात्रिभोजन त्यागने योग्य है । इसके समाधान में दो तीन बातों पर प्रकाश डाला है । प्रथम बात तो यह है कि दिन में भोजन करने की अपेक्षा रात्रि में भोजन करने में रागभाव विशेष होता है । दूसरी बात यह आती है कि दिन में भोजन की सुलभता रहती है । रात्रि में भोजन बनाने में और प्राप्त करने में उसकी अपेक्षा कुछ कठिनाई रहती है, अत: रात्रिभोजन में रागभाव की तीव्रता रहती है, उसे त्याग देना चाहिए । तीसरी बात यह बतायी है कि रात्रि में भोजन करने में काम-वासना आदिक की विशेषता अधिक रहती है । रात्रिभोजन करने में शरीर पर और रागादिक वासना पर विशेष स्नेह है, इस कारण दिन में भोजन करने की अपेक्षा रात्रि भोजन में हिंसा विशेष है । यह तो एक भीतरी भाव का समाधान है । इसमें द्रव्यहिंसा की बात अभी तक नहीं कही है । अब द्रव्य हिंसा की ओर से समाधान दे रहे हैं ।


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  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
  • प्रवचन
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