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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 141

From जैनकोष



पापद्धिजयपराजयसंगरपरदारगमनचौर्याद्याः ।

न कदाचनापि चिंत्या: पापफलं केवलं यस्मात् ।।141꠰꠰

अनर्थदंडव्रतनामक तृतीयशली की सविधि निष्पाद्यता―धर्मपालन में अहिंसा की मुख्यता है । जहां अहिंसा है वहाँ धर्म है और जहाँ हिंसा है वहाँ अधर्म है । अहिंसा नाम है आत्मा में रागद्वेषादिक विकारपरिणाम न होने का और आत्मा में रागादिक परिणाम हों उसका नाम हिंसा है । तो अहिंसा की सिद्धि में सर्वप्रथम यह बताया कि समस्त परिग्रहों का परित्याग करके अपने आत्मा में ज्ञानबल बढ़ाकर निर्ग्रंथ मुनि होकर आत्मध्यान करे तो वहाँ अहिंसाव्रत है, लेकिन जो ऐसा करने में समर्थ नहीं हैं, गृहस्थजन हैं वे घर में रहकर अणुव्रत का पालन करें और 7 शीलों का नियम लें । अणुव्रत में पहिला है अहिंसा अणुव्रत, दूसरा है सत्याणुव्रत तीसरा है अचौर्याणुव्रत, चौथा है ब्रह्मचर्याणुव्रत और 5वां है परिग्रहपरिमाण अणुव्रत । इन पांचों में यह लक्ष्य कराया है कि अपना परिमाण रागद्वेष से रहित बनावें, संकल्प विकल्प से अपने को जुदा रखें, जितना संकल्प विकल्प से जुदा रखें उतना ही अहिंसा का पालन है । इन 5 अणुव्रतों की रक्षा के लिए इसमें और अतिशय गुण उत्पन्न करने के लिए 7 शील बताये हैं । 3 गुणव्रत और 4 शिक्षाव्रत । तीन में पहिला है दिग्व्रत । अपने जीवनपर्यंत चार दिशावों में कुछ क्षेत्र की मर्यादा लेकर अपना संबंध रखना, फिर उससे बाहर के समस्त आरंभ परिग्रहों का परित्याग करना, इसका नाम दिग्व्रत है । फिर दिग्व्रत की मर्यादा के भीतर ही थोड़ा क्षेत्र घटाकर नियम करे उसे देशव्रत कहते हैं । जैसे दशलक्षणी के दिनों में मैं इस नगर से बाहर न जाऊंगा, फिर ऐसा नियम बनाकर बाहरी व्यापार तक का भी त्याग किया जाता है । प्रयोजन यह है कि उपयोग कुछ समय भटके नहीं, उपयोग थोड़े क्षेत्र में रहे जिससे हम अपने आत्मकल्याण की साधना बना सके, तीसरा है अनर्थदंड व्रत । जिन कामों से करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं है फिर भी बहुत किये जाते हैं तो उन कामों को छोड़ दें । बिना प्रयोजन यदि कामों में पाप का प्रारंभ है उनका त्याग देना सो अनर्थ दंड विरति व्रत है । ऐसा अनर्थदंड विरति व्रत होता है वहाँ अपना लाभ नहीं है । दूसरे का दिल दुखाना, अपना परिणाम बिगाड़ना उनमें अनर्थ (निष्प्रयोजन) दंड (पाप) होता है उनका त्याग करना अनर्थदंडव्रत है ।

अनर्थदंडव्रत के प्रकार और उनमें से अपध्याननामक अनर्थदंडव्रत का वर्णन―ये सब 5 प्रकार के अनर्थदंड परिणाम होते हैं । वे 5 क्या हैं, प्रथम तो अपध्यान दूसरा पापोपदेश, तीसरा प्रमादचर्या, चौथा हिंसादान और 5वां दुश्रुति । इनका वर्णन आगे कर रहे हैं । इनसे अपना काम कुछ नहीं होता । उनका त्याग करें । अपध्यान में ऐसे ध्यानों को बताया है जो अनर्थ हैं निष्प्रयोजन हैं और महापापों का आरंभ है, अपना कोई फायदा नहीं । जैसे कुछ लोगों की शिकार खेलने की प्रवृत्ति होती है, उन शिकार के कामों से लाभ कुछ नहीं है पाप विशेष है । इनका ध्यान छोड़ना चाहिए । इसी प्रकार जय पराजय इसकी हार हो इसकी जीत हो, जैसे जब भी तीतर या मुर्गा लोग लड़ाते हैं तो ऐसा ही छांट लेते हैं कि इसकी हार हो इसकी जीत हो, इससे प्रयोजन कुछ नहीं है, पर लोग जिसे अपना प्यारा मान लेते हैं उसकी जीत चाहते हैं और जो प्यारा नहीं है उसकी हार चाहते हैं । तो यह अपध्यान है । अपध्यान उसे कहते हैं जिसमें अपना लाभ कुछ नहीं और पाप का बंध होता है । किसी की जीत विचारना और किसी की हार विचारना यह अपध्यान है । किसी की लड़ाई का ध्यान करना, पर स्त्री के संबंध में खोटे चिंतन करना अपध्यान है, इसी प्रकार झूठ बोलना, झूठे उपदेश देना, किसी को फंसाना आदिक जो अनेक खोटे चिंतन हैं उनका नाम अपध्यान है, क्योंकि इस अपध्यान में केवल पाप का फल है, आत्मा की कोई सिद्धि नहीं है । सो जो गृहस्थजन है, जिन्होंने व्रत धारण किया है, अपनी उन्नति जो चाहते हैं वे ऐसे अपध्यान नहीं करते । दूसरा अनर्थदंड है पापोपदेश । इसका लक्षण कह रहे हैं ।


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