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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 152

From जैनकोष



उपवासं गृह्णीयान्ममत्वमपहाय देहादी ।।152।।

प्रोषधसमय में आरंभत्यागपूर्वक उपवास ग्रहण करने का उपदेश―समस्त आरंभों से मुक्त होकर शरीर आदिक में आत्मबुद्धि को त्यागकर उपवास के दिन के एक दिन पहिले मध्याह्न में उपवास अंगीकार करें । मतलब यह है कि सप्तमी को दोपहर में आहार करने के बाद उपवास का नियम लेना चाहिए और उपवास के समय समस्त आरंभों को छोड़ दें, अब जैसे घर गृहस्थी के काम रोज-रोज करते हैं तो 8 दिन में एक दिन घर के काम छोड़कर धर्मध्यान में रहना चाहिए, इसलिए आठैं चौदस में उपवास बताया है और शरीर का ममत्व तजकर उपवास करना चाहिए । असली चीज तो शरीर में ममत्व त्यागने की बात है । जहाँ शरीर में ममता है वहाँ धर्म रंच भी नहीं लगता क्योंकि ममता में एक बड़ा अज्ञान बसा है । जब शरीर से ममता तजे तब धर्म शुरू होता है । शरीर से निराला ज्ञान मात्र मैं हूँ ऐसी सुध ले तो धर्मपालन वहाँ से शुरू होता है । सो आरंभ छोड़कर देह में ममता का त्याग करें फिर उपवास के पहिले दिन याने सप्तमी और त्रयोदशी के दिन मध्याह्न में उपवास का नियम करना चाहिए । उपवास के मायने खाली आहार का त्याग नहीं है । विषय कषाय आरंभ व्यापार आदिक में सब प्रकार की प्रवृत्तियों का परित्याग होता है वह उपवास कहलाता है । उपवास का अर्थ है―उप मायने समीप और वास मायने बसना, केवल अपने आत्मा के निकट बैठना इसका नाम है उपवास । कोई आहार का तो त्याग कर दे और आत्मा में संक्लेश मच रहा है वह तो उपवास न कहलायेगा । वहाँ तो विषय कषाय और आहार तीनों का त्याग हो तो वह उपवास कहलाता है ꠰ हाँ, उस लंघन करने से एक यह फायदा होता है कि स्वास्थ्य ठीक हो जाता है पर मोक्षमार्ग की बात उससे नहीं बनती ।


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