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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 154

From जैनकोष



धर्मध्यानासुक्तां वासरमतिबाह्य विहितसांध्यविधिम् ।

शुचिसंस्तरे त्रियामां गमयेत्स्वाध्यायजितनिद्र: ।।154꠰꠰

समता की वृद्धि के लिये प्रोषधोपवास का निधान―श्रावक के बारह व्रतों में चार शिक्षाव्रत हैं―सामायिक प्रोषधोपवास, भोगोपभोगपरिमाण और अतिथि संविभाग । शिक्षाव्रत उसे कहते हैं जिससे मुनि व्रत की शिक्षा मिले । तो हमें इसका स्वरूप इस पद्धति से जानना चाहिए कि इस व्रत से हमें मुनिधर्म की शिक्षा मिलती है । सामायिक में तो स्पष्ट है समता का परिणाम । मुनि समता के पुंज होते हैं । तो हम अहर्निश समता नहीं धारण कर सकते हैं इसलिए तीन समय हमारे लिए सामायिक के बताये गए हैं और वह सामायिक 6-6 घंटे बाद बताया है । जैसे कि प्राय: सुबह के काल में 6 बजे, दोपहर को 12 बजे और शाम को फिर 6 बजे । मुनियों के तो निरंतर सामायिक रहती है पर गृहस्थों को 6-6 घंटे बाद तीन बार सामायिक बतलायी है । सामायिक में मुनि शिक्षा तो है ही, पर प्रोषधोपवास में मुनि शिक्षा रखना हो तो प्रोषधोपवास इस विधि से करें कि सप्तमी को प्रथम वेला में आहार लेकर फिर नवमी को सिर्फ एक बार आहार लें । इस पद्धति में 3 दिन मुनि जैसी आहार वेला हो गई । जैसे लोग कहने लगते कि सप्तमी की शाम को खाये, अष्टमी को न खाये तो यह उपवास हो जायेगा, पर शिक्षाव्रत न होगा । उसका कारण यह है कि मुनिजन प्रतिदिन एक बार ही आहार लेते हैं । एक बार आहार लेवें, शाम को पानी न लें इस तरह लें तो शिक्षाव्रत हैं । सप्तमी को दोपहर के भोजन के बाद त्याग कर दे, अष्टमी को चाहे भोजन ले-ले पर शाम को न लें, नौमी को शाम को न लें तो भी शिक्षाव्रत है मगर 7वीं 9वीं के शाम को व्रत ले-ले तो उपवास रहेगा । तो प्रोषधोपवास में लक्ष्य यह बताया है कि जो सामायिक व्रत अंगीकार किया है वह समता का संस्कार बढ़ाने के लिए है और उसे घर में उस समय न रहना चाहिए । जब से उसने आहार का त्याग किया तब से उसने घर छोड़ा मंदिर में अथवा कहीं भी एकांत में रहें तो जो आश्रयभूत साधन हैं रागद्वेष के वे उसने हटायें, एक तो वह कारण हुआ जिससे उसे क्षमता की स्थिति मिल गई । दूसरे आरंभ मौर व्यापार का भी त्याग किया तो उससे भी उसे समता में सहायता मिली और फिर कुछ अनशनों में व्रतों में ऐसा प्रभाव है कि ज्ञानदृष्टि हो किसी के तो उसे क्षमता में सहायता मिलती है । खाली शरीर को आहार न देना इतने पर ही दृष्टि हो तो वह समता नहीं कर सकता, उसे तो नाना विकल्प उत्पन्न हो जायेंगे ।

दृष्टि का शरण्यभूत विषय―मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए उस स्वभाव का जो स्वभाव स्वयं साम्यरस से भरा हैं । आत्मा में जो एक स्वभाव है, प्रत्येक पदार्थ में एक स्वभाव होता है । तो आत्मा में जो एक स्वभाव है उसे हम चैतन्यस्वभाव से जाने । चैतन्यस्वभाव स्वयं समता रस से भरपूर है, उस स्वरूपसत् में विकार नहीं हैं । चैतन्य में विकार उत्पन्न होते हैं तो पर प्रकृति का निमित्त पाकर अपनी ही योग्यता से, अपनी कमजोरी से होते हैं । विकार निमित्त चीज है, अगर निमित चीज न हो तो सदाकाल विकार आत्मा में रहना चाहिए । निमित्त है तभी तो उस विकार का विनाश होता है । अब इस प्रसंग में विशेष बात जानने की है कि लोग हर बात में निमित्तनैमित्तिक कह देते हैं, पर ये दो बातें हैं निमित्त और आश्रय । निमित्त केवल कर्म की स्थिति है, अन्य पदार्थ निमित्त नहीं कहलाते । हमारे रागद्वेषादिक भाव के होने में ये पदार्थ निमित्त नहीं कहलाते, ये आश्रयभूत हैं और निमित्त है तो केवल कर्म की परिस्थिति । कर्म दो प्रकार के हैं―द्रव्यकर्म और भावकर्म । भावकर्म तो स्वयं विकार हैं । वे भावकर्म कैसे उत्पन्न होते हैं? तो निमित्तभूत कर्म का उदय पाने पर आत्मा में चूंकि ऐसी योग्यता है तो यह विभावपरिणमन को परिणमाने वाले पदार्थ की ऐसी कला है कि निमित पा करके विभावरूप परिणम जाये । जैसे हम आप लोग यहां बैठे हैं तो आश्रय तो यह पृथ्वी है मगर इस पृथ्वी की कला नहीं है जो हम यहाँ बैठे है । वह केवल निमित्तमात्र है । यह हम आपकी कला है जो अपनी शक्ति से इस रूप बैठ गए हैं । तो यह परिणमने वाले की कला है कि निमित्त का सन्निधान पाकर विभावरूप परिणम जाता है । आश्रय ने अथवा निमित्त ने परद्रव्यों में कुछ किया नहीं, क्योंकि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सबका अपना-अपना अलग-अलग है । आत्मा का चतुष्टय आत्मा में है, पुद्गल का चतुष्टय पुद᳭गल में है । सो आत्मा में शाश्वत परमार्थ तत्त्व की दृष्टि करना चाहिये ।

ज्ञानी की अंतस्तत्त्वस्पर्शोंमुखी उद᳭भावना―ज्ञानी पुरुष यद्यपि सब जान गया है―ज्ञान का काम जान लेना । निमित्त का क्या योग है? उपादान का क्या योग है, यह सब समझ गया । सब कुछ समझ कर भी जो रागद्वेष होते हैं हम आपके ये कुछ काल तक श्रेणी में भी चलते हैं तो इस प्रसंग में कुछ ऐसी भी अपने को दृष्टि लगानी चाहिए थोड़ासा भाव बनाकर कि जिस क्षण पदार्थ में उनका कुछ ज्ञान नहीं है लेकिन निमित्तनैमित्तिक संबंध बराबर है । जैसे अग्नि का निमित्त पाकर जल गर्म हो गया तो न अग्नि को खबर है, न जल को । दोनों ही एकेंद्रिय हैं यह बात अलग है मगर ऐसा ज्ञान जल नहीं कर रहा कि मैं अग्नि के पास हूँ, मुझे गर्म हो जाना चाहिए और न अग्नि को यह ज्ञान है कि जल मेरे निकट आ गया है, मुझे इसको गरम करना चाहिए । तो जैसे जड़ पदार्थ में परस्पर का निमित्तनैमित्तिक भाव होता रहता है इसी प्रकार आत्मा में ज्ञानगुण का तो विकार होता नहीं है । विकार होता है तो जो चेतन गुण नहीं हैं उनमें होता है । एक दृष्टि है, तो आत्मा में जो विकार हुआ है, चारित्र गुण में विकार हुआ है, श्रद्धागुण में विकार हुआ है, दोनों गुणों में विकार होता है । जो अज्ञानी जीव है उसके श्रद्धागुण में भी विकार है और जो ज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष है उसकी श्रद्धा में विकार नहीं है पर चारित्रगुण में विकार चलता रहता है । अब सोचिये जैसे जड़ पदार्थों में परस्पर में निमित्तनैमित्तिक भाव है, क्योंकि वह अपने में चेतने का काम नहीं रखता है, इसी प्रकार से रागद्वेष जिस शक्ति से उठा है वह शक्ति चेतने का काम नहीं करती । उसे समझ लीजिए भावदृष्टि में कि वह गुण जड़ है । जैसे अकलंक देव ने कहा है कि आत्मा चैतन्य चेतनात्मक है, प्रमेयत्व की दृष्टि से अचेतन है और ज्ञान की दृष्टि से चेतन है तो एक ही आत्मा में भेदविवक्षा करके चेतन और अचेतन गुण को देखने लगिये तो रागद्वेष जिस शक्ति से उठते हैं वे अचेतन हैं, चेतने का काम नहीं करते । तो जो चेतने का काम नहीं करते ऐसे गुण और प्रकृति का उदय इन दोनों का ऐसा निमित्तनैमित्तिक संबंध चल रहा है, उसमें ज्ञान क्या करना, ज्ञान तो जान रहा है और जानते हुए भी उस समय ऐसा ही निमित्तनैमित्तिक योग है कि रागद्वेषरूप भी परिणम रहा है, उसे बचा नहीं पाता और यह जीव रागद्वेष से अपने को बचा भी पाता है तो ज्ञान बल से बचा पाता है । ज्ञानबल में जो रागद्वेष रहित विशुद्धता है वह जब तक कम है तब तक जीव विवश है और विभावरूप परिणम जाता है । यों जब स्वभाव चतुष्टय से निरखते हैं तो आत्मा के जितने भी विभाव बने, यह आत्मा खुद ऐसा निमित्त पाकर आश्रय पाकर स्वयं विभावरूप परिणम जाता है, निर्मित नहीं परिणमता, विभाव रूप न अपने से कोई क्रिया निकलकर विभावरूप चलती हैं ।

निमित्तनैमित्तिक योग्यव्यवस्था―निमित्तनैमित्तिक ऐसा योग है, हम हर जगह देखते हैं इसी कारण हमें निमित्तों का ज्ञान है । जैसे रसोई बनाते हैं तो झट यह ज्ञान कर लेते हैं कि रोटी आटे से बनेगी । कभी ऐसा तो नहीं सोचने लगते कि कहो आज आटे से न बनकर धूल से बने । तो निमित्त का सन्निधान पाकर यह क्रिया हुई । हमें कैसे मालूम पड़े कि इस कार्य के न होने में यह निमित्त है ऐसा केवल समझने के लिए निमित्त कहा जाता है । जिस समय निमित्त के रहने पर भी कोई विभावरूप कार्य नहीं होता तो समझना चाहिये कि या तो परिणमने वाले की योग्यता में अंतर है या समझना चाहिये कि अभी निमित्त कलापूर्ण नहीं उपस्थित हुआ । निमित्त होने पर भी, आग सामने रहने पर अगर पानी गर्म न हो तो सोचना चाहिये कि कोई प्रतिबंध पदार्थ सामने है या निमित्तभूत पदार्थ अपनी सही हालत में नहीं है या जल इतना ठंडा हो गया कि उतना सन्निधान पाकर वह गर्म न हो सके ? अगर निमित्त कलाप सही हालत में हैं, प्रतिबंधक कारण का अभाव है, उपादान भी उस योग्यता वाला है तो कार्य हो ही जाता है । प्रश्न यहां यह है कि निमित्त का सन्निधान या अग्नि का सन्निधान पाकर भी यदि जल गरम न हो तो अग्नि को निमित कहना चाहिये अथवा नहीं? उत्तर यह है कि वह अग्नि निमित्तभूत तो कहलायेगी पर निमित्त कलाप नहीं है यह कहा जायेगा । एक अंश है निमित्त का, पूरा योग नहीं मिला है इसीलिये वहाँ कार्य नहीं हुआ और नहीं कार्य हुआ तो भी जल के गर्म होने के लिए अग्नि तो निमित्त हुआ ही करती है, पर जल की योग्यता में कुछ अंतर है इसलिये गर्म नहीं हुआ । निर्णय में तो यह माना जायेगा अन्यथा लोग पानी गरम करना चाहें तो अग्नि को फिर कैसे लायेंगे? अगर उनकी बुद्धि में यह न बसा हो कि अग्नि पानी के गर्म होने में निमित्त है तो उसे कैसे लायेंगे? मालूम है इसलिये लाते ई पर कार्य होने में ये तीन बातें जानना चाहिये―उपादान की योग्यता, प्रतिबंधक का अभाव और निमित्तभूत पदार्थ की समूहता । जैसे आत्मा में रागद्वेष का कार्य हुआ तो प्रथम तो आत्मा में ऐसी योग्यता होनी चाहिए जो कि विभावरूप परिणम सके । जो आत्मा ऐसा नहीं है, जैसे साधुजन हैं तो प्रथम तो उनके निमित्त भी नहीं है, कर्म का उदय निमित्त होता है, प्रत्याख्यान कषाय का उनके पापोपशम है, प्रथम तो निमित्त नहीं है, दूसरे―पावनमात्र निमित्त रह गया संज्वलनकषाय संबंधी तो चूंकि वे आश्रय से दूर हैं और उन्होंने अपने उपयोग को विशुद्ध बनाने के लिए कुछ शुभ आश्रय लिया है, इस स्थिति में उनके रागद्वेष नहीं होता है । तो उत्पादन की योग्यता न हो तो रागद्वेष नहीं होते हें । जिसमें रागद्वेष होने की योग्यता है उसके लिए कर्मोंदय तो निमित्त है और शेष कर्मों को छोड़कर जितने पदार्थ हैं वे सब आश्रय हैं । तो उन आश्रयों को पाकर निमित्त के सन्निधान में विभावरूप कार्य होता है । यह कार्य होने की पद्धति है । मुनि जनों का जितना कषाय का उदय है, अंतरंग निमित्त है, संज्वलनकषाय का निमित्त पाकर उनके भी उसके अनुकूल कषाय उत्पन्न होती हैं पर उनके कषायों में मंदता आयी है । मुनिजनों के कषायें तब जगती हैं जब शिष्य जन प्रतिकूल व्यवहार करते हैं । शिष्यों को शिक्षा दीक्षा आदिक देने में मुनिजनों के कषायें जग सकती हैं तो यह निमित्तनैमित्तिकभाव भी एक अटल प्रक्रिया है? पर लोग निमित्तनैमित्तिकभाव को इस कारण से नहीं सिद्ध करना चाहते कि अगर हम निमित्तनैमित्तिकभाव मान लेंगे तो वस्तु की स्वतंत्रता नष्ट हो जायेगी, लेकिन ऐसे प्रबल ज्ञान रखना चाहिए कि निमित्तनैमित्तिक संबंध भी बराबर मानते रहे और वस्तु की स्वतंत्रता भी पूरी तौर से दिखती रहे―ये दोनों बातें नजर आ सके तौ समझो कि हमने वस्तुरूप के बारे में जानकारी की ।

समता संस्कारवृद्धि के लिए व्रतों का योग―इस प्रकरण में समता का संस्कार बनाने के लिए ये व्रत बताये जा रहे हैं इसी प्रकार मुनियों का भी व्रत समता का संस्कार बनाने के लिये हैं । कभी कोई पुरुष बाहर से द्रव्यलिंग धारण करले तो मुनिभेष धारण करने मात्र से कर्म कहीं डरते नहीं कि इसने मुनि भेष लिया है, हमें बंधना न चाहिये । चूंकि उसके अंतरंग में विभावपरिणाम हैं सो कर्मबंध होगा ही । कषायें न होना यह योग्यता पर निर्भर है, भेष पर नहीं । यह बात बिल्कुल सत्य है कि मुनि भेष लेकर भी अगर अनंतानुबंधी कषायें उठ रही हैं तो वह मुनि पद के विरुद्ध बात नहीं है । धर्मपालन के लिए जिसने अपनी कमर कसी है और वास्तव में वह अध्यात्म प्रेमी हुआ है तो उसे इस देह में ममता है ही नहीं, फिर भी आहार आदिक आवश्यक हैं, तो उसके पुण्य का इतना उदय है कि उसे आहार का योग मिल ही जायेगा पर अध्यात्म प्रेमी साधु अपने आपमें कुछ चिंताएँ रखे इस संबंध में तो उस चिंता से तो उसका पुण्यरस घटा । अध्यात्म प्रेमी कहाँ रहा? अगर कोई बड़ी दृढ़ता से अध्यात्म का प्रेमी हो जाये, कुछ फिकर न करे तो उसको योग मिल जायेगा । केवल अध्यात्म दृढ़ता है सो बात नहीं है, अध्यात्म से प्रेम भी है, चिगता भी है तो ऐसी स्थिति में, उसके विडंबना है जिसे कि व्यवहार में रत रहने वाला कहते हैं । वह दूसरों पर शासन करने में, उनकी व्यवस्था करने में ही अपना समय लगाता है, बल्कि संघ में रहने वाले अन्य साधुजन अपना नित्यकर्म करते रहते हैं, उनको तो लाभ है पर वह उनकी व्यवस्था करने में ही लगा रहता है उसे कुछ लाभ नहीं मिल पाता है । यह मुनिव्रत तो बहुत बड़ी खड़ग की धार है । इसमें यदि समता भाव है तो वह मुनि है और नहीं है भाव तो वह मुनि नहीं है । मुनिजन ज्ञान साम्राज्य के पुंज होते हैं, उनके किसी में राग अथवा किसी में द्वेष नहीं होता है । कोई शिष्य बड़े संयम से व स्नेह से रहता हो और वह उससे अलग हो जाये तो भी उस साधु के बैरभाव नहीं होता । किसी की रागद्वेषयुक्त बातें सुनने का भी उसके चित्त में चाव नहीं रहता । मुनिधर्म बहुत ऊंचा धर्म है, इसलिए इस मुनि धर्म को परमेष्ठियों में शामिल किया है । इस मुनिधर्म में कितनी उत्कृष्टता होनी चाहिए सो समझ लीजिए । यदि इसके विरुद्ध आचरण है, श्रावकों से भी उसके अधिक कषायें जगें तो करणानुयोग में बताया है कि ऐसा मुनि वास्तव में मुनि नहीं है ꠰

विभावानुत्पत्तिरूप अहिंसा की सिद्धि के लिए व्रतोप्रयोग―विभाव परिणामों का निमित्त होगा तो कर्मबंध हो जायेगा । विभाव परिणाम भी जड़वत् हैं और कर्म भी जड़वत् हैं, तो जड़-जड़ का निमित्तनैमित्तिक अडोल रहता है वहाँ संबंध होता ही है । तो विभाव परिणाम जब उत्पन्न होता है तो कर्मबंध होता है इसलिए अपना यत्न होना चाहिये भेद विज्ञान का कि मुझमें रागद्वेष संस्कार न बढ़े, अपने इस उपयोग का अधिकाधिक यत्न करना चाहिए क्योंकि रागद्वेष मोह हटने में ही अहिंसा है । जितने भी व्रतों का पालन है वह अहिंसा की सिद्धि के लिए है ꠰ अहिंसा कहो या समतापरिणाम कहो, दोनों का एक ही भाव है ꠰ अपने आपकी अंहिसा की सिद्धि के लिए सारे यम नियम हैं । उपदेश करना, उपदेश सुनना, चर्चा करना ये सभी कार्य इसलिए किए जाते हैं कि मेरा अपने ज्ञानस्वभाव से प्रेम हो, मेरे में रागद्वेषादिक विकारों की उत्पत्ति न हो । हम अपने ज्ञानस्वभाव को निरखेंगे तो रागद्वेष आदिक विकार न होंगे । परपदार्थों में दृष्टि लगने से तो इष्ट अनिष्ट की बुद्धि होगी ꠰ दो भाई बैठे हैं अगर उनमें से एक की ओर अधिक आकर्षण होता है तो समझिये कि यहाँ रागद्वेष की उत्पत्ति है । बस यही से ये रागद्वेष उत्पन्न होते हैं तो ये रागद्वेष न उत्पन्न हो, इसका मूल उपाय यह है कि हम अपने अनादिअनंत अहेतुक असाधारण चैतन्यस्वरूप का आश्रय ले । मैं चित्स्वरूप हूं । अपने स्वरूप की दृष्टि न छोड़े तो रागद्वेष न हों । रागद्वेष होते हैं परपदार्थों का आश्रय लेने से । जो अपने आपके स्वभाव का आश्रय लेता है उसके संकट दूर होते हैं । जो अपने स्वभाव का आश्रय न लेकर परपदार्थों का आश्रय लेता है उसके रागद्वेष होते ही हैं ।

आत्महितप्रेरणा में अनुयोगों का सहयोग―विभाव से निवृत्त होने के लिये चरणानुयोग भी बहुत साधक है । जिस-जिस आश्रय को लेकर रागद्वेष विभाव परिणाम अवश्य होते हैं उस उसका परिहार कर दिया जाये तो ये रागद्वेष दूर हो जायेंगे । यही इस चरणानुयोग का लक्ष्य है । द्रव्यानुयोग का यह लक्ष्य है कि आत्मतत्त्व व अनात्मतत्त्व का परिज्ञान करके अनात्मतत्त्व से उपयोग हटाकर आत्मतत्त्व में उपयोग को स्थिर करें । करणानुयोग वस्तु के स्वरूप का चिंतन कराने का लक्ष्य करता है । देखिये जब हम जानते हैं कि यह लोक कितना बड़ा है? एक जंबूद्वीप एक लाख योजन की सूची वाला है, उसके पास का लवण समुद्र उससे दूना है उसके बाद का उससे दूना है, ऐसे-ऐसे असंख्याते द्वीपसमुद्र हैं । अब समझ लीजिए कि कितना बड़ा विस्तार हो गया? यह सब विस्तार अभी एक राजू भी नहीं पूरा हुआ, ऐसे-ऐसे एक राजू लंबे चौड़े मोटे विस्तार में जितना घेरा बने उसे एक घनराजू कहते हैं । ऐसा 343 घनराजू प्रमाण लोक है । यों लोक के विस्तार पर जब हम दृष्टि देते हैं तो इसके अंदर यह जीव उत्पन्न हो जाता है कि इतने बड़े लोक में कोई प्रदेश ऐसा नहीं बचा जहाँ हम अनंत बार जन्म मरण न कर चुके हों । तो इस छोटे से क्षेत्र में जहां हम आप जन्मे हैं वह क्या चीज है? ये सभी चीजें विघट जायेंगी, कितने दिनों का यह समागम है? यह अवसर्पिणी काल है, इससे पहिले उत्सर्पिणी काल गुजर गया । ऐसे-ऐसे अनेक काल व्यतीत हो गये । अनंतकाल के सामने यह 100-50 वर्ष का समय क्या कीमत रखता है? यहाँ जो भी समागम आज मिले हुए हैं वे क्या कीमत रखते हैं? तो उनसे रागभाव हटाना है । करणानुयोग के ज्ञान का लक्ष्य बताता है कि उन समागमों हमें कुछ भी लाभ नहीं मिलता है । जीव अनंतानंत हैं । जिनमें से अनंत जीव मोक्ष चले गये हैं फिर भी यह सिद्धांत है कि जितने मुक्त जीव हैं उनसे अनंत गुने संसारी जीव हैं । इन अनंत जीवों में से कोई दो चार जीव आज अपने परिवार में आ गये हैं तो कौनसी बड़ी बात है? ये न आते और आते तो क्या यह न हो सकता था? तो इन जीवों का किसी से कुछ संबंध नहीं । यहाँ कोई किसी का नहीं लगता । यहाँ अपनी बुद्धि फंसाने में कुछ भी लाभ नही है ꠰ तो यों हमें सभी अनुयोगों से ज्ञान वैराग्य का शिक्षण लेना चाहिए यह प्रोषधोपवास अणुव्रती श्रावक का प्रकरण है । प्रोषधोपवासी श्रावक को सुबह शाम और दोपहर तीन बार सामायिक करना चाहिये, पठन पाठन में व एकांतस्थान में बैठकर धर्मसाधन करने में अधिक समय लगाना चाहिये । इससे हम आप भी यह शिक्षा लें कि ऐसे ही आचरण को हम आप अपनाये तो अपने को कल्याण का मार्ग मिलेगा ।


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