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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 162

From जैनकोष



एकमपि प्रजिघांसुार्निहंत्यनंतांयतस्ततोऽवश्यम् ।

करणीयमशेषाणां परिहरणमनंतकायानाम् ।।162।।

समस्त अनंतकार्यों के परिहार के आजीवन नियम की अनिवार्यता―अगर एक भी साधारण कंदमूल आदिक का घात करने की इच्छा करे तो उसने अनंत जीवों की हिंसा कर ली । तब अनंत कायों का तो पूरा ही त्याग करना चाहिये । उन हरियों में भी जो अनंतकाय है―एक फल के आश्रित अनंत जीव बसते हैं ऐसे अनंतकायों का तो परित्याग अवश्य करना चाहिये, फिर जो अनंतकाय नहीं है, जिन में असंख्यात जीवों का विनाश है उसकी फिर सीमा लेवें । कोई भोग की सीमा में ऐसा नियम कर ले कि हम आलू या और और चीजें इतनी रखेंगे, इससे अधिक का त्याग है तो वह श्रावक के लिये उचित नहीं है। कंदमूल आदि का त्याग तो सबसे पहिले करना चाहिये । फिर जिसमें असंख्यात काय हैं ऐसी हरी का नियम करे । हम इतनी हरी लेंगे । पहिले बड़ा पाप छोड़ने का प्रयत्न करे फिर छोटा पाप छोड़ने का प्रयत्न करे, आचरण में ऐसा बताया गया है । जिसमें त्रस जीवों की हिंसा होती है उसका तो सर्वथा त्याग ऐसा पुरुष कर ही देता है । जैसे बाजार का दही, मर्यादा से बाहर की चीजें, गोभी का फूल―इनका तो त्याग सर्वथा ही करता है, फिर अनंत का परित्याग करे जहाँ असंख्यात जीवों का विनाश है । ऐसा नियम ले कि इतने फलों के अलावा शेष फलों का हमारा परित्याग है। इस प्रकार भोगोपभोग के साधनों का प्रमाण करने वाला पुरुष अहिंसाव्रत का पालन करता है । इससे भी भाव की विशेषता अपनी बनाएं । जितने भी नियम किये जा रहे हैं उन सब नियमों का पालन करते हुये अपने को मंदकषायरूप रखना, यह अतीव आवश्यक है । अपने में कषायों की तीव्रता न जगे ऐसा प्रयत्न जरूर रखें, क्योंकि कषाय हुई तो वही हिंसा है । अपनी हिंसा कर ली, दूसरे की हिंसा नहीं की । दूसरे की हिंसा तो हो जाती है निमित्तनैमित्तिक विधि से ꠰ सो उसके मूल में चूंकि भावहिंसा बसी है, संकल्प विकल्प बसे हैं इसीलिये हिंसा है, । वास्तव में यह जीव अपने परिणाम खोटे बनाकर अपनी हिंसा करता है । तो इस हिंसा से बचने के लिये हम बाह्य में चरणानुयोग के अनुसार अपना व्रत पालन करें और निश्चय से अपने उस कारणसमयसार चैतन्यस्वभाव की दृष्टि रखकर हम स्वभाव के परमब्रह्म की उपासना करें ꠰ अपने अविकारी भाव की उपासना करने से पर्याय भी अविकारी बन जायेगी, इस कारण अपना जैसा ज्ञानानंदस्वरूप है ऐसा अविकारी चैतन्यमात्र अपने को प्रतीति करें और नियमों का पालन करते हुए धर्मध्यान में अपना समय व्यतीत करें ꠰


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