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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 47

From जैनकोष



यस्मात्सकषाय: सन हंत्यात्मा प्रथममात्मनात्मानम् ।

पश्चाज्जायेत न वा हिंसा प्राण्यंतराणां तु ꠰꠰47।।

हिंसक जीव के आत्मघात की निश्चितता―चूंकि जीवकषाय सहित होता हुआ सबसे पहिले अपने ही द्वारा अपने ही आत्मा को घातता है । जब कषाय जगी तब इसका स्वरूप दब गया तो इसको हिंसा हो गई । हिंसा शब्द का अर्थ घात करना है, प्राण का व्यपरोपण करना है लेकिन आत्मस्वरूप की खबर ले, अपने आपके उस सहज चैतन्यस्वरूप को दृष्टि में ले तो यहाँ हिंसा न होगी । हिंसा शब्द का अर्थ घात करना है, पर वह घात करना दौ तरह से होता हे । एक तो अपने भावों का घात । अपना जो शुद्धस्वभाव है, चैतन्यस्वरूप है उसका घात हुआ और फिर अपने शरीर में जो इंद्रियां हैं निमित्त तो वह हैं और उन इंद्रियों का घात है । इस कारण यह मानें कि जहाँ आत्मघात नहीं ऐसा शुद्ध स्वच्छ जो ज्ञानोपयोग का कार्य है सो अहिंसा है ꠰ ऐसे खोटे परिणाम से अपने आपका घात तो तुरंत होता है, दूसरे का आयुकर्म विशेष है, न हो सके उसका घात पर परिणाम से पहिले खुद में हिंसा का पाप तो लग ही गया । जो हिंसा से बचना चाहता हो उसे यत्न करना चाहिए कि मेरे में दुर्भाव न पैदा हों ।


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  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
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