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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 53

From जैनकोष



एकस्य सैव तीव्रं दिशति फलं सैव मंदमंयस्य ।

ब्रजति सहकारिणोरपि हिंसा वैचित्र्यमत्र फलकाले ꠰।53꠰꠰

एक साथ की जाने वाली हिंसा में भी हिंसकों में तीव्र मंद फल की भाजनता―चूंकि परिणामों से ही हिंसा मानी गयी है इस कारण यह भी एक विचित्रता हो जाती है । दो पुरुषों ने मिलकर कोई हिंसा का काम किया, पर परिणाम उनके उनमें हुए । कषायों की तीव्रता के अनुसार, उन्हें फल जुदा-जुदा मिलेगा । दो आदमी मिलकर किसी एक आदमी का दिल दुखायें तो बाहर में तो एक सा ही काम हुआ पर उन दोनों में जिसके परिणाम अधिक क्रूर होंगे उसको हिंसा विशेष लगेगी । उसे आगे फल अधिक भोगना होगा और चित्त में ज्यादा क्रूरता नहीं है तो हिंसा कम लगेगी । तो इससे यह बात सिद्ध हुई कि जिसका जैसा परिणाम है उसको वैसा फल मिलता है ।


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  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
  • प्रवचन
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