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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 70

From जैनकोष



स्वयमेव विगलितं यो गृह्णीयाद्वा छलेन मधुगोलात् ।

तत्रापि भवति हिंसा तदाश्रयप्राणिनां घातात् ।।70।।

स्वयं विगलित मधु के भक्षण में भी हिंसा―अब कुछ लोग इस तरह से भी शहद तैयार करते हैं कि एक डिब्बा बनाया, उसमें मधु मक्खियां बसाई और नीचे शहद अपने आप गिरता है । तो उसमें भी अनेक छोटे-छोटे जीव मर जाते हैं । कोई शंकाकार यह कहता है कि शहद के छत्ते को निचोड़ा न जाये, उसमें डिब्बासा बनाकर मधुमक्खियों को बसा लिया जाये और फिर शहद को नीचे टपका लिया जाये तो उसमें दोष न लगना चाहिए? कहते हैं―नहीं, ऐसी बात नहीं है, उसमें भी जीव राशि उत्पन्न होती रहती है, उसका भक्षण करने से जीव मर जाते हैं, अत: विवेकी पुरुष शहद का भक्षण नहीं करते ।


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  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
  • प्रवचन
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