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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 87

From जैनकोष



उपलब्धिसुगतसाधनसमाधिसारस्थ भूयसोऽभ्यासात् ।

स्वगुरो: शिष्येण शिरो न कर्तनीयं सुधर्ममभिलाषिता ।।87।।

समाधिस्थ गुरु को मार डालने से ये उच्च पद प्राप्त कर लेंगे इस आशय से सिर काट डालने का कुतर्क और उसका समाधान―एक कुतर्की पुरुष ऐसा विचार कर रहा है कि ये गुरु महाराज, ये योगीश्वर बहुत काल से समाधि का अभ्यास करते आ रहे हैं उस अभ्यास में इनके समाधि भी प्राप्त हो रही है और ये समाधि में मग्न हो रहे हैं, ऐसे समय में इन गुरुराज का यदि प्राणांत कर दिया जाये तो ये बहुत ऊंची गति प्राप्त कर लेंगे, ऐसा मिथ्याश्रद्धान करके कहीं गुरुओं का शिर मत काट देना । अहिंसा के बारे में बहुत-बहुत तरह के विचार उठा रहे हैं । देखिये उन गुरुराज ने जो कुछ साधना की है उसके फल में वे अपने आप निकट भविष्य में उच्च पद प्राप्त करेंगे, फल पायेंगे । ऐसे समय में उनकें शिर का छेदन कर देने से उनका उपयोग बदल सकता है, समाधि भंग हो सकती है । दुर्गति में चले गए तो उन्हें क्या लाभ पहुंचाया दूसरे जो प्राणघात करता है वह खुद हिंसा का भागी होगा । यह तो पाप बंध ही करेगा । अहिंसा है अपने आपके विशुद्ध चिदानंदस्वरूप के दर्शन करने में उसमें ही अपना उपयोग स्थिर रखने में । ऐसा कोई गुरु यदि कर रहा हो तो अपनी समाधि के प्रताप से ही वह शरीर से मुक्त हो जायेगा । वह तो पथ की बात है पर कोई किसी का सिर छेदन कर दे तो उसमें न हिंसक का भला है और न जिसकी हिंसा की गई1 उसका भला है । हिंसा और अहिंसा तो परिणामों पर निर्भर है, यदि विषय-कषायों से भरे हैं, पांच प्रकार के पापों से भरे हैं तो हिंसा है और इनसे विरक्त होकर एक अपने आपमें सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र के उपयोगरूप रहेंगे तो यहाँ है अहिंसा और भी कुतर्कियों का कुतर्क सुनिये ।


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  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
  • प्रवचन
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