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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 89

From जैनकोष



दृष्ट᳭वापरं पुरस्तादशनाय क्षामकुक्षिमायांतम् ।

निजमांसदानरभासादालभनीयो न चात्मापि ꠰꠰89।꠰

देखिये एक दयालु बन करके अपनी बात रख रहे हैं । यह अज्ञानी जीव कहता है कि कोई मांस भक्षण करने वाला पुरुष मांस की याचना करने आये उसे मांस दे दो । यदि अपने शरीर का मांस काटकर देना भी पड़े तो दे देना चाहिये । यह दान है यह अहिंसा है―ऐसा मानता है वह अज्ञानी पुरुष । आचार्यदेव कहते हैं कि यह भी बहुत बड़ा भूल भरा ख्याल है । एक तो जो मांस की याचना करे कि मुझे मांस दे दो, ऐसी याचना करने वाला पुरुष पापी है, दान का पात्र नहीं है, उसकी बात सुनना काबिल नहीं है, दूसरे मांस का दान देना यह शास्त्र में नही बताया है, धर्म से बहिर्भूत काम है । तीसरी बात यह है कि जिसने अपने आपका घात किया, अपना मांस निकाला, अपने को संक्लिष्ट बनाया वह तो स्वयं पाप कर रहा है । ऐसे प्रसंग में कोई मांस की भिक्षा चाहे और यह दया में आकर अपने शरीर का मांस दे दे तो ये सारी विडंबना की बातें हैं ।

मांसभक्षी पुरुष की क्षुधा मेटने लिये अपने देह का मांस दान करने का कुतर्क और उसका समाधान―जो याचना करने वाला है वह भी पापी है और जो मांस-खंडन का दान करने वाला है वह भी पापी है । अहिंसा के प्रसंग में मुख्य तो यह बताया है कि भाई सर्वपापों से रहित सर्वविकारों से परे जो अपने आप वह सहजशुद्ध चैतन्यस्वरूप हैं, जो परमात्मतत्व है, जो समस्त आकुलताओं से परे है, परमहितरूप है ऐसे इस अंतस्तत्त्व के, कारणपरमात्मतत्त्व के इस समयसार के दर्शन करिये और इसमें ही उपयोग लगाकर आत्मीय आनंद अमृतरस का पान करते रहिये । यह एक परम अहिंसा की बात है । ऐसी मूल में बात रखकर फिर चूंकि व्यवहारीजन हैं, एक इस भव में पड़े हैं, गृहस्थावस्था में हैं, भूख प्यास की वेदना नहीं सह सकते । तो ऐसे व्यवहार में रहने वाले जीवों को क्या उपदेश किया जाये जिससे उनके यह पात्रता बनी रहे कि वे इस कारण समयसार का जब चाहे दर्शन कर सकें और मोक्षमार्ग से भ्रष्ट न हो सकें, ऐसी दया करके आचार्य महाराज श्रावकधर्म का व्याख्यान कर रहे हैं । श्रावक का आचरण कैसा होना चाहिये? अहिंसा की पूर्ति वाला उनका आचरण होना चाहिये । जब एक अहिंसा की प्राप्ति की उद्देश्य बनाया है तो जब-जब व्यवहार में हों तब-तब हमारा ऐसा व्यवहार हो जो अहिंसा के प्रतिकूल न हो । इसी कारण बात यहाँ मे प्रारंभ की है कि सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि मद्य मांस मधु और पंच उदंबर फल इनका त्याग होना ही चाहिए । इसके बाद फिर कुछ ऐसे कुतर्कों का खंडन किया है जो लोग मानते हैं और अपने धर्म से च्युत होते हैं । वे समझते हैं कि हमने धर्म का पालन किया, जैसे देवतावों को बलि चढ़ाना, अतिथियों को मांस खिलाना, दुःखी जीवों को मार डालना, सुखी जीवों को मार देना, समाधि में मग्न हुए को मार देना, ऐसी अनेक बातों में जो भ्रमवश धर्म मानते हैं और अपने पर दूसरों पर अन्याय करते हैं उनका समाधान किया है कि इस प्रकार अपने को उन खोटे विचारों से बचना चाहिये और परम अहिंसा भाव में आना चाहिये । इस तरह कुछ कुतर्कों का खंडन करते हुए यहाँ तक बहुत सी बातें आचार्यदेव ने बताई कि अहिंसा व्रत चाहने वाले को अपना कैसा व्यवहार रखना चाहिये, कैसी प्रवृत्ति रखना चाहिए? एक बात खास यह है कि अपना यह भाव आना चाहिए कि मेरा हित कैसे हो? इस दुनिया में मुझे कुछ नहीं जताना है, मुझे कुछ नहीं बनना है, कोई मेरी बात मान जाये, इससे मुझे कुछ नहीं मिलता । मेरा हित कैसे हो? इन कर्मों से प्रेरे गए संसार में भ्रमण करने वाले इस मुझ दीन संसारी पर्यायों में रहने वाले का हित कैसे हो? मूल में यह बात रखें, बाहर की और सब विडंबनाओं को छोड़े । यह बात चित्त में रहेगी तो सर्व संपत्तियां प्राप्त होंगी और संपन्नता रहेगी । श्रोता वही वास्तविक हैं जिसके चित्त में यह भाव हो कि मेरे आत्मा का हित कैसे हो? मुझे तो उसी उपदेश को सुनना है कि चैतन्यस्वरूप क्या है और उसमें मुझे कैसी दृष्टि लगानी चाहिये? मैं अपने उपयोग को कहां ले जाऊं जिससे मेरे आत्मा का हित हो । आत्मा का हित हो वही वास्तविक अहिंसा है, वही निर्विकल्प रहने का उपाय है । तो निर्विकल्प रहने का उपाय आचार्यदेव बतला रहे हैं, हमें उस उपाय से चलना चाहिये आर अपनी हित-साधना करनी चाहिये ।


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