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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 91

From जैनकोष



तदिदं प्रमादयोगादसदभिधान विधीयते किमपि ।

यदनृतमपि विज्ञेयं तद᳭भेदा: संति चत्वार: ꠰꠰91।।

असत्य का मौलिक स्वरूप और असत्य के भेद―जैसे हिंसा नामक पाप तो हिंसा है ही, पर झूठ बोलना, चोरी करना, कुशील सेवन करना, परिग्रह में बुद्धि रखना, संचय करना जैसे सब पाप भी हिंसा पाप हैं । लोगों को प्रकृति भेद बताने के लिये 5 भेद बताये हैं, वस्तुत: ये पांचों पाप हिंसा हैं, क्योंकि आत्मा के परिणामों की हिंसा इन पाप कार्यों में होती है । तो हिंसा का वर्णन करके अब यह झूठ नामक पाप का वर्णन चल रहा है कि कुछ भी परिणाम कषाय के योग से जो एक और पर की हानि करें ऐसे जो वचन बोले जायें वे झूठ समझना और वह झूठ बोलने नामक पाप के 4 भेद बताये गये हैं । मुख्य बात तो जैसे कि अन्य लोगों ने भी कहा है कि 18 पुराणों में सारभूत बात क्या है कि परोपकार पुण्य के लिये हैं और पर-पीड़ा पाप के लिए है, थोड़ा उसमें यह और मिला लीजिए कि अपना और पर का उपकार यह तो पवित्र है, धर्मरूप है और अपने और पराये दोनों का नुकसान पहुंचाना यह पापरूप है । जिस वचन में अपनी भी हानि है, दूसरे की भी हानि है वे वचन असत्य कहे जाते हैं । असत्य शब्द का अर्थ है जो सत्य नहीं है । असत्य बोलने वाला कितना घातक है, कितना अविश्वासी है, कितना धोखा देने वाला है? इस संबंध में सभी को अनुभव होगा । यों समझिये कि असत्यवादी भी घात करने वाले शिकारी जनों से कम नहीं है । अनेक प्रसंग आपने सुने होंगे, देखे होंगे अथवा अनुभव किया होगा कि किसी एक के असत्य बोलने से प्राणों पर क्या गुजरती है । जो लोग झूठी गवाही देते हैं, दूसरे की झूठ बात बोलते हैं, निंदा करते हैं उनका हृदय कितना क्रूर होता है और ऐसे क्रूर पुरुष में धर्म समा सकता हो, इसकी संभावना कौन कर सकता है । क्रूर चित्त में धर्म की बात उस तरह नहीं समाती जिस तरह माला के टेढ़े छिद्र वाले दाने में सूत नहीं पिरोया जा सकता । जिनका हृदय टेढ़ा हो गया है, कपटी हो गया है, मायाचार से भरा हुआ है अतएव क्रूर हो गया है ऐसे पुरुष हृदय में धर्म नहीं समा सकता । असत्यवादियों में ये बातें प्रकृत्या आ जाती है । झूठ बोलने वाला क्रूर होता है, मायाचार परिणाम से भरा हुआ होता है, हठी होता है, दुराग्रही होता है, ऐसे पुरुष में धर्म वासना नहीं आ सकती । वह पुरुष अपनी हिंसा किए जा रहा है । भगवान कारणसमयसार अरहंत सिद्ध की तरह अनंतचतुष्टय का धनी वह स्वयं है । इसकी हिंसा हो रही है, बरबादी हो रही है । अनुचित वचन भी हिंसा है, इसके चार भेद बताये जा रहे हैं जिनका लक्षण आगे कहेंगे । चार भेद यों समझिये कि चीज तो है नहीं और है कह देवे, यह पहिला झूठ है । चीज तो है और नहीं है ऐसा कह देवे, यह दूसरा झूठ है । चीज तो और कुछ हे, बताना और कुछ, यह तीसरा झूठ है और चौथा झूठ है जो वचन निंद्य हों, पापोपदेशक हों, और अप्रिय हों वे भी असत्य हैं और यह असत्य चौथे प्रकार का है । इसमें अब पहिले प्रकार के असत्य की परिभाषा करते हैं ।


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