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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 94

From जैनकोष



वस्तु सदपि स्वरूपात् पररूपेणाभिधीयते यस्मिन् ।

अनृतमिदं च तृतीयं विज्ञयं गौरिति यथाश्व: ।।94꠰꠰

मिथ्यावचन नामक तृतीय असत्यवचन―जिस रूप से जो चीज विद्यमान है उसे अन्य रूप से विद्यमान कहना सो तीसरा असत्य है । जैसे बैल को घोड़ा कहना, मनुष्य को पशु कहना, पशु को मनुष्य कहना और सिद्धांत में चलो तो इसके तो अनेक दृष्टांत हैं । ईश्वर है, पर वह किमात्मक है, किस स्वरूप से है उस स्वरूपसे-वर्णन न करके अन्य स्वरूप से वर्णन करना । ईश्वर हम को सुख देता है, दु:ख देता है, हमें बाल बच्चे देता है, हमें खाना देता है, बोलते जावो और वास्तव में ईश्वर है कैसा? अपने अनंतज्ञान, अनंत दर्शन, अनंतशक्ति, अनंत आनंद में मग्न है, वह निर्विकल्प हैं । किसी पर विकल्प में आता ही नहीं, विशुद्ध है, आनंद की मूर्ति है, परम पावन है । किंतु इसके विपरीत उसे अनेक प्रकार से बता देना यह क्या है? यह मिथ्यावचन है । है किसी भांति और माने और भांति, यही असत्य है ।

मूल में सत्य होकर भी व्यवहार में प्रसिद्ध विपरीतता के कारण मिथ्यावचन की उपपत्ति―कभी-कभी कोई बात मूल में अलंकारिक रूप से कहे जाने पर भी उसका रूप यथार्थ रहता है, सत्य रहता है, पर आशय मलिन होने से धीरे-धीरे बही बात अन्य रूप से मान ली जाती है तो वह असत्य बन जाती है । जैसे देवी देवताओं का जो आदि रूप है, जब शुरू हुआ होगा उन देवी देवताओं का रूप उस समय लोग यथार्थ मानते होंगे ढंग से और धीरे-धीरे उस मर्म का पता न रहा वैसे अन्य रूप में मानने लगे तो वह असत्य हो गया । दृष्टांत के लिये सरस्वती की मूर्ति लीजिये । तालाब में कमल पर एक सरस्वती बैठी है, जिसके चार हाथ हैं, एक हाथ में वीणा लिये हैं, एक हाथ में माला लिए है, एक हाथ में पुस्तक लिए है और एक हाथ में शंख लिए है, पास में हंस बैठा है । ऐसी ही तो मूर्ति की प्रसिद्धि है ना । लोग इसी रूप में मानते हैं कि हां ऐसी कोई देवी होती है, उसके ऐसे चार हाथ होते हैं, इस ढंग से रहती है, पर मूल में जिस समय में यह रूप शुरू किया होगा कविजनों ने, उस समय उसका सही रूप था और वह अलंकार रूप में था । सरस्वती उसे कहते हैं जिसका बहुत बड़ा विस्तार हो । सबसे बड़ा विस्तार है विद्या का, ज्ञान का । ज्ञान और विद्या के बराबर किसी भी चीज का विस्तार नहीं होता । उससे बढ़कर फैला हुआ क्या हो सकता है? ज्ञान लोकालोक में फैल सकता है । क्या कोई पदार्थ ऐसा है जो ज्ञान के बराबर फैल सके तो सरस्वती नाम विद्या का है जिसका बहुत बड़ा भारी फैलाव होता है । बस उस फैलाव को तालाब के रूप में अलंकार में रखा, क्योंकि तालाब भी फैला हुआ होता है । और सर: तालाब का भी नाम है । यह एक संकेत है, विद्या का अधिक फैलाव होता है । चूंकि विद्या शब्द स्त्रीलिंग है इसलिए उसे देवी के रूप में उपस्थित किया । समस्त विद्या चार अनुयोगों में आती है, परमार्थत: कोई भी निरूपणा चार अनुयोगों से बाहर नहीं है । वे चार अनुयोग उस विद्यारूप के चार हाथ रूप में किए गये हैं । चार अनुयोगमयी वह विद्या है और उस विद्या की साधना का उपाय जिससे विद्या के मर्म तक हम पहुंच जायें, एक ध्यान है । उसका संकेत मिलता है माला से । एक अनाहद ध्वनि है । एक गंभीर स्वर से उच्चारण करना यह भी अपने आप तक पहुंचाने में एक कारण है । उसका प्रतीक शंख है । पुस्तक द्वारा अध्ययन होता है उस विद्या का, तो पुस्तक है एक हाथ में । और भीतरी स्वर द्वारा भी परिणामों में एक उज्जवलता आती है और उस विद्या के स्वरूप को समझने की सामर्थ्य बनती है तो उसका प्रतीक वीणा है । ऐसी विद्या का उपासक भव्य जीव होता है । जो स्वच्छ हृदय वाला है, जो विशुद्ध व्यवहार रखता है, विशुद्ध वचन व्यवहार रखता है उस विशुद्ध भव्य का प्रतीक है हंस, जो उस सरस्वती की ओर टकटकी लगाये बैठा है । तो एक अलंकाररूप में प्रतीक था यह चित्रण जिसने कि विद्या का सही रूप में पहुंचाया है अब यहाँ देख रहे हैं लोक यों कि ऐसी देवी होती, है, उसका नाम लेकर मंत्र पढ़ें तो वह सिद्ध हो जाती है । ऐसे हाथ हैं उसके इत्यादि । तो पदार्थ हो और प्रकार और बताया जाये और प्रकार तो यह तीसरा असत्य कहा गया है ।

असत्य संभाषण से अनर्थ―असत्य संभाषण में असत्यभाषी का परिणाम तो बिगड़ा ही है अतएव उसे हिंसा होती ही है, पर असत्य संभाषण से दूसरे जीवों का भी अनर्थ हो जाता है, अतएव उसे द्रव्यहिंसा भी लगी । उसमें स्व और पर दोनों का अनुपकार है । इस प्रकरण में हम यह शिक्षा ग्रहण करें कि ऐसा झूठ बोलने से कोई प्रयोजन तो सिद्ध नहीं होता और मान लो कल्पनावश कोई प्रयोजन वर्तमान में सिद्ध भी होता हो तो उसे सिद्ध न समझिये । असत्य संभाषण से जो पाप का बंध होता है उस पाप के उदयकाल में उससे बीसों गुना अनर्थ होने वाला है । जैसे हम आप थोड़ासा समझ लेते हैं कि असत्य बोलने से हम को यह लाभ होता है तो लाभ नहीं होता, उससे बीसों गुना अनर्थ होगा, अलाभ होगा, नुकसान होगा । लाभ भी असत्य से नहीं होता है, केवल एक कल्पना कर लेते हैं लोग । जो लोग झूठ बोलकर भी व्यापार करते हैं, है किसी भाव की चीज और बोलते हैं और भाव की, वे भी यह समझाने की कोशिश करते हैं कि जो हम कह रहे हैं सो सच कह रहे हैं । तो ग्राहक ने जो चीज खरीदी है वह सोच समझकर ही खरीदी है । अगर वह समझ जाये कि व्यापारी असत्य बोल रहा है तो वह चीज न खरीदेगा । तो व्यापारी का यह भी कोरा भ्रम है कि असत्य संभाषण से लाभ होता है । अरे लाभ तो पुण्य के अनुसार है । असत्य संभाषण करके तो लाभ में कमी की । और भी बरबादी की ओर ढलना शुरू हो गया । असत्य संभाषण से रहित जीवन हो तो देखिये कितनी प्रसन्नता रहती है । असत्य स्वयं हिंसा है, अतएव असत्य संभाषण न करके अपने आप में विराजमान अंत: कारण समयसार परमात्मतत्व की हमें रक्षा करनी चाहिये ।


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