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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 101

From जैनकोष



कंदं मूलं बीयं पुप्फं पत्तादि किंचि सच्चित्तं ।

असिऊण माणगव्वे भमिओसि अणंतसंसारे ।।101।।

(386) कंद मूल आदि सचित्त भक्षण के फल में संसारभ्रमण―हे जीव ! तूने अपनी मान्यता के घमंड में आकर कंद मूल बीज पुष्प पत्र आदि सचित्त पदार्थों को खाकर अनंत संसार में भ्रमण किया है । देहबुद्धि होने से घमंड बनता है । घमंड आने से एक तरह का शौक बनता है और जैसा चाहे खाने की प्रवृत्ति बन जाती है । सो गर्ववश अनेक प्रकार के अभक्ष्य पदार्थ खाये । अनेक सन्यासी जन मात्र कंद मूल खाकर ही अपने को धर्मिष्ठ समझते हैं सो यहाँ यह जानना कि इसमें तप तो क्या किंतु हिंसा का दोष लगता है । साधुवों को तो स्वयं कोई आरंभ का काम करना ही न चाहिये ।

(387) पंच प्रकार के अभक्ष्य―अभक्ष्य 5 तरह के बताये गए है―(1) एक तो वे अभक्ष्य जिन में त्रस जीवों का घात होता है जैसे गोभी का फूल, बाजार की जलेबी, बाजार की सड़ी गली चीजें, और ये अचार मुरब्बा, इनमें त्रस जीव का घात है । तो इनमें एक ख्याल दिला रहे हैं गोभी के फूल का । वह तो छूने लायक भी नहीं है, खरीदने की बात तो दूर जाने दो । गोभी के फूल में बहुत कीट होते हैं, बड़े भी होते हैं, छोटे भी होते हैं, तो उनको जब बनाया छौंका तो वे सब जीव उसी में भुरता हो गए, मांस बन गया । गोभी के फूल में मांस का साक्षात् दोष है, वह ग्रहण करने लायक वस्तु नहीं है । (2) दूसरा अभक्ष्य बताया अनंत स्थावरघात―जैसे सूरन, लहसुन, प्याज, मूली, गाजर आदि ये सब अनंत स्थावर घात वाले पदार्थ हैं, ये अभक्ष्य है, मगर इनसे अधिक अभक्ष्य त्रसघात वाले हैं । तो इतना खुद सोच लो की अगर कोई गोभी का फूल खाता हो तो उसे छोड़ देना चाहिए, क्योंकि उसमें साक्षात् मांस का दोष आता है । रही यह बात कि अच्छा लगता है तो उसकी भी बात सुनो―एक बार हमने गोभी का फूल खाने वाले एक भाई से पूछा की बताओ गोभी फूल का स्वाद कैसा होता है? तो उसने बहुत-बहुत बताने की कोशिश की, पर सही-सही न बता सका । उसने बताया कि गोभी के फूल में यों तो कोई स्वाद नहीं होता, हां मिर्च मसाले आदि पड़ जाने से उसमें विशेष स्वाद तो ऐसा समझो जैसे कि बाजरे के पेड़ में ऊपरी भाग में जो एक डंठलसा होता उसको यदि आग में भूना जाये तो उसमें गोभी के फूल जैसे अंश निकलते हैं, उनको खाने में जो स्वाद आता वैसा ही स्वाद गोभी के फूल का होता है । याने जैसे उसमें एक भुरभुरासा स्वाद होता, ठीक वैसा ही स्वाद गोभी के फूले में होता । गोभी के फूल में खुद में कुछ स्वाद नहीं । अच्छा मान लो गोभी के फूल में स्वाद हो तो भी उसे न खाना चाहिये । उसमें त्रस जीवों का घात है । अंडा और मांस की तरह ही अभक्ष्य इस गोभी के फूल को भी समझो । कोई अच्छी तरह निरखे तो मालूम पड़ेगा । कुछ तो होते हैं त्रसघात वाले अभक्ष्य और कुछ होते हैं अनंत स्थावरघात वाले अभक्ष्य (3) कुछ भक्ष्य अनिष्ट कहलाते हैं । चीज शुद्ध है, उसमें कोई दोष नहीं, मगर किसी को खांसी आ रही है खूब तेज, तो चाहे कैसी ही शुद्ध बर्फी हो, उसे अभक्ष्य बताया है । किसी के बुखार चढ़ रहा हो तो चाहे कैसा ही शुद्ध पकवान हो उसके लिए अभक्ष्य है इसे कहते हैं अनिष्ट अभक्ष्य । (4) एक होता है प्रमाद (नशा) उत्पन्न करने वाला अभक्ष्य और (5) एक होता है अनुपसेव्य । जिससे कुछ नुक्सान भी न हो फिर भी सज्जन पुरुष उसका सेवन न कर सके, जैसे मूत्र पशुओं का या गाय का मूत्र । एक बार तो हमने सुना कि जो आज अपने नाम के पूर्व भगवान लगाते हैं उन्होंने खुद लोगों को औषधि बतायी कि तुम लोग अपना-अपना मूत्र पियो । अब कैसी क्या कब तक बात थी सो पता नहीं, तो यह अनुपसेव्य चीज है । लार-मुख से जो लार गिरती है, तत्काल की लार में कोई दोष नहीं न कोई जीवहिंसा है, मगर उसे कोई खा सकता है क्या? अरे वह तो अभक्ष्य है । ऐसे 5 प्रकार के अभक्ष्य होते हैं । तो जो गर्व में आकर छककर अभक्ष्य सेवन करता है वह इस संसार में परिभ्रमण करता है ।


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