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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 109

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सेवहि चउविहलिंगं अब्भंतरलिंग सुद्धिमावण्णो ।

बाहिरलिंगमकज्जं होइ फुड भावरहियाणं ।।109।।

(409) अंतरंगशुद्धि को प्राप्त करते हुए बाह्यलिंग के धारण की कार्यकारिता―यह श्रीमत्कुंदकुंदाचार्य द्वारा रचित भावपाहुड़ ग्रंथ है । यहाँ मुनिजनों को संबोधित किया है । जो मुनिजनों को संबोधित किया है उसके अनुसार श्रावकजन भी अपने योग्य संबोधन समझ सकते हैं । हे मुनिजनों अंतरंग लिंग की शुद्धि को प्राप्त होते हुए तुम बाह्य लिंग का सेवन करो, क्योंकि भावरहित मुनियों का बाह्यलिंग अकार्य होता है । अंतरंग लिंग क्या? सम्यग्दर्शन में जो मार्ग दिखा उस पर चलना । सम्यग्दर्शन में तो मोक्षमार्ग का देखना होता है और पंचम और ऊपर के गुणस्थान में मोक्षमार्ग पर चलना होता है, मोक्षमार्ग जिनको दिखा उनको इतनी शुद्धि है चित्त में कि देख लेने में भी निर्जरा होती है फिर मोक्षमार्ग पर जो चलते हैं उनके विशेषतया निर्जरा होती है ।

(410) मोक्षमार्गदर्शन व मोक्षमार्गगमन के तथ्य का दृष्टांतपूर्वक विवरण―जैसे कोई पुरुष किसी जंगल में फंस गया, टीले पर पहुंच गया तो जरा भी विवेक करता है तो वहीं ठहर जाता है अचानक अंधेरी रात्रि में । सो जंगल में फंसा है तो वह सोचता है कि अब आगे बढ़ना योग्य नहीं । उसको रात्रि में बिजली की चमक में सामने कुछ ही दूरी पर सड़क नजर आ गई अब फिर वही अंधेरा । सड़क पर चल तो नहीं पा रहा मगर वह सड़क है, वहाँ चलना है इतनी समझ आने पर उसको धीरता आ गई और जैसे ही सवेरा हुआ, मौका मिला कि वह सड़क पर चढ़कर आगे बढ़ जाता । तो मिथ्यात्व वन में घूमते हुए इस प्राणी को एक सम्यग्दर्शन का प्रकाश मिला और उस प्रकाश में इसको मार्ग दिख गया यह है सहज आत्मस्वरूप और इसमें मग्न होना यह ही है मोक्षमार्ग पर चलना, पर अभी अप्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय में वह इतना निर्बल है कि उस अनुभव में नहीं आ पा रहा । कभी-कभी स्पर्श तो होता है, पर उसमें रमे यह बात नहीं बन पाती । तो ऐसे एक उसके स्पर्श से या उस सहज शुद्ध आत्मस्वरूप के दर्शन से उसको धीरता है और अनेक प्रकृतियों का संवर बना है और निर्जरण भी चलता रहता है ।

(411) सम्यक्त्वशून्य बाह्यव्रत में मोक्षमार्गस्थता का अभाव―जिसने अपने उस शुद्ध आत्मस्वरूप को नहीं निरखा और ज्ञानी पुरुषों का मुनिपद आदिक देखकर इतना भी भाव से भी चित्त में आया हो कि मुनि होना चाहिए, हो गए मुनि तो ऐसे मुनिजनों को यहाँ प्रतिबोधा है कि आभ्यंतर लिंग की शुद्धि को प्राप्त करते हुए इस बाह्य लिंग का सेवन करो । मुक्ति मिलती है शुद्ध अंतस्तत्त्व के आश्रय से । और शुद्ध अंतस्तत्त्व का चिर आश्रय कर सके यह बात मिलती है बाह्य परिग्रह के त्यागने जैसे वातावरण में, इस कारण बाह्य निर्ग्रंथ भेष बिना यह आत्मा सिद्धि न पायेगा, तिस पर भी मुक्ति जो मिली है सो उपादान कारण पर दृष्टि दें, क्योंकि वही सिद्ध हुआ है ना, तो शुद्ध अंतस्तत्त्व के आश्रय से ही मुक्ति मिली है । जिसे कहेंगे कि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र के भाव से सिद्धि मिली है, पर वह भाव बाह्य परिग्रह के त्याग वाली मुद्रा में आये बिना नहीं बन सकता ꠰ तो इस बाह्य भेष में गुजरकर ही वह अंतरड्ग शुद्धि प्राप्त होती है जिससे मुक्ति मिलती है? और इसी कारण दोनों बातों का सिद्धांत में उपदेश है कि अंतरंग शुद्धि बनाओ और उसको प्राप्त होते हुए बाह्य लिंग का सेवन करो तो मुक्ति प्राप्त होगी । अंतरंग शुद्धि बिना, सम्यग्दर्शन की लब्धि बिना बाह्य लिंग अकार्य होता है । बाह्य लिंगों में मुख्य क्या है जो लोगों को तुरंत दिखे? एक तो नग्नता, दूसरा केशलोच और तीसरा पिछी कमंडल । जो तुरंत ही नजर आता है । यह जो बाह्य लिंग है सो इसमें रहते हुए अपनी शुद्धि की ओर प्रगति करो । ऐसा मुनिजनों को इस गाथा में उपदेश किया है ।


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