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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 115

From जैनकोष



मिच्छत्त तह कसायाऽसंजमजोगेहिं असुहलेसेहिं ।

बंधइ असुहं कम्मं जिणवयणपरम्मुहो जीवो ।।115।।

(445) एकांत व विपरीत मिथ्यात्व में जीव के विभ्रमपना―जो जिनेंद्रवचन से परान्मुख है ऐसा जीव मिथ्यात्व, कषाय, असंयम योग और अशुभ लेश्यावों के द्वारा अशुभकर्म का बंध करता है । मिथ्यात्व 5 प्रकार के कहे गए हैं सो मिथ्यात्व भाव तो वह एक ही है, पर आस्रव भेद से 5 भेद बताये । एकांतमिथ्यात्व―वस्तुस्वरूप की जानकारी स्याद्वाद से होती है, और स्याद्वाद को छोड़कर किसी एक नय के एकांत से अपनी श्रद्धा बनाना, आस्था बनाना यह एकांत मिथ्यात्व है । वस्तु द्रव्यपर्यायात्मक है, शाश्वत कोई रहता है उस ही में तो परिणमन चलता है । परिणमन होते रहना यह वस्तु का स्वरूप है । परिणमन बिना वस्तुत्व नहीं रहता इसलिए इन दो में से किसी एक की अभेद कल्पना करे तो दूसरे का अभाव स्वयं बन जाता है । उस पर्यायात्मक वस्तु में एक को न मानकर किसी एक के ही एकांत में जो कुछ बुद्धि बने वह एकांत मिथ्यात्व है (2) विपरीतमिथ्यात्व―वस्तु है और प्रकार, और आस्था हो रही और प्रकार तो यह विपरीतमिथ्यात्व है ।

(446) स्याद्वाद का सहारा छोड़ने से एकांतादि मिथ्यात्वों का पालन पोषण―स्याद्वाद के अंतस्तत्त्व को न जानकर और उसका सहारा न लेने से यह सब मिथ्यात्व बन जाता है । जिसे एक स्थूल रूप से बताया ही है । सप्रतिपक्ष अस्तित्व बताया है । जैसे घट और पट ये शब्द अधिक प्रयोग में आते हैं आर इसके साथ ही एक शब्द चलता है रज्जु मायने रस्सी ये तीन शब्द घट, पट और रज्जु अधिक मिलेंगे जैन दर्शन में, इनका क्रमश: अर्थ है―घड़ा, कपड़ा और रस्सी । देखिये पहले जमाने में अक्सर करके ऐसा होता था कि लोग जब मुसाफिरी के लिए घर से बाहर निकलते थे तो अपने साथ ये तीनों चीजें रखा करते थे, लोटा, छन्ना, और डोर, काहे के लिए? पानी के लिए । आज कल तो यह रिवाज बिल्कुल हट गया । अनछना पानी पीने में लोग जरा भी संकोच नहीं करते । सो अब लोटा, छन्ना, डोर इन सबका काम खतम हो गया, याने न घट रहा, न पट रहा और न रज्जु रहा । ये सब बातें लोग भूल गए और लोग झट कह उठते कि पानी को छानने की क्या जरूरत, वह तो यों ठीक है, अनेक युक्तियां भी देते कि देखो नगरपालिका की टंकी में इन्जीनियर लोग काम करते, वे पानी को दवा से साफ कर भरवाते, उसका बड़ा निरीक्षण रखते, उसमें जीव नहीं आने पाते, वह तो प्रासुक रहता है....यों अनेक प्रकार के उदाहरण भी देते, पर बात यह है कि जल तो एक ऐसा पदार्थ है, जीवों की उत्पत्ति का एक ऐसा आधार है कि जिसमें थोड़ी ही देर में स्वयं अनेक जीव उत्पन्न हो जाते हैं ।

(447) स्याद्वाद में विरुद्धधर्मों का विभिन्न अपेक्षाओं से अविरोध―यहां स्याद्वाद में उदाहरणार्थ की बात कह रहे हैं, (1) घट स्वरूप से है, अन्यरूप से नहीं है । स्याद्वाद की बात विचारने के लिए यह एक बात रख रहे हैं । (2) घट का घटरूप से अस्तित्व है, घट में पररूप से नास्तित्व है । अब तीसरे कदम पर चलो―घट में अस्तित्व है, घट में नास्तित्व है । अब इसी बात को यदि यों कहें कि घट-घट है पट नहीं तो यह स्याद्वाद का रूप नहीं बना । मोटे रूप से तो ध्यान में आता है कि बात तो ठीक कह रहे, पर अस्तित्व और नास्तित्व दोनों ही परस्पर प्रतिपक्ष धर्म एक वस्तु में रहे तब तो स्याद्वाद की विधि हो, अगर यों ही कहा जाये कि होगा स्याद्वाद, घट-घट है, पट नहीं, तो यों स्याद्वाद सब एकांतवादियों का बन जायेगा और सभी कहते ही हैं, मेरा कहना सच है, झूठ नहीं, अमुक बात यों है अन्य नहीं, वस्तु क्षणिक है अक्षणिक नहीं, पर स्याद्वाद का मर्म तो यह था कि एक वस्तु में परस्पर विरुद्ध धर्मों का अविरोध रूप से स्वीकार करना । जो अभी दृष्टांत दिया घट पट का उसमें तो एक समव्याप्ति है, बन भी गया, मगर ऐसी ही मुद्रा अगर सर्वत्र बनाई जावेगी तो अनेक जगह व्यभिचार मिलेगा और स्वच्छंदता बन जायेगी, इसलिए अस्तित्व और नास्तित्व इन दोनों का एकत्र विरोध बने उस भाषा के प्रयोग से स्याद्वाद बनता है । तो स्याद्वाद शासन को न मानने से अनेक एकांतवाद हो गए । स्याद्वादियों में कोई एकांतवादी घुस कर कहे देखो-पदार्थ क्षणिक है अक्षणिक नहीं तो हमारा स्याद्वाद बन गया कि नहीं? हर एक लोग यों बोल सकते । जिसको एकांतवाद की बात रखना है वह इस नकली स्याद्वाद की मुद्रा में अपनी बात भी रख सकता है । सबको छुट्टी । नकली मुद्रा में सबको अवसर मिलता है, असली मुद्रा में सबको अवसर नहीं मिलता । ब्रह्म नित्य है, अनित्य नहीं, लो बन गया हमारा स्याद्वाद इस एकांत को भी नकली मुद्रा में आप स्याद्वाद का रूप दे सकते, पर स्याद्वाद का यह रूप नहीं है । परस्पर दो धर्मों को भिन्न अपेक्षा से अविरोध रूप से सिद्ध करना यह स्याद्वाद की असली विधि है । इसको छोड़कर अनेक अनेकांत विपरीत आदिक सिद्धांत बन गए ।

(448) सांशयिक व वैनयिक मिथ्यात्व―(1) संशयमिथ्यात्व―संशय रहना कि आत्मा है या नहीं, यह बात सही है या नही, स्याद्वादशासन मानने वालों को कभी भी किसी से विरोध नहीं बनता और खास कर जैन में परस्पर जितने भी कथन हैं उन सबको स्याद्वाद की अगर भक्ति है तो उनको पचाने का सामर्थ्य है । और स्याद्वाद में भक्ति नहीं तो एकांतवाद होने से वह स्याद्वादशासन से भी बहिर्भूति है, तो उनको अपने आत्मस्वरूप में मान्यता का आनंद कैसे मिल सकता है? ये सब आश्रय के भेद से मिथ्यात्व के भेद बढ़ गए । मूल में बात यही है मिथ्यात्व की कि जो सम्यक्त्व नहीं है ऐसा परिणाम वह सब मिथ्यात्व है । (4) विनयमिथ्यात्व―हमारे लिए तो सब गुरू हैं, तापसी हो, संयासी हो, जटाधारी हो, पंचाग्नि तप तपना हो, निर्ग्रंथ हो, सवस्त्र हो, मेरे लिए तो सब गुरू है, आज के युग में इस प्रकार से कहना तो बड़ा भला लगता है और इसे कहते हैं राष्ट्रप्रगति का विचार वाला, मगर वस्तुस्वरूप की ओर से देखो तो चूंकि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का आशय इस निरीक्षक में नहीं है इस कारण वह विनयमिथ्यात्व है ।

(449) अज्ञानमिथ्यात्व का पसारा―(5) अज्ञानमिथ्यात्व में सारा जगत पड़ा है, बोध किया ही नहीं अपने आपका । यह प्रवृत्ति क्यों चलती है मनुष्यों में? जरा जरासी बात में क्रोध आये, दूसरों को देख करके मान आये, अपनी-अपनी बात चलाने का लोभ आये और अपनी ही बात चलाने के लिए माया कपट का जाल रचे, यह प्रवृति क्यों हुआ करती है मनुष्यों में? उसका कारण है अज्ञान मिथ्यात्व । भीतर में सुलझ नहीं है, उसमें यह बल नहीं आया कि वह अपने आत्मा के स्वरूप को और पर जीव के स्वरूप को एक समान समझ सके । यह दृष्टि नहीं प्राप्त हुई इसलिए ये खोटी प्रवृत्तियां, कषाय वाली प्रवृत्तियां सब चलती हैं और उससे आकुलित होते हैं । अरे बड़ी कठिनाई से यह मनुष्यजन्म मिला उसे यों ही क्यों खोते । अहो यह संसारी अज्ञ जीव कैसी उदारता बर्त रहा है कि जहाँ अनंत भव है वहाँ एक यह भव भी उन्हीं में शामिल हो जाये हमें कुछ फिकर नहीं । देखो इस संसारी सुभट की कितनी बड़ी उदारता है । क्यों उन अनंत में से एक कम करें? खूब रहने में अनंत भव और उनमें यह वर्तमान का भव भी मिला दें, ऐसा उदार बन रहा है यह संसारी सुभट । (हंसी) तो इन 5 प्रकार के मिथ्यात्वों के वश होकर यह जीव अशुभ कर्मों का बंध करता है । जीव ने तो अशुद्ध परिणाम किया, उसका निमित्त पाकर वहीं एक क्षेत्रावगाह में अवस्थित कार्माण विश्रसोपचय वर्गणायें भावानुरूप कर्मत्वरूप से परिणम जाती हैं, इनको कौन रोकेगा?

(450) समझवाला व बेसुधीवाला पाप―लोग प्राय: सब जानते हैं कि यह पाप है और यह नहीं है हम आपकी तो बात छोड़ो, कुत्ता, बिल्ली वगैरह पशु भी समझते हैं कि यह पाप है यह नहीं । देखो कोई कुत्ता अगर रोटी चुराकर खाता है तो क्या करता है कि खूब लुक छिपकर पूछ झुकाकर धीरे से बिना किसी प्रकार की आवाज किए रोटी चुराकर ले जाता और किसी एकांत स्थान में बैठकर

उस रोटी को खाता, वह बीच-बीच में इधर उधर देखता भी जाता कि कोई देख तो नहीं रहा । तो उसको यह समझ है कि यह पाप का काम है । और अगर किसी कुत्ते को मालिक रोटी खिलाता तो उसकी बात देखो कैसा वह खुश होकर अपनी दुम हिलाकर एक ठसक के साथ खाता । तो जो पाप का परिणाम रखता है उसका दिल कमजोर रहता है । मगर चूंकि एक व्यसन लग गया है इसलिए उसी को ही लगाये जाता है । तो पाप की बात या अपाप की बात यह भगवान आत्मा बड़ी सरलता से समझ लेता है और मूल पाप तो ऐसा है कि जिसकी समझ नहीं बन पाती । तो पाप करके भी पाप की समझ न बने, ऐसा पाप है मिथ्यात्व । बाकी प्रवृत्तिरूप पाप तो अज्ञानी के भी प्राय: समझ में आ जाते और ज्ञानी के भी । तो यह मिथ्यात्वभाव जहाँ है वहाँ विकट अशुभ कर्म का बंध है ꠰

(451) अशुभभाव से सर्वत्र अलग रहने का कर्तव्य―लोग पाप करते हैं एकांत में कि कोई देख तो न ले, हमारी निंदा न हो, हम पर विपत्ति न ये, पर कहां एकांत ढूंढ़ोगे ? कहीं एकांत मिलेगा क्या पाप करने के लिए? चाहे गुफा में चले जायें, चाहे कमरे के भीतर रहें, जहाँ भी अशुभ भाव है, खोटा भाव है तो उसको निमित्त पाकर कार्माण वर्गणायें कर्मरूप बन जाती हैं । इन्हें कोई नहीं रोक सकता । और सबसे बड़ा दंड दे सकने वाला निरीक्षक कह लीजिये यह साथ लगा हुआ है जीव के, ये विश्रसोपचय कार्माण वर्गणायें बंध गई, इनके अनुभाग उदय के समय यह जीव विपत्ति में पड़ जाता है । इससे ऐसी जागरूकता रखना कि मैं कभी भी अशुभ भाव न करूं, क्योंकि उसका फल नियम से मिलेगा । दूसरा कौन दंड देगा जिससे छुपकर पाप कर रहे? जो दंड देगा उससे छुपकर कोई रह नहीं सकता । तो यह सब समझ कर कि ऐसी घटनायें घटा करती हैं, अशुभ भाव हुए तो वहाँ अशुभ कर्म बंधते ही हैं, वहां रंच भी रुकावट नहीं है कि इसने नहीं जान पाया । यदि ये कर्म जाननहार होते, चेतन होते तो उनसे छिपकर भी कोई भाव हम बना सकते थे, परंतु ये बध्य कर्म चेतन नहीं, जाननहार नहीं । यहाँ तो निमित्त नैमित्तिक योग अनिवार्य है । धोखा दिया जा सकता है, किसी जानने वाले को, जीव को, पर अचेतन को कहां धोखा है? जैसे ही जीव ने अशुभ भाव किया वैसे ही वहाँ कार्माण वर्गणाओं का कर्मरूप परिणमन हुआ और कषाय के अनुसार वे बंध गई, तो यह जीव विपत्ति में आयगा, इसे कौन बचायेगा?

(452) कर्मत्वहेतुभूत अशुद्ध भावों से हट कर शुद्ध अंतस्तत्त्व उपयुक्त होने का कर्तव्य―इस जीव के साथ अब से सैकड़ों हजारों लाखों करोड़ों भवों पूर्व के ही नहीं, बल्कि अनगिनते भवों पहिले कर्म बंधे हुए इस समय पड़े हैं, क्योंकि सागर उपमाप्रमाण के अंदर असंख्यात लब्ध्यपर्याप्त भव बीत जाते हैं । उन कर्मों का अपने-अपने समय पर या परिणाम के वश से समय पर विपाक उदय होता है । कोई बड़ा धर्मात्मा पुरुष हो, जिसने कभी कोई दोष नहीं किया, सारे जीवन भर अच्छे परिणाम से रहा फिर भी बड़ी विपत्ति में रहा, ऐसा भी देखा जाता है । वह ऐसे रोग से ग्रस्त होकर मरण भी कर सकता कि जिसे देखकर लोग यह कह सकते कि इसकी बड़ी बुरी मौत हुई, भाई इस जीवन में तो कुछ नहीं किया, फिर ऐसा उदय कहा से आया? तो ये करोड़ों अरबों भव पहले के भी उदय में आ सकते हैं, आते ही हैं सब स्थिति पाकर उदय । सो एक इसी भय से अशुभभाव न करो । शुद्ध अंतस्तत्त्व की रुचि से अशुभ भाव न हों तो यह एक मौलिक कदम है । तो यह जीव ऐसे मिथ्यात्व के वश होकर अशुभ कर्म का बंध करता है । और, उसमें प्रेरणा मिली है जैन शासन से परान्मुखता से । जिन वचन का श्रद्धान हो, उसके अनुसार आत्महित की भावना से अपने आप पर दया के भाव से मोक्ष मार्ग में ही गमन हो तो यह पाया हुआ दुर्लभ मानव जीवन सफल होता है ।

(453) सत्संग के अभाव में दुर्भावों की अहानि से, वैराग्य की हानि से आकुलता में वृद्धि―अशुभ भावों से अशुभ बंध होता है ꠰ इस प्रकरण में अशुभ बंध के कारण बताये जा रहे हैं ꠰ मिथ्यात्व कषाय आदि । मिथ्यात्व का वर्णन किया, अब कषाय का वर्णन करते हैं । जो कषे उसे कषाय कहते हैं याने विलक्षण ढंग से दुःख दे, वह है कषाय । अपने को दुःख देने वाला कषाय भाव है अर्थात् क्रोध, मान, माया, लोभ से ये प्राणी दुःखी रहते हैं, इनको दुःखी करने वाला कोई दूसरा नहीं । दूसरा प्राणी तो इनके दुःख में निमित्त भी नहीं है । दुःख का निमित्त है अशुभकर्म का उदय, और दूसरा योग है आश्रयभूत कारण । तो आत्मा को कष्ट देने वाली ये कषायें हैं । हम सब सुनते भी आये, पढ़ते भी आये, बड़ी-बड़ी चर्चायें भी करते, स्वाध्याय भी करते, और इसी बात का प्रतिपादन करते, पर वैराग्य में वृद्धि नहीं है, वैराग्य की ओर चित्त नहीं जाता, केवल रोज-रोज एक चर्चा भी कर लेते, चित्त में यह बात नहीं आती कि हमको किसी लक्ष्य में पहुंचना है तो उसका कारण क्या है कि चर्चा करके भी हमारा राग नहीं घटता, वैराग्य की ओर नहीं आते, स्वाध्याय तो बहुत कर लेते, कभी सारा दिन करते कभी थोड़ा करते । तो इसमें मुख्य कारण है सत्संग का अभाव । जब कोई बात प्रयोगात्मक करने चलें तो उसका पता पड़ता है । जब प्रयोग पर चलते हैं तब पता पड़ता है कि बात क्यों नहीं बनती । कमी कहां है । तो जब उस प्रयोग पर चलने का भाव रखें और उद्यम करें तो वे सब बातें ठीक-ठीक समझ में आ जायेंगी । कैसे और क्या किया जाये कि सिद्धि प्राप्त हो? एक बात सोचना तो चाहिए कि राग, कषायें घटे बिना तो उद्धार नहीं हो सकता । मेरा राग घटे, कषाय घटे यह उद्यम करना है, और स्वाध्याय करते, सुनते, पढ़ते, बोलते बहुतसा समय गुजर जाता फिर भी यह पाते हैं कि वैराग्य की ओर नहीं चल सके, राग नही घट सका । तो कुछ सोचना चाहिए कि कौनसी कमी रह गई । तो वह कमी है सत्संग की । जिसके राग घटा हो, जिसके मंद कषाय हों ऐसे पुरुषों का संग रहे तो वह एक ऐसा वातावरण है कि अपनी भी विरक्ति की ओर उमंग चले । सो दो ही तो बातें हैं―स्वाध्याय और सत्संग । ये दोनों प्रयोग अमृतपान हैं । आज स्वाध्याय तो बनता है पर सत्संग नहीं मिलता, और इसके बजाये बाकी समय देखो तो कुसंग के प्रसंग मिलते रहते हैं याने जिनको संसार, शरीर, भोगों से वैराग्य नहीं है, ऐसे जीवों का संग अधिक मिलता रहता है, तो परिणाम क्या होता कि ये स्वाध्याय चर्चा आदि भी एक मनोविनोद के साधनमात्र रह जाते हैं । जब प्रयोगरूप से चलें तब नम्रता भी आयेगी, सत्संग में भाव भी होगा, धर्मानुराग भी चलेगा, अहंकार दूर होगा । जो बात जिस विधि से होती है वह उसी विधि से बनेगी । मोक्षमार्ग ज्ञान और वैराग्य से चलता है तो यों ही चलेगा । यहाँ अशुभ बंध का कारण कषायभाव बतला रहे हैं । कषाय 16 हैं, 9 नोकषायें हैं, यों 25 कषायें हैं । अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन, ये चार प्रकार के क्रोध, मान, माया, लोभ होते हैं । अनंतानुबंधी कषाय क्या है? मिथ्यात्व का संबंध बनाये उस कषाय को अनंतानुबंधी कहते हैं । तेजी और गैरतेजी पर दृष्टि न डालें, उससे इन कषायों का पता न पड़ेगा, किंतु वह भाव जो मिथ्यात्व का संबंध बनाये सो अनंतानुबंधी । अंतस्तत्त्व के प्रतिबोध बिना मैं वास्तव में क्या हूँ, ऐसे परिचय बिना जो भी भाव होता है वह मिथ्यात्व का संबंध बनाये रहता है । कोई धर्म कर रहा है, कहने के लिए मंदिर भी आते, व्रत भी करते, तप भी करते, स्वाध्याय भी करते और भाषण भी देंगे और आत्मा की बडी चर्चा भी करते, पर उनसे यह भी नियम न बनेगा कि हम अनंतानुबंधी कषाय न करें । कभी कोई तेज कषाय करता हुआ न भी दिखे तो भी यह नियम नहीं किया जा सकता कि इसके अनंतानुबंधी कषाय नहीं है । यह है संसार की जड़ । अपने आपके स्वरूप का परिचय न हो और फिर जो भी भाव चलते हैं वे अज्ञानमय भाव है । ये अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ प्राय: ये प्रचंड होते हैं, पर किसी समय नहीं है कषाय की प्रचंड प्रवृत्ति और अनंतानुबंधी हो ऐसा भी होता । तो इस कषाय को दूर करने के लिए आत्मस्वरूप की भावना करना आवश्यक है । उसके प्रताप से कषायें दूर होंगी ।

(454) अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण व संज्वलन कषाय की बंधहेतुता―अनंतानुबंधी कषायों के दूर होने पर फिर भाव अप्रत्याख्यान चलेगा । मोक्षमार्ग पर गमन होने लगेगा । इसका बाधक है अप्रत्याख्यानावरण । अ के मायने थोड़ा प्रत्याख्यान मायने त्याग । अ का थोड़ा यह भी अर्थ होता है, जहाँ नञ᳭, के साथ समास हो उसका ईषत् अर्थ होता । अ मायने थोड़ा, प्रत्याख्यान मायने त्याग और आवरण मायने ढकना । जहाँ थोड़े त्यागसहित भाव का आवरण हो उसे अप्रत्याख्यानावरण कहते हैं । थोड़ा त्याग के मायने संयम नहीं, किंतु संयमासंयम की वृत्ति न होने देना ऐसे कषाय को अप्रत्याख्यानावरण कहते हैं । कर्मबंध अशुभ बंध के हेतु के प्रकरण में यह बताया जा रहा है । इस कषाय का शुद्ध नाम है अप्रत्याख्यानावरण । इसे कुछ लोग ऐसा भी बोलते―अप्रत्याख्यानावरणी, अब इसमें यदि उनकी कृपा हो जाये तो जी शब्द और लगा दें तो क्या हो जायेगा अप्रत्याख्यानावरणी जी (हंसी), तो यहाँ वरणी शब्द बोलना ठीक नहीं, शुद्ध शब्द है अप्रत्याख्यानावरणीय या अप्रत्याख्यानावरण इतना भर बोलना । यह कषाय देश संयम उत्पन्न नहीं करने देती । तीसरी जाति है प्रत्याख्यानावरण, यहाँ अशब्द नहीं लगा है, इसलिए थोड़ा अर्थ नहीं लगा । प्रत्याख्यान मायने सकलसंयम । प्रत्याख्यान जों न होने दे उस कषाय को प्रत्याख्यानावरण कहते हैं, जो सकलसंयम न होने दे । जैसे-जैसे ये बाह्य त्याग में चलते हैं तो जो विवेकी हैं, वे निःशल्य रहते हैं और उन्हें उस वातावरण में आत्मानुभूति के अनेक अवसर आते हैं । इस कारण त्याग की भावना नियमत: होनी चाहिए । चौथी कषाय है संज्वलन । संज्वलन, स के साथ जो ज्वलन रहे, संयम के साथ भी जो ज्वलन रहे, नियम भी बना रहे और कषाय भी बनी रहे, ऐसी छोटी कषाय का नाम है स ज्वलन । जहाँ बड़ी कषाय है वह । छोटी तो है ही । जिसके अनंतातुबंधी है उसके ये सब कषायें है । पर कोई पुरुष ऐसे होते हैं कि अनंतानुबंधी अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण नहीं है और संज्वलन है । बंध सभी से हो रहा है । ये कषाय अशुभकर्म बंध के कारण कहे गये हैं ।

(455) नव नोकषायों की बंधहेतुता―नव नो कषाय, ये चार तो समझ लिये । इस कषाय वृत्ति के इन्जन के चलने के लिए स्टीम जैसी है, इनमें कैसी स्टीम भरी है ? और फिर फल क्या भोगते हैं? हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, हंसना, मजाक करना, दिल्लगी करना या दूसरे की कोई हंसी उड़ाना न जाने क्या-क्या ये सब हास्य होते हैं । इसे आनंद आ रहा मगर वह इन कषायों से पीड़ित होकर ऐसी चेष्टा कर रहा है । रति प्रेम का नाम है । इष्ट विषय में राग जगता, प्रेम जगता । अरति द्वेष को कहते हैं । अनिष्ट में द्वेष जगा । शोक रंज का नाम है । भय डर का नाम है । जुगुप्सा ग्लानि करने को कहते हैं और तीन वेद ये काम संबंधी हैं । यों 25 कषायों के द्वारा यह जिन वचन से परान्मुख जीव अशुभ कर्म का बंध करता है ।

(456) संयम की बंधहेतुता―अब बतला रहे हैं असंयम । असंयम 12 प्रकार का होता है―6 प्राण का असंयम और 6 विषय का असंयम । पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रस काय इन 6 प्रकार के, प्राणियों के प्रति संयम न होना, इनकी हिंसा से विरक्त न होना ये 6 असंयम हैं और स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र और मन इन 6 के विषयों से विरक्त न होना ये 6 विषय के असंयम हैं । तो इन असंयमभावों से यह जीव अशुभ बंध करता है ।

(457) सम्यग्दृष्टि के संयम का भाव―संयम की भावना हो, अपनी शक्ति के अनुसार संयम की साधना करे संयम के धारण करने वालों के प्रति प्रीति जगे । ये सब मोक्षमार्ग के उत्साहक भाव हैं । जहाँ यह संयम नहीं है, असंयम है तो असंयम के कारण अशुभबंध होता रहता है, आत्मा में गुण भी होते, दोष भी होते, जिनको आत्महित की धुन होती है, सो जो गुण हुए सो तो हुए, पर दोषों को निरख निरखकर दूर करना चाहिये । और जब आत्मकल्याण की भावना नहीं होती तो वहाँ गुण भी प्रकट नहीं हैं तो भी पुण्य में ये गुण आ गए, उन गुणों में संतोष करके अपना जीवन गुजारते हैं । ये सब लगन के अनुसार भेद पड़ जाते हैं । जो ज्ञानी है । सम्यग्दृष्टि है―(1) उसके संयम की भावना होती है । (2) यथाशक्ति संयम भी वह पालता और (3) सम्यग्दृष्टि के संयमधारी महंतों के प्रति अनुराग भी होता । यदि ये तीन बातें नहीं हैं तो उसमें वह गुण भी प्रकट नहीं हुआ कि जिससे वह अपने दोष दूर कर सके । संयम मनुष्यभव में ही तो मिलता है और इस भव में भी संयम की भावना, संयम की पालना न बनायी जाये तो यह एक भूल की बात है, प्रमाद की बात है । असंयम से अशुभ बंध होता है ।

(458) योगों से अशुभबंध―अब कह रहे हैं योग । मन, वचन, काय का हलनचलन । ध्यान में तो यह आता कि कभी शरीर के हिलने से आत्मा हिलता, कभी आत्मा के हिलने से शरीर हिलता । लगता है ऐसा, पर हर जगह बात यही मिलेगी कि आत्मप्रदेश में परिस्पंद होता है उसका निमित्त पाकर यह शरीर हिलता । कभी लोग ऐसी शंका करते हैं कि सोते हुए में भी तो कभी-कभी हाथ, पैर आदि हिल जाया करते, तो सुनो, यह कैसे निषेध किया जाता कि वहाँ आत्मपरिस्पंद नहीं होता? इसकी सीधी निमित्त नैमित्तिक योग की प्रक्रिया यह है कि अज्ञानवश जीव में कषाय उत्पन्न हुई, और उसके कारण फिर आत्मा के प्रदेशों में तदनुरूप परिस्पंद हुआ, उसका निमित्त पाकर इस शरीर में बात का संचरण हुआ । हुआ परिस्पंद के अनुरूप और उस वायु के संचरण का निमित्त पाकर यह हाथ उठा, इसमें क्रिया हुई, फिर आगे उस हाथ के संपर्क में जो वस्तु आयी सो हाथ की क्रिया का निमित्त पाकर वह वस्तु चली । यद्यपि हो रहा है सबका स्वयं की क्रिया से स्वयं में परिणमन, पर जितना भी विकार परिणमन होता वह निमित्त पाये बिना कभी हो ही नहीं सकता । अगर निमित्त के पाये बिना विकार भाव जगने लगें तो विकार स्वभाव कहलायेगा और फिर विकार कभी नष्ट नहीं हो सकेंगे । सो यह योग, यह आत्मप्रदेश परिस्पंद यह है कर्मों के आस्रव का निमित्तकारण योग से भी अशुभ कर्मों का आसव होता है ।

(459) अशुभलेश्याओं से अशुभबंध―अशुभ लेश्यावों से अशुभबंध होता है । यहाँं अशुभ की प्रधानता में बात कह रहे हैं । अशुभ लेश्यायें हैं कृष्ण, नील, कापोत । कृष्ण प्रचंड क्रोध हो अथवा क्रोध न दिखे तो भीतर बड़ा गुर्राता सा रहता हुआ मौका तकता हुआ रहे और कैसे मैं दूसरे का वध करूं आदिक आशय रहे ऐसी कुवृत्ति के पुरुष कृष्णलेश्या वाले कहलाते हैं । कृष्ण लेश्या से अशुभ कर्म बंधता है । नील लेश्या में कुछ कम, कापोत में उससे भी कुछ कम, मगर अशुभ भाव तीनों में पाये जा रहे । तो इन लेश्याओं के कारण ये जिनवचन से परान्मुख जीव अशुभ कर्म का बंध करते हैं ।


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