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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 130

From जैनकोष



उत्थरइ जा ण जरओ रोयग्गी जा ण डहइ देहउडिं ꠰

इंदियबलं न वियलइ ताव तुमं कुणहि अप्पहियं ꠰꠰130꠰꠰

(518) वृद्धत्व आने से पहिले ही आत्महित करने का आदेश―हे आत्मन् ! जब तक बुढ़ापा आक्रमण नहीं करता है तब तक तू आत्महित कर ले ꠰ बुढ़ापा आना तो निश्चित है, कोई ऐसा न समझें कि जब बुढ़ापा में हम आत्महित न कर सकते तब पहले से ही क्यों आत्महित की साधना बनायें, क्योंकि बुढ़ापा आने पर सब भूल जायेगा, तो यों भूलता नहीं है ꠰ छहढाला में तो लिखा है―बालपने में ज्ञान न लह्यौ, तरुण समय तरणी रत सद्यो ꠰ अर्द्धमृतकसम बूढ़ापनो, कैसे रूप लखे आपनो ? कोई अगर बचपन में ज्ञान न बनाये तो वह अपना स्वरूप कैसे लख सकता है ? तरुण समय में तरुणी में रत रह रहा तो वहाँ अपने स्वरूप का दर्शन कैसे हो सकता है ꠰ और बुढ़ापा अधमरे की तरह है ꠰ वहाँ तो कुछ कर ही नहीं सकता ꠰ जब ये तीन बातें सुन ली तो कोई यह शंका कर सकता है कि जो बुढ़ापे में सब भूल जायेंगे तो फिर अभी से क्यों आत्महित की बात करें ? तो बुढ़ापे में यों नहीं भूला करता ꠰ यह कथा उस एक जीव की है जिसने बालपने में तो ज्ञान नहीं पाया और वही मनुष्य सारी जवानी में तरुणी में रत रहा, वही मनुष्य बूढ़ा बना तो अब वह करेगा क्या ? पर जिसने बालपन में ज्ञानसंपादन किया, तरुण समय में वैराग्य धारण किया वह तो सावधान है ꠰ बुढ़ापा आने पर वह विचलित नहीं होता ꠰ फिर भी बुढ़ापा एक ऐसी दयनीय स्थिति है कि इसमें शिथिलता आती है ꠰ कुछ भावों में भी गिरावट हो सकती है ꠰ नियम नहीं है, पर यह संभावना है ꠰ तो जो तरुण समय तक कुछ भी कल्याण न करें उनके लिए बुढ़ापा बड़ा कठिन है, इस कारण जितना समय अभी मिला है उसमें तरुण समय तक आत्महित करने का प्रयोग बना लें ꠰ जवानी के समय तो युवक लोग मजाक करते हैं कि अभी हमारे धर्म करने के दिन हैं क्या ? बुढ़ापा आने दो फिर धर्म करेंगे ꠰ अरे उन्हें यह विदित नहीं है कि बुढ़ापा आने पर धर्म नहीं कर सकते ꠰ इसलिए जब जिनवाणी की प्रेरणा मिले तभी से आत्महित में अपने को लगा लें ꠰

(519) वृद्धत्व के चित्रण में वैराग्य की प्रेरकता―हे आत्मन् ! जब तक बुढ़ापा का आक्रमण नहीं होता तब तक हित कर लो ꠰ पद्मपुराण में एक जगह चित्रण मिलता है, राजा दशरथ की अतिप्रिय रानी की बात है ꠰ राजा दशरथ के घर प्रतिदिन मंदिर से गंधोदक आता था उनकी सभी रानियों के लिए । सो सभी रानियों को उनकी दासियां गंधोदक लाती थी एक दिन जो सबसे प्रिय रानी थी उसके लिए एक वृद्ध पुरुष को गंधोदक के लिए भेजा ꠰ अब दासियां तो थी जवान हट्टी-कट्टी सो फौरन दौड़कर गंधोदक ले आई पर जो वृद्ध पुरुष था उसको गंधोदक लाने में काफी देर हो गई ꠰ देर हो जाने से वह रानी काफी झुंझला गई ? मैं ऐसी फाल्तू हूं, मेरा कोई आदर नहीं, मेरे को गंधोदक अब तक नहीं आया और हमारे पति भी हमारी उपेक्षा रखते हैं ꠰ तो ये जो बड़े आदमी होते ठलुवा लोग, जिन्हें कोई अधिक काम नहीं पड़ता तो वे बैठे-बैठे ऐसा गुंतारा बनाते कि कुछ न कुछ करते रहना चाहिए ꠰ तो वह रानी अपने को बड़ा दु:खी महसूस कर रही थी इसकी सूचना मिली दशरथ को सो झट उस रानी के पास आये और उदासी का कारण पूछा, तो उसने स्पष्ट रूप से अपने मन की सारी बात बता दी ꠰ इतने में ही वह वृद्ध भी गंधोदक लेकर आया ꠰ दशरथ ने उसे डाटना शुरू किया, तो वह वृद्ध पुरुष ने जो एक वृद्धावस्था का चित्रण उस समय किया वह बड़ा रोमांचकारी है ꠰ उस वृद्धावस्था का चित्रण सुनकर वैराग्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है ꠰ तो ऐसी चीज है वृद्धावस्था ꠰ यह वृद्धावस्था देवों के नहीं होती, मगर देवों में बुढ़ापा जैसी ठोकर तो अंत में लगती है ꠰ अब 6 महीने शेष रहते हैं, मालायें मुर्झाती हैं, उनका उसी ढंग का बुढ़ापा समझ लीजिए ꠰ तो यह बुढ़ापा एक ऐसी व्याधि है कि इसमें कुछ बात बनती नहीं, इसलिए जब तक बुढ़ापा नहीं आया तब तक आत्महित कर लें ꠰

(520) रोगग्रस्त होने से पहिले ही आत्महित करने की प्रेरणा―हे आत्मन् ! जब तक रोगरूपी अग्नि शरीररूपी झौंपड़ी को नहीं जलाती तब तक तू आत्महित कर लें ꠰ कोई बता सकता क्या कि कौनसा रोग भला है कि जिससे अपने को कष्ट न हो ꠰ तो अपेक्षा में तो भले ही बता देते हैं कि जिससे अपने को कष्ट न हो ꠰ तो अपेक्षा में तो भले ही बता देते हैं, थोड़ा भी दर्द हुआ शरीर के किसी अंग में तो कहने लगते कि इससे तो बुखार आ जाता तो वह भला था, यह पीड़ा तो सही नहीं जाती ꠰ जिसके जो रोग आता उसको वह कठिन लगता है ꠰ और कितने ही रोग हैं इस शरीर पर ꠰ करोड़ों, यह रोग रूपी आग इस शरीर रूपी झौंपड़ी को जला देती है ꠰ हे आत्मन् ! जब तक तू निरोग है, कुछ बल है तब तक आत्महित कर लो ꠰ अपने परिणामों को इतना उज्ज्वल बनाओ कि किसी भी बाह्य पदार्थ में तेरे मोह न जगे ꠰ यह ही तो आत्महित है ꠰ निज को निज पर को पर जान यह बात दृढ़ता से बनी रहे ꠰ और इसके लिए जिन-जिन साधनों की जरूरत है उन्हें भी कर ꠰ सत्संग कर, स्वाध्याय कर ꠰ जब तक रोग न घेरे तब तक तू आत्महित कर ले ꠰

(521) इंद्रियबल क्षीण होने से पहले ही आत्महित करने का उपदेश―हे आत्मन᳭ ! जब तक इंद्रिय का बल क्षीण नहीं हो जाता तब तक तू आत्महित कर ले ꠰ जब बुढ़ापा आया और कोई बुद्धिगत रोग आया अथवा मन और इंद्रिय का बल मानो क्षीण हो गया तो वह फिर क्या करेगा ? तू मैत्री आदि चार भावनाओं को चित्त में उतार ले ꠰ करने के नाम पर कुछ न करें तो खाली गप्प की बातों से तो उत्थान का काम न बनेगा ꠰ इसलिए स्थूल बात है―सर्वेषु मैत्री ꠰ सर्व प्राणियों में मित्रता का बर्ताव रहे ꠰ मेरे समान सब हैं, ऐसा ध्यान में लायें । देखिये यह सब अपने कल्याण के लिए बात है, यह अपने आप पर दया है, यदि ऐसी सद्भावना बन सके तो । गुणी जनों को देखकर प्रमोद हो, हर्षभाव हो । कैसा मोह का भयंकर नृत्य है कि लोग यह सोच बैठते हैं कि गुणी तो मैं हूँ जितना जानकार मैं हूँ उतने जानकार और कहां पाये जाते कैसा मोहजाल का नाच है? जगत में अनंत जीव हैं, अनेकों मोक्ष जाने वाले जीव हैं, ज्ञानी हैं, सम्यग्दृष्टि हैं, हम से बड़े-बड़े बहुत हैं, जो संसार शरीर भोगों से विरक्त हैं, जो अपने आत्मा को आराधना में धुन रखा करते हैं, विधि अनुसार चारित्र पालते हैं वे गुणीजन हैं । उन गुणी जनों को देखकर हर्ष से भर जाना चाहिए जिनके कुल में रहता हूँ, उनकी मूर्ति मुझ को मिल गई । कोई दुःखी जीव दिखें तो दयावंतता का भाव आये । मेरे समान स्वरूप वाले ये प्राणी जब किसी उपयोग से दुःखी हो रहे तो तत्काल अन्न पान देना, वस्त्रादिक देना, उससे उन्हें तत्काल शांत करें और ज्ञान शिक्षा देकर उनकी हिम्मत बंधायें, यह ही दयापरता का भाव है, और जो विपरीत वृत्ति हो, समझदार हो तो भी जिसके विषय में यह बात सुनिश्चितसी हो कि यह हमारे समझाये समझने वाला नहीं, अपनी कषाय छोड़ने वाला नहीं तो उसमें मध्यस्थभाव रखें । ये चार भावनायें जीवन में उतरें तो आत्मा का उसमें हित है ।

(522) सर्व स्थितियों में विवेक बल से आत्महित में लगने का उपदेश―इस गाथा में तीन प्रकार से संबोधा है कि बुढ़ापे से पहले ही आत्महित में लग जावो । लोग कहते हैं कि 60 वर्ष का हो जाने से बुद्धि सठिया गई तो यह कोई नियम नहीं है, पर प्राय: ऐसा होता है । बुढ़ापे में जो सफेद बाल हो जाते तो उनके लिए कवि जन कहते हैं कि जो इसमें सफेदी थी, स्वच्छता थी, शुद्धता थी वह अब इसमें नहीं रही, बालों में आ गई । अब यह बुढ़ापे में परलोक के प्रयोजन का कैसे स्मरण रख सकेगा । इसी तरह रोग । इस रोग से भी बुरा रोग है भोग रोग । यह रोग में तो भगवान की सुध भी करता है, पर भोग में पड़कर तो यह भगवान की सुध भी भूल जाता है । तो जो पुरुष ऐसे दुर्लभ जन्म में राग से शोक से, भोग से, मोह से इस मानव जीवन को नष्ट करता है तो वह मोह से मलिन है, मानों वह भस्म की इच्छा से रत्नराशि को जलाता है । कोई चंदन के वृक्ष को जला दे इस ख्याल से कि राख होगी, उससे मैं बर्तन मलूंगा सो चंदन जलाकर राख से बर्तन मांजे तो वह लोक में भला तो नहीं माना जाता । यहाँ कह रहे रत्नराशि की बात । रत्न जलाना कठिन है फिर भी उन्हें कोई जला दे और उसकी राख से बर्तन मांजे तो यह कोई भली बात नहीं, इसी तरह से इस मनुष्य जीवन को भोग, शोक, आदिक के लिए गमा देना कोई भली बात नहीं । यों समझो कि उसने धर्म को जला दिया । धर्म का घात करके भोग भोगना मूर्खता है । ऐसी शरीर की दुर्दशा होने से पहले ही चेत लें । एक कवि ने बुढ़ापे का चित्रण किया है, बुढ़ापा में कान बहरे हो जाते तो यहाँ शरीर को और इंद्रियों को जरा भेद से निरखकर वार्तालाप सा है । बुढ़ापे में दूसरों के द्वारा तिरस्कार के शब्द अधिक मिलते हैं, सो तिरस्कार के ये शब्द न सुनाई दें मानों इसलिए ये कान बहरे हो गए । और नेत्रों ने यह सोचा कि मैंने तो इसका जिंदगी भर साथ निभाया, अब इसकी ऐसी दशा देखकर मेरे से देखा नहीं जा रहा मानों यह सोच कर नेत्र भी अंधे बन गए । कवि के शब्दों में ये नेत्र भी मानों बड़े सज्जन निकले । ऐसी दशा में जो शरीर कांप रहा है सो माने सामने खड़े हुए यमराज के डर से कांप रहा है । ऐसे जर्जरदेह में नि:शंक होकर बैठे हैं बाह्य पदार्थों में मनता बढ़ाकर, यह कितने आश्चर्य की बात है । तो जब तक यह शरीर समर्थ है तब तक सद्भाव करें और उस सद्भावना के प्रताप से अपना उद्धार करें ।


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