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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 134

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जीवाणमभयदाणं देह मुणी पाणिभूयसत्ताणं ꠰

कल्लाणसुहणिमित्तं परंपरा तिविहसुद्धीए ꠰꠰134꠰꠰

(527) कल्याण लाभ के लिये अहिंसापालन का उपदेश―हे मुने तू कल्याणसंबंधी सुख की परंपरा के लिए मन, वचन, काय की शुद्धि से जीव, प्राणी, भूत और सत्त्वों को अभयदान दे, मायने जीवों को अभयदान दे ꠰ उन सब जीवों को यहाँ चार भागों में विभक्त किया है―जीव, प्राणी, भूत और सत्त्व ꠰ वैसे ये सभी जीवों के ही वाचक हैं मगर कुछ रूढ़ि से, कुछ इस धात्वर्थ का प्रधानतया फलन होने से ये अलग-अलग जीव के लिए शब्द रखे गए हैं ꠰ जीवों में तो पंचेंद्रियों को जीव कहा है ꠰ रूढ़ि के अनुसार बात की जा रही है और दो इंद्रिय तीन इंद्रिय को प्राणी कहा और वृक्षों को भूत कहा और उपलक्षण में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु भी ले लो और बाकी जो जीव बचे वे सब सत्त्व कहे गए है ꠰ इन सब जीवों की हिंसा से दूर रहो ꠰

(528) तीर्थंकर के गर्भकल्याण का सुख―पंचकल्याणक कहलाता है गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और निर्वाण ꠰ जहां विशेष समारोह होता है वह कल्याण है ꠰ भगवान गर्भ में आये मायने जो जीव भगवान हो वह गर्भ में नहीं आता, पर जो भगवान बनेगा उसका नाम धर कर कहते ही हैं कि जो भगवान बनेगा, अरहंत बनेगा, तीर्थंकर बनेगा वह गर्भ में आया, तो जो तीर्थंकर बनेगा वह गर्भ में आता है ꠰ कोई उल्टा ही लटका रहता है पेट में गर्भ होता है ꠰ किंतु तीर्थंकर उल्टे नहीं रहते गर्भ में ꠰ वे सीधे रहते हैं ꠰ और पद्मासन आसन ढंग में रहते हैं ꠰ भैया ! कुछ-कुछ तो छोटे बच्चों को देखा होगा कि उनकी टाँग सीधी नहीं रहती वे अगर बैठा दिए जाते तो उनका अर्धपद्मासन जैसा लगने लगता, और भगवान जन्मते हैं तो ऐसे ही सीधे निकलते हैं ꠰ और और भी अनेक अतिशय मिलते हैं ꠰ भगवान की माता को कष्ट नहीं होता और बताया कि जैसे यहां ज बच्चा गर्भ में होता है तो उसकी मां का पेट बढ़ जाता है तो उस पेट पर फिर कुछ झुरियां सी पड़ जाती हैं ? जैसे भूख में, पेट में बहुतसी झुरियां आ जाती हैं सो अगर गर्भ होता है तो फिर वे धारें नहीं रहती ꠰ पेट तन जाता है, मगर तीर्थंकर की माता का पेट तनता नहीं, ज्यों का त्यों बराबर रहता है, ये सब गर्भ के समय के अतिशय हैं ꠰ गर्भ के समय माता की सेवा करने के लिए देवियां महादेवियां आती हैं और सभी सेवायें करती हैं ꠰ और मिष्ट वचन कहकर माता को खुश रखती, यह भी तो सेवा है ꠰ तो सभी प्रकार की सेवायें ये देवियां करती हैं ꠰ गर्भ कल्याण के अतिशय कह रहे हैं ꠰ गर्भ रहता है 9 महीने ꠰ उससे 6 महीना पहले से ही रत्नवर्षा होती है ꠰ इस तरह सब मिलाकर 9+6=15 महीने स्वर्ग जैसी शोभा उस नगरी की देव करते हैं, ये सब गर्भकल्याणक के अतिशय है, लोग समझते हैं कि उसने इसमें सुख पाया है, ऐसा सुख मिलना चाहिए ꠰ ये कल्याणकसंबंधी सुख है ꠰

(529) तीर्थंकर के जन्मकल्याण का सुख―अब जन्मकल्याण का सुख देखिये―जन्म तो वास्तव में तब कहलाता कि जब गर्भ में आया हो शुरू-शुरू के दिन, पर रूढ़ि ऐसी है कि बाहर निकलने को जन्म कहते हैं वस्तुत: आयु के उदय से जन्म होता है ꠰ जैसे किसी ने पूछा कि बताओ आपकी आयु कितनी है ? तो मान लो उसने बताया कि मेरी आयु इस समय 62 वर्ष की है, पर इसमें अभी अंग के 9 महीने छूट गए, इसलिए कुल मिलाकर 62 वर्ष 9 महीने कहना चाहिए, गर्भ की आयु भी उसी में शामिल है ꠰ तो प्रकरण यह चल रहा था कि जन्म के समय में तीर्थंकर को कष्ट नहीं, तीर्थंकर की माता को कष्ट नहीं ꠰ उन्हें अस्पताल नहीं जाना पड़ता ꠰ देवियां सेवा करती ꠰ गर्भ से बाहर निकलने पर जन्मकल्याण मनाने को स्वर्ग से देवेंद्र आते हैं यहाँ भी तो कुछ गांवों से आप लोगों को बुवा, नानी, मौसी आदिक आती है, वहां भगवान का जन्मकल्याणक मनाने को देवगण आते हैं सो वे अपनी ऋद्धि शक्ति के मुताबिक समारोह मनाते हैं ꠰ उस बालक प्रभु में इतना अतुल बल है कि मेरुपर्वत जैसे ऊंचे स्थानों पर देव देवेंद्र ले जाते और वहाँ बड़े-बड़े कलशों से उनका अभिषेक करते, शुद्ध करते, परंतु प्रभु रंच भी नहीं घबड़ाते ꠰ ऐसा जन्मकल्याणक, देव मनाते हैं ꠰ तपकल्याणक, ज्ञानकल्याणक और निर्वाणकल्याणक के भी ऐसे ही विशाल समारोह होते हैं ꠰ उनमें महासुख है ꠰ उन सुखों के निमित्त हे मुनिवर तू सभी जीवों को अभयदान दे ꠰

(530) अभयदान के बिना मृत्युक्लेशसहन―आत्मन् ! भयभीत जीवों को तूने अभयदान नहीं दिया यही कारण है कि तू मरण से बराबर डरता है, और फिर दीर्घायु कैसे हो सकता है ? जैसा भाव किया जाता है वैसा ही कर्मबंध बनता है और उसके उदय में उस प्रकार का फल मिलना है ꠰ यह एक साधारण रीति है ꠰ कभी कोई सम्यग्दर्शन पाये, ज्ञानबल बढ़ायें और मोक्षमार्ग में बढ़े तो अन्य कर्मों की तो बात ही क्या, निधत्ति और निकाचित जैसे कर्म भी टूट जाते हैं, पर बांधे हुए कर्मों को तोड़ना आसान नहीं, किंतु वे विशिष्ट ज्ञानबल से ही टूटते हैं, अतएव साधारण रीति यह है कि जैसे भावकर्म कहां बांधे वैसे जन्म मरण आदिक के दु:ख पाये ꠰ तो हे जीव तूने अभयदान नहीं दिया ꠰ अपने ही गर्ज के लिए नाना चेष्टायें की ꠰ अपने जैसा स्वरूप दूसरे का नहीं जाना और उनको अभयदान का पौरुष भी नहीं किया ꠰ यही इसका फल है कि जन्म मरण करता फिर रहा, मरण से डरता फिर रहा ꠰ और दीर्घायु भी नहीं हो पाता ꠰ दया, अभयदान ये एक ऐसे विशुद्ध भाव हैं कि अगर विवेक की तराजू पर तौलें तो एक पलड़े पर दया रख दीजिए और दूसरे पर व्रत, तप आदिक कठिन क्रियायें रख दीजिए तो भी दया का पलड़ा भारी रहेगा ꠰ दया बिना बड़े-बड़े व्रत तप करके भी स्वर्ग पाना कठिन है ꠰ और दया सहित होकर जीव अगर व्रत भी नहीं पाल सक रहा तो भी उसको स्वर्ग पाना सरल है ꠰ यह एक फल बतला रहे हैं ꠰ इससे कहीं यह न समझना कि स्वर्ग कोई बहुत-बहुत बड़ी चीज है ꠰ उत्कृष्ट जीव तो है अपने ज्ञान का निर्विकार बनना, निर्विकार हो जाना, केवल शुद्ध आत्मा ही आत्मा रह जाना, यह है सर्वोत्कृष्ट वैभव, मगर संसार में चूंकि अभी रहना है तो दुर्गति में रहने की अपेक्षा सुगति में रहना भला है, जहां धर्मसाधन प्रसंग भी मिला करते हैं ꠰ यह अहिंसाव्रत का ही माहात्म्य है कि मनुष्य दीर्घायु बने, भाग्यशाली बने, समृद्धिशाली बने, कीर्तिवान हो ꠰ सो हे मुने ज तक एक छोटा सदाचार भी न बन सके तो बड़े सदाचार की तो आशा ही क्या करना ? तो चित्त में दया आये, अहिंसा व्रत का सही पालन हो, सर्व जीवों के स्वरूप को अपने स्वरूप की तरह समझा जाये तो इसमें आत्मा का उत्थान है ꠰


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