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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 147

From जैनकोष



दंसणणाणावरणं मोहणियंअंतराइयं कम्मं ꠰

णिट᳭ठवइ भवियजीवो सम्मं जिणभावणाजुत्तो ꠰꠰147꠰꠰

(555) जिनभावनायुक्त भव्य द्वारा नष्ट किये जाने वाले चार घातिया कर्मों में ज्ञानावरण―जिन भावना से सहित यह भव्य जीव, सम्यग्ज्ञान, सम्यक᳭चारित्र से युक्त होकर दर्शनावरण, ज्ञानावरण, मोहनीय और अंतराय इन चार कर्मों को नष्ट करता है ꠰ कर्म होते हैं अनगिनते मगर उनके नाम तो नहीं बखाने जा सकते ꠰ तो उन अनगिनते कर्मों को कुल संक्षेप में किया गया तो 148 हुए ꠰ उन 148 का संक्षेप किया गया है 8 कर्मों में, सो 4 तो हैं घातिया कर्म और 4 हैं अघातिया कर्म ꠰ जो कर्म आत्मा के गुणों को नष्ट करें उनको कहते हैं घातिया कर्म और जो गुण आत्मा के कर्मों को तो नष्ट करता नहीं किंतु उन घातिया कर्मों के मददगार रहते हैं वे अघातिया कर्म हैं ꠰ तो घातिया कर्मों का नाश करके अरहंत भगवान होते हैं ꠰ जैसे ज्ञानावरण 5 प्रकार का होता है―(1) मतिज्ञानावरण (2) श्रुतज्ञानावरण (3) अवधिज्ञानावरण (4) मन:पर्ययज्ञानावरण और (5) केवलज्ञानावरण ꠰ जो इन 5 प्रकार के ज्ञानों को घातते हैं वे 5 ज्ञानावरण हैं ꠰

(556) दर्शनावरण कर्म की प्रकृतियों का निर्देश―दर्शनावरण क्या कहलाते ? जो दर्शन का आवरण कर दे, दर्शन न होने दे, आत्मा का दर्शन, परपदार्थों का भी दर्शन न होने दे वह दर्शनावरण है ꠰ दर्शनावरण कर्म के 9 भेद हैं ꠰ (1) चक्षुदर्शनावरण (2) अचक्षुदर्शनावरण (3) अवधिदर्शनावरण (4) केवलदर्शनावरण ये 4 तो आवरण है याने आँख से दर्शन न होने देना चक्षुदर्शनावरण है, आँख के सिवाय बाकी इंद्रिय और मन से दर्शन न होने दे सो अचक्षुदर्शनावरण है, अवधिज्ञान से पहले अवधिदर्शन हुआ करता है, उसको जो न होने दो वह अवधिदर्शनावरण है, केवलज्ञान के साथ केवलदर्शन चलता ही रहता है ꠰ उस केवलज्ञान को न होने दे, वह केवल दर्शनावरण है ꠰ दर्शनावरण का काम है कि दर्शन न होने दे ꠰ शेष 5 और बचे, वे 5 हैं (1) निद्रा, (2) निद्रानिद्रा (3) प्रचला (4) प्रचलाप्रचला और (5) स्त्यानगृद्धि ꠰ निद्रा नाम है नींद आने का नींद आ गई तो देखना तो नहीं बनता तो दर्शन का आवरण हो गया ꠰ नींद आना दर्शनावरण का उदय है और निद्रानिद्रा मायने खूब तेज नींद जैसे किसी बच्चे को यहां शास्त्रसभा में नींद आ रही और शास्त्रसभा पूरी होने पर घर ले जाने के लिए उस बच्चे को उठाते हैं वह उठकर कुछ चल देता, मगर वह नीचे पड़कर फिर सो जाता है ꠰ तो नींद के बाद और नींद आती रहे वह कहलाती है निद्रानिद्रा ꠰ प्रचला―नींद आने में कुछ अंगोपांग भी चलते हैं, जिसमें कुछ-कुछ सुध भी रहे ꠰ जैसे प्रचला आती है श्रोताओं को ꠰ जैसे किसी श्रोता को शास्त्रसभा में नींद आ रह कुछ नींद भी लेता जाता और कुछ शास्त्र भी सुनता जाता ꠰ अ उससे कोई पूछे―क्यों जी, सो रहे क्या ? तो झट वह बोल उठता―नहीं, सो नहीं रहे शास्त्र सुन रहे हैं ꠰ भाई क्या सुना ? तो शायद कुछ-कुछ बता भी सके, ऐसी नींद को प्रचला कहते हैं जिसमें कुछ अंग भी चलें ꠰ बताते हैं कि घोड़ों के प्रचला चलती है ꠰ वे चलते भी जाते और नींद भी लेते जाते ꠰ प्रचलाप्रचला उसे कहते हैं कि जिसमें तेज सोवे कि जिसमें दाँत भी किटकिटाये, मुख से लार भी है, यह दर्शनावरण है ꠰ ये नींद के भेद हैं, ऐसी निद्रा आने में दर्शन नहीं होता ꠰ और आखरी है स्त्यानगृद्धि, स्त्यानगृद्धि में ऐसा होता कि सोते हुए के बीच में कुछ काम भी कर दिया, पर उसकी सुध भी नहीं रहती ꠰ ऐसी नींद आप लोगों में से किसी को आयी हो तो आप लोग जानो ꠰ हमें तो एक बार बता मिला कि जब हम विद्यार्थी अवस्था में थे तो ऐ बार ऐसी नींद आयी कि रात्रि को उठकर मंदिर का ताला भी खटखटा आये और वहां से आकर अपने कमरे में फिर सो गए ꠰ सवेरा होने पर दूसरे विद्यार्थी ने हमसे कहा कि तुम इतनी रात को मंदिर के द्वार पर पहुंचकर ताला क्यों खटखटा रहे थे ? तो हमने यही कहा कि हम तो नहीं गए थे मंदिर के द्वार पर ꠰ आखिर उन्होंने बताया कि तुम सोकर उठे और मंदिर के द्वार तक गए और फिर सो गए ꠰ अब देखो यह काम हमने कर लिया, पर हमें पता नहीं ꠰ तो ऐसे भी कोई काम कर डाले नींद में और फिर नींद आ गई और उसे पता ही न पड़े कि क्या किया ꠰ इसको स्त्यानगृद्धि कहते हैं ꠰ ये दर्शनावरण के 9 भेद हैं ꠰

(557) कर्मराज मोहनयकर्म की प्रकृतियां―मोहनीय के 28 भेद हैं 3 दर्शनमोहनीय, 25 चारित्रमोहनीय ꠰ मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक᳭प्रकृति ꠰ मिथ्यात्व के उदय से सम्यक्त्व नहीं हो सकता ꠰ सम्यग्मिथ्यात्व में कुछ सम्यग्दर्शन कुछ मिथ्यात्व मिला जुला, न केवल सम्यक्त्व न केवल मिथ्यात्व, ऐसा परिणाम बनता है ꠰ सम्यक᳭प्रकृति के उदय में सम्यक्त्व तो नहीं मिट पाता, पर थोड़े से दोष लगते हैं, जिन्हें कहते हैं चल मलिन अगाढ़ ꠰ ये हैं तीन मोहनीय ꠰ चारित्रमोहनीय में मुख्य है अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया लोभ ꠰ मिथ्यात्व का बंध कराने वाली कई भवों तक बैर रखने वाली अनंतानुबंधी कषाय है ꠰ सुकुमाल के बहुत पहले भवों की बात है ꠰ कोई घटना ऐसी हुई कि सुकुमाल के जीव ने अपने भाई की स्त्री का याने अपनी भाभी का अनादर किया ꠰ शायद एक लात मार दिया था, तो उस स्त्री ने ऐसा निदान बांधा कि मैं इस लात का बदला लूंगी ꠰ आखिर कुछ भवों तक वह बदला न चुका सकी ꠰ ज वह पुरुष तो हुआ सुकुमाल और यह भाभी हुई गीदड़ी (स्यालिनी) तो सुकुमाल जब विरक्त होकर वन में तपस्या कर रहे थे तो इस स्यालिनी ने उसे देखा और पूर्व भव का बैर उमड़ आया सो स्यालिनी और उसके दोनों बच्चों ने सुकुमाल की जंघा का मांस खाया था ꠰ बड़ा लहूलुहान कर डाला था ꠰ पैर ही तो मारा था सो पैर की जंघा का ही भक्षण किया ꠰ उस समय भी सुकुमाल ने धीरता रखी और आत्मध्यान में बराबर लीन रहे ꠰ उसके प्रताप से यह सर्वार्थसिद्धि गए ꠰ ठीक है अभी वह मुक्त न हुए, कुछ थोड़ी सी कसर रह गई थी, मगर होगा सर्वार्थसिद्धि का स्थान कहां है ? स्वर्गों से ऊपर नवग्रैवेयक, नव अनुदिश, फिर 5 अनुत्तर में बीच का सर्वार्थसिद्धि है ꠰ कि तैंतीस सागर तक सर्वार्थसिद्धि के सुख भोगकर बाद में मनुष्य होकर मोक्ष चले जायेंगे ꠰ तो ऐसी कषाय अनंतानुबंधी होती है जो कि भव-भव तक साथ चलती है ꠰ इससे किसी भी जीव से कषाय न बढ़ाना चाहिए, खुद गम खा लें, धीरता धारण कर लें, ऐंठ न बगरायें, क्योंकि यह तो संसार है ꠰ कहां ऐंठ चल सकती इस जीव की ? तो जो संपत्ति के गर्व में आकर ऐंठ चला करती है वह बुरी चीज है ꠰ इसके मायने यह नहीं है कि वह कायर बनकर रहे, किंतु अन्याय न करे, इतनी ऐंठ न बनाये कि जिससे दूसरे जीव निरपराध दु:खी होवे ꠰ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, जिस कषाय में श्रावक का व्रत न हो सके, इस कषाय से मिथ्यात्व का बंध नहीं होता, पर श्रावक का व्रत न हो सके, इस प्रकार की कषाय का उदय है ꠰ प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ इस कषाय के उदय में महाव्रत नहीं हो सकता ꠰ उससे तो कम रही कषाय फिर भी तेज है ꠰ सकलव्रत के भाव नहीं बनते ꠰ संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ―जो संयम का घात तो न करे, मगर उसके साथ चलती रहे कषाय जिससे कि यथाख्यात चारित्र न बनेगा ꠰ पूरा संयम न हो पायेगा वह है संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ ꠰ ये कर्मों के नाम बोले जा रहे, यह जीव कर्म बांधता है, तो उनके उदय में ऐसा फल प्राप्त होता है ꠰ हास्य―हंसना, दूसरे का मजाक करना यह हास्य कषाय के उदय से होता है ꠰ रति―इष्ट वस्तु में प्रेम करना, अरति―अनिष्ट वस्तु से द्वेष जगना, शोक―रंज होना, भय―डर, जुगुप्सा―ग्लानि और पुरुषवेद, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद याने कामवासना होना, ये सब मोहनीय के भेद हैं ꠰

(558) जिनभावनायुक्त भव्य जीव द्वारा उच्छेद्य घातिया कर्मों में अंतराय कर्म की प्रकृतियां―अंतराय 5 प्रकार के हैं―(1) दानांतराय (2) लाभांतराय (3) भोगांतराय (4) उपभोगांतराय और (5) वीर्यांतराय, दान के भाव न हो सकें वह दानांतराय है, या दान देने में विघ्न बन जाये वह दानांतराय है एक भाई की बात है कि वह बड़ा धनिक था मगर अपने हाथ से वह दान न कर पाता था और उसका भाव यही रहता था कि मेरा धन किसी अच्छे काम में खर्च हो ꠰ यदि कोई घर का व्यक्ति दान देना चाहे तो उसे वह रोकता न था ꠰ और वह खुद कहता था कि भाई हमारा धन अगर कोई किसी धर्म स्थान में खर्च करे तो हमें उससे कष्ट नहीं होता, बल्कि खुशी होती, पर हम अपने हाथों दान नहीं दे पाते ꠰ तो भी किसी-किसी के अंतराय का उदय होता है कि दान देने का भाव होते हुए भी खुद किसी को दान नहीं देता ꠰ तो इस प्रकार की बात दानांतराय के उदय में बनती है ꠰ दान करते हुए कोई विघ्न आ जाये सो दानांतराय है ꠰ लाभांतराय―किसी चीज की प्राप्ति में विघ्न आये, भोगांतराय―पदार्थों के भोगने में विघ्न आये सो भोगांतराय ꠰ उपभोगांतराय―जो बार-बार भोगे हुए पदार्थों के उपभोग में अंतराय आये सो उपभोगांतराय, वीर्यांतराय―आत्मशक्ति में अगर कोई विघ्न आये तो वह वीर्यांतराय है ꠰ तो ये चार घातिया कर्म हैं उनको जिन भगवान आदिक पुरुषों ने नष्ट किया ꠰


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