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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 19

From जैनकोष



तुह मरणे दुक्खेण अण्णाणाणं अणेयजणणीणं ।

रुण्णाण णयणणीरं सायरसलिलाहु अहिययरं ।।19।।

(28) भाव के बिना क्या झूठ है―इस भावपाहुड़ ग्रंथ में यह सिद्ध किया जा रहा है कि भाव के बिना क्या झूठ है । वह भाव कौन सा ? अपने आपका जो सहजस्वरूप है, अपनी ही सत्ता के कारण जो अपने आपका स्वभाव है उस स्वभाव में यह मैं हूँ इस प्रकार का निर्णय जिसके हैं उसे कहते हैं कि भाव ठीक बना है और अपने स्वभावभाव को छोड़कर अन्य परवस्तुओं में ये मेरे हैं, परभाव में यह मैं हूँ, इस प्रकार का जिसके निर्णय बना हो उसके अज्ञान कहा जाता है । जिस ज्ञान से मोक्ष मिलता है उसे कहते हैं ज्ञान और जिस ज्ञान से संसार बढ़ता है उसे कहते हैं अज्ञान । तो एक भाव के बिना द्रव्यलिंग भी धारण किया मुनि भी बने, किंतु भावरहित होने से यह चारों गतियों में जन्म मरण के दुःख पाता रहा । इसका वर्णन पहले आ चुका है । अब जन्म सामान्य को चित्त में लेकर कह रहे हैं कि हे मुने ! तूने भाव के बिना बड़े-बड़े तपश्चरण भी किये फिर भी इतने जन्म धारण करने पड़े कि यदि इस तरह निरखा जाये कि माता के गर्भ में बसकर तूने जन्म ले लेकर इतने जन्म मरण किये कि तेरे मरने से अन्य-अन्य माताओं का जो रुदन हुआ है, ऐसा एक-एक भव का उन माताओं का एक-एक आंसू जोड़ा जाये तो रुदन करके उस रोने के जल से समुद्र बराबर जल भर जायेगा, इतने जन्म मरण किया । कोई मरता है तो लोग रोते हैं, मातायें रोती हैं, तो उन माताओं के एक भव के रोने का अगर एक-एक आंसू रखा जाये तो इतने भवों में तूने माता से जन्म लिया कि एक-एक बूंद जोड़ा जाने पर भी समुद्र भर जाये । इतनी बार तेरा जन्म हुआ, मरण हुआ । अब इस वर्तमान पर्याय में मोह करके तू पर्यायबुद्धि कर रहा है कि मैं मुनि हूँ, मैं तपस्वी हूँ, इस लिंग से मोक्ष जाऊंगा । यहाँ यहाँं ही रम रहा और तू उस ज्ञानमात्र भाव की सुध नहीं लेता कि जिस ज्ञानमात्र अनुभूति के बल से कर्म कटते हैं, मुक्ति मिलती है । यह निमित्तनैमित्तिक भाव अटल है । अगर भाव रागद्वेषमयी रखेंगे तो कर्म का बंध होगा । भाव से रहित होकर उपयोग में केवल ज्ञानस्वरूप को ही बसायेगा । अपने आप कर्म बिदा होंगे । धर्म के लिए जहाँ अनेक परिश्रम करते हैं लोग, उन्हें यह ध्यान में रखना चाहिए कि इस भाव के बिना ये सारे परिश्रम करना, नहाना धोना, मंदिर जाना, पूजा पाठ करना, व्रत तप उपवास आदिक करना ये सब व्यर्थ हैं । अपने अविकार ज्ञानस्वभाव की दृष्टि जगे बिना कर्म नहीं कट सकते यदि एक यह कुंजी प्राप्त कर ले कोई, अपने सहज ज्ञानस्वरूप का अनुभव पा ले कोई, तो उन प्रत्येक क्रियावों में रहकर यह जीव अपने को सुरक्षित समझेगा । अत: इस ज्ञानस्वरूप की आराधना बिना इतने जन्म मरण होते हैं कि जिसका कोई गिनती नहीं ।


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