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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 2

From जैनकोष



भावो हि पढमलिंगं ण दव्वलिंगं च जाण परमत्थं ।

भावो कारणभूदो गुणदोसाणं जिणा विंति ।।2।।

(2) भावीलिंग की परमार्थता―भाव है सो पहला लिंग है और इस ही के कारण द्रव्यलिंग में जैसा कि यथाजात रूप बताया है इस प्रथम लिंग की साधना की जाती है तो वास्तव में परमार्थ रूप तो भाव ही है, पर द्रव्यलिंग परमार्थ नहीं है । वह तो केवल एक भाव लिंग की साधना करने वाले की बाह्य परिस्थिति क्या होती है, उसकी मुद्रा है द्रव्यलिंग । गुणदोष का कारणभूत तो भाव ही है । यदि किसी साधक से भावकृत दोष हो जाये तो उसका प्रायश्चित्त विशेष है और जहाँ वचनकृत कोई अपराध हो जाये तो उसका प्रायश्चित्त कम है, क्योंकि जीव का होनहार तो भाव के अनुसार है । जब भाव विशेष शिथिल हो जाते हैं तो आय आदिक में भी शिथिलता आती है, पर मुख्य तो भाव हैं । इस भावपाहुड़ ग्रंथ में गुण और दोष का कारणभूत भाव होने से सर्वप्रथम गाथा में भाव गुण जिनके पाया गया है उनको नमस्कार किया था और नमस्कार किया था भावप्रधान आत्माओं को । पहला नमस्कार था अरहंत परमेष्ठी को, सो उनके भाव इतने विशेष थे मुनि अवस्था में साधक अवस्था में कि गुणश्रेणी निर्जरा से कर्मों की निर्जरा बढ़ती चली जाती है और ऐसे साधक मुनिजनों में श्रेष्ठ होते हैं गणधर, इनमें भी श्रेष्ठ हैं तीर्थंकर । तीर्थंकर भाव के फल को जो पहिचान चुका है, घातियाकर्म का जिसने नाश किया है वह सब भावों के द्वारा ही तो है, जो गुणश्रेणी निर्जरा रूप भाव है वह है क्या ? आत्मा के अविकार इस ज्ञानस्वभाव उपयोग दृढ़ हो जाना, फिर विचलित न हो सके, ऐसा जो ज्ञान में ज्ञान का एकमेक हो जाना है वह है भाव । जो कर्मों की निर्जरा का कारणभूत है ।

(3) धर्म का बीज परमार्थभाव―धर्म के लिए शांति के लिए करना क्या है ? अपने ज्ञान के द्वारा ज्ञानस्वरूप आत्मा को निहारें और ऐसा अनुभव बनायें कि ऐसा जो ज्ञानस्वरूप में ज्ञान उपयोग का रमना है वह है उत्कृष्ट भाव जिससे कर्म कटते हैं और कैवल्य अवस्था प्राप्त होती है परमार्थभूत भावलिंग का इस ग्रंथ में वर्णन चलेगा और इस ही भावलिंग के धारक हैं आचार्य, उपाध्याय और साधु, ये इन भावों का पालन करते हैं और अन्य जनों को इन शुद्ध भावों की शिक्षा दीक्षा देते हैं, तो ऐसे इस प्रथम भावलिंग का इस ग्रंथ में वर्णन होगा जिनेंद्र देव ने बताया है कि प्रधान भावलिंग ही है । जो पुरुष द्रव्यलिंग पर दृष्टि देकर यह मैं मुनि हूँ और उस द्रव्यलिंग के नाते से बड़े जीवरक्षा आदिक कार्यों में भी चले तो भी उसके मोक्षमार्ग जरा भी नहीं है यदि भावलिंग नहीं है तो । गुण तो हैं स्वर्ग मोक्ष, उत्तम गुण तो मोक्ष है, पर जो मोक्ष जाता है प्राय: करके ऊ̐चे से ऊ̐चे स्वर्ग और स्वर्ग से ऊपर के अहमिंद्र पद उसे प्राप्त होते हैं । यद्यपि अभव्य मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यलिंग धारण कर और मंद कषाय से तपश्चरण करके नवग्रैवेयक तक उत्पन्न होते हैं । मगर यहाँ सम्यग्दृष्टि जीवों की बात कही जा रही है वह भी स्वर्गों में और ग्रैवेयकों के एवं उससे ऊपर के अहमिंद्र पद में रहते हैं । तो जो एक रास्ता जा रहा है उसके बीच जो पगडंडियां आती हैं उनका भी उसके साथ महत्त्व बन जाता है ।

(4) भावों की दोषगुणकारणभूतता―दोष है नरकादिक, तो जैसे स्वर्ग और मोक्ष का कारण भाव है ऐसे ही नारकादिक दुर्गतियों का कारण भी भाव है, वह सद्भाव है, यह दुर्भाव है । तो भाव जो है यह गुण और दोष का कारण है, इसलिए भाव की शुद्धि करना चाहिए जीव को । बाह्य में क्या गुजरता है, किसका कैसा परिणाम है इस ओर यदि विकल्प जरा भी न रहे और अपने इस सहज ज्ञानस्वभाव का ही उपयोग रहे तो इस जीव का कल्याण है । कितने भव गुजर चुके । उन भवों में भी तो बहुतसा समागम था, लोग थे, जनता होगी, इज्जत चलती थी तो वे कैसे स्वप्न थे इस जीव के ? ऐसे ये भी स्वप्न हो जायेंगे । तो थोड़े दिनों के मिले हुए इन समागमों में अपने आपको बहा देना यह अपने लिए उचित बात नहीं है । तो भाव को ही गुण दोष का कारण जानें, उनमें उत्तम भाव तो गुण के कारण हैं और खोटे भाव दुर्गति के कारण हैं । मतलब इस जीव का जो कुछ होनहार है वह भावों के आधार पर है, इस कारण यहाँ भाव लिंग को प्रधान कहा है । जो सांचा मुनि और श्रावक है उसके उस योग्य भावलिंग रहता है सो द्रव्यलिंग को परमार्थ न जानना । भावलिंग को परमार्थ जानना । जैसा संतों ने द्रव्यलिंग धारण किया है याने सही जैनी दीक्षा ग्रहण की है, दिगंबर मुद्रा जिस शरीर की है वह मुनि भावलिंगी है, तो उसकी द्रव्यलिंग पर दृष्टि न रहेगी । द्रव्यलिंग चलता है, पर द्रव्यलिंग में ममता नहीं । द्रव्यलिंग को देखकर यह मैं हूँ, ऐसा भाव ज्ञानियों के नहीं आता ।

(5) छह द्रव्यों में जीव और पुद्गल में ही विभाव की संभवता―भावलिंगों को तो अपने भाव ही दृष्टिगत रहते हैं । जगत में 6 प्रकार के द्रव्य हैं―(1) जीव, (2) पुद्गल, (3) धर्म, (4) अधर्म, (5) आकाश और (6) काल, जिसमें जीव तो अनंतानंत हैं । पुद्गल उससे भी अनंतानंत गुने हैं, धर्मद्रव्य एक है, अधर्मद्रव्य एक है, आकाशद्रव्य एक है, कालद्रव्य असंख्यात हैं । इन अनंतानंत पदार्थों में जो जीवनामक पदार्थ है वह है चैतन्यस्वरूप । पुद्गल है रूप, रस, गंध, स्पर्श का पिंड । धर्म, अधर्म, आकाश, काल, यह अमूर्त द्रव्य हैं, इसका परिणमन निरंतर समान चलता है, क्योंकि ये चार द्रव्य कभी अशुद्ध नहीं होते, ये अमूर्त हैं, समान परिणमन हैं, सदैव शुद्ध हैं इस कारण इन द्रव्यों में अधिक कहने लायक कुछ नहीं है । शेष के जो दो प्रकार के द्रव्य हैं जीव और पुद्गल, ये अशुद्ध होते हैं । इनका जो भव भवांतर परिणमन चलता है वह भी ध्यान में आता है । पुद्गल का तो यह सब आंखों से दृष्टिगत हो रहा है और अनंतानंत पुद्गल आदिक ऐसे हैं जो आंखों से दृष्टिगत हो ही नहीं सकते । पुद्गल का एक भाव से, एक अवस्था से दूसरी अवस्थारूप परिणम जाना यह तो पुद्गल का भाव है, और जीव में दर्शन, ज्ञान, चारित्र, आनंद आदिक गुणों के परिणमन से जो परिणमन होता रहता वे सब जीव के भाव कहलाते हैं ।

(6) विभाव से हटकर स्वभाव में उपयुक्त होने में आत्मा की भलाई―जीव केवल अकेला परसंसर्ग के बिना हो तो उसकी सिद्धि में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र भाव होते हैं । और पुद्गल कर्म का निमित्त पाकर कर्म में मोह राग द्वेष होना यह विभाव परिणमन होता है । तो विभाव परिणमन तो प्रकट समझ में आ जाते हैं कि यह क्रोध है, मान है, यह माया है, लोभ है और उसकी जो बदल है वह झट समझ में आती है कि देखो यह जीव कैसा बदलता है, किंतु जो अनैमित्तिक सहजभाव है सम्यक्त्व ज्ञान चारित्ररूपी भाव हैं, ज्ञान का ज्ञान रूप से परिणत रहना सो ये भाव भी प्रति समय में नाना प्रकार के चलते हैं, मगर पूर्णतया समान होने से इनकी लोगों में प्रसिद्धि नहीं हो पाती कि ये भी कोई भाव हैं और इस तरह यह परिणम रहा है । तो भाव ऐसे जीव और पुद᳭गल में बनते जाते हैं । कुछ प्रति बोध के लिए सोचें―इनमें से जो पुद्गल के भाव हैं उनसे पुद्गल आदिक को कोई नुक्सान नहीं, क्योंकि वे जड़ हैं । काठ जड है तो जल जाये उससे उन स्कंधों में क्या नुक्सान है ? राग हो गया, उनके वेदना तो नहीं है । परिणमन मात्र है, पर जीव को इन परिणमनों में आकुलता निराकुलता, शांति अशांति वर्तती है इस कारण जीवों के लिए उपदेश है कि ऐसे भावों से अलग होओ, जो दुर्गति के कारण हैं और ऐसे भावों में आवो जो भलाई के कारण हैं, तो भावों को एक संक्षेप रूप से ऐसा विचार करें कि जितने इसमें औपाधिक भाव होते हैं वे तो सुख दुःख आदिक रूप बनते हैं और जो अनैमित्तिक सहज आत्मा के स्वरूप में परसंग रहित होता है वह सब आनंदस्वरूप भाव होता है । तो संक्षेप रूप में यह ही आदेश है कि नैमित्तिक भावों से तो हटना और स्वभाव में आना । नैमित्तिक भाव जब हटे तब हट जायेंगे पूर्णतया, पर नैमित्तिक भावों में श्रद्धा तो न रखें कि ये मेरे स्वरूप हैं । नैमित्तिक भावों में अपना उपयोग तो मत रमावें, उनसे विरक्ति करें और उनसे हटे हुए रहें, यह तो किया जा सकता है । सो नैमित्तिकभाव से तो हटना और स्वभाव भाव के अभिमुख होना, जो आत्मा का सहज चैतन्यस्वरूप है वही मैं हूँ ऐसा अपने आपमें अभिमुख होना यह कहलाता है भावलिंग ।

(7) देह की सकलसंकटबीजता―एक देह शरीर ऐसा विकट संबंध है कि यह बाह्यपदार्थों की तरह न्यारा नहीं है जो इस देह को अलग छोड़ दे और देह से अलग होकर ध्यान करने बैठ जावे । ऐसा जैसे बाह्य पदार्थों को छोड़ा जाता है उस तरह देह को नहीं छोड़ा जा सकता और देह जीव का है नहीं । यह तो चमगादड़ की तरह लिपटा हुआ गंदा देह है । इसका संबंध भी इस जीव के लिए अहितकर है । एक चमगादड़ की कथा है कि एक बार पशु और पक्षियों में विद्रोह हो गया । दो पार्टी हो गई इस विषय पर कि पशुपक्षियों से मिल जाते और पक्षी पशुओं से मिल जाते । तो वहाँ चमगादड़ ने क्या सोचा कि अपना ऐसा रूप बनावें कि मौका पड़े तो मेरी शुमार पशुओं में हो जाये तो ऐसी चमगादड़ की शक्ल बन गई कि वह पशु जैसा भी लगता और पक्षी जैसा भी । जैसे चार पैर और दांत होना तो पशु जैसी बात बन गई और पंख होना चिड़ियों जैसी बात बन गई । तो ऐसी चमगादड़ के माफिक जो देह है इसका बाह्य परिग्रह की तरह आत्मदेव से अत्यंत भिन्न स्वरूप है । यों तो अत्यंत जुदा है देह, मगर यह जीव के प्रदेशों में एक क्षेत्रावगाह है कि यह जीव से हट नहीं सकता । तो ऐसा चमगादड़ की तरह कठिन चिपका हुआ देह है । जितने भी कष्ट होते हैं वे सब इस देह के संबंध और ख्याल से होते हैं । किसी भी प्रकार का आप कष्ट आलोचना के लिए रखें, आपको देह का संबंध उसका कारण मिलेगा । क्षुधा तृष्णा आदिक तो शरीर के ही कष्ट हैं, पर सम्मान अपमान आदिक के जो कष्ट हैं सो देह में जब आत्मबुद्धि है और यह सोचे देह को निरखकर कि इस मुझ को कहा गया है तो उसका संक्लेश हो जाता है ।

(8) देह का व आत्मा का तथ्य विज्ञात होने पर शांतिमार्ग का दर्शन व वर्तन―यदि तथ्य जान ले कोई कि देह तो देह है, लोग देखते हैं देह को और जो कुछ कहते हैं वह देह को । मैं तो अमूर्त दर्शन, ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व हूँ । मेरा तो पहिचाननहार ही नहीं है । इसको कौन क्या कहेगा ? उसको अपमान नहीं महसूस होता । ज्ञानियों का और बल बल है ही क्या, जिस बल के कारण वे किसी भी विपत्ति में अधीर नहीं होते । वह है सहज ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व की दृष्टि का बल । तो ये तो सब दुर्भाव―सद᳭भाव स्वभाव विभाव जीव के व पुद्गल के भाव कहलाते हैं, और द्रव्य कहलाता है प्रदेशरूप । जैसे पुद्गल के जो परमाणु हैं वे पुद्गल के द्रव्य हैं, जीव के जो प्रदेश हैं वे इस प्रदेश में जो जीव अस्तिकाय है वह है जीव का द्रव्य । सो पुद्गल में तो संबंध हो होकर स्कंधरूप द्रव्य का बनाव होता है और जीवों में कर्म का संबंध पाकर नारकादिक, तिर्यंच, मनुष्य रूप द्रव्य का बनाव होता है । सो असमानजातीय द्रव्य पर्याय है इसलिए केवल जीव की बात नहीं बतायी जा सकती । हाँं जिस भव में यह जीव मोक्ष पाता है, मोक्ष अवस्था में पूर्ण देह में जो आत्मा का फैलाव है, ऐसा द्रव्य भाव का स्वरूप जानकर न तो द्रव्य के प्रदेश के ख्याल में आत्मा के भावों की प्रगति है और न जीव के विभावों के ख्याल में आत्मा के भावों की प्रगति है, और परद्रव्य के ख्याल में तो कहना ही क्या है । तो इन भावों से हटकर एक सहजज्ञान स्वभाव में उपयोग को लगावें । यह ही भावलिंग का आधार है ।

(9) द्रव्यलिंगमुद्रा में रहकर मुनि के भावलिंग की विशुद्धि का उद्यम―मुनि के भावलिंग है, इसका अर्थ क्या है कि इन मुनियों का उपयोग अविकार सहज ज्ञानस्वभाव के अभिमुख रहा करता है, बस इसकी ही बढ़वारी द्रव्यलिंग में रहती है कोई वस्त्र पहने हो, घर में रहता हो, कुटुंब बना हो और वह चाहे कि अविकार ज्ञानस्वरूप में अपने उपयोग की दृढ़ता का आनंद लिए रहा करूं, यह उससे नहीं बन सकता । जो इस धुन में बढ़ेगा, उसको यह चित्त में होगा कि यह घर का संबंध, कुटुंब का संबंध, वैभव का संबंध आत्मा के लिए अहित का करने वाला है, इसलिए उनका त्याग करता ही रहेगा । उसकी द्रव्यलिंग मुद्रा बन जायेगी, और वहाँ इस सहज ज्ञानस्वभाव की आराधना की साधना बनायेगा । तो कर्म किससे कटे ? भावों से कटे, द्रव्य से कर्म नहीं कटे । द्रव्यलिंग तो एक शरीर की स्थिति है, वह भी प्रयोग में आयी है, मगर कर्म कटने का निमित्त कारण शरीर का भेष नहीं है, किंतु जीव का निर्मल भाव है । तो जो कर्मक्षय का कारण भाव है, ऐसे भाव का वर्णन इस भाव पाहुड़ में चलेगा । उन भावों में दो विभाग बने―(1) विभावभाव और (2) स्वभावभाव । विभावभाव दुःखरूप हैं, वे पुद्गल कर्म के संपर्क का निमित्त पाकर हुए हैं । यदि ये अनैमित्तिक भाव हों विभाव, तो अरहंत सिद्ध में भी आ बैठे । ये स्वभाव भाव नहीं है । स्वभाव भाव ही जीव का आनंदमय भाव है, मोक्ष कहते ही हैं स्वभाव के अनुरूप विकास को । तो यदि स्वभाव विकास चाहिए तो स्वभाव की जानकारी श्रद्धा और स्वभाव में रमण का प्रयत्न आवश्यक होता है । तो स्वभाव भाव की सिद्धि में कारण हैं सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र । जिसका मूल सम्यग्दर्शन है । सम्यग्दर्शन के होते ही ज्ञान सम्यग्ज्ञान बनता है और चारित्र सम्यक्चारित्र बनेगा, सो ये तो हैं मोक्ष के हेतुभूत । विभाव हैं संसार के कारण । विभावों से हटना है, स्वभाव में आना है, इसका पूरक इस भावपाहुड़ ग्रंथ में स्वभावभाव रूप भावलिंग का वर्णन चलेगा ।


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