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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 62

From जैनकोष



जीवो जिणपण्णत्तो णाणसहावो य चेयणासहिओ ।

सो जीवो णायव्वो कम्मक्खयकरणणिमित्तो ।।62।।

(109) कर्मक्षय का कारणभूत आराधन―जिनेंद्र सर्वज्ञदेव ने जीव का स्वरूप ऐसा बताया है कि वह ज्ञानस्वभाव वाला है, हम आप जब अंतर्दृष्टि करके कुछ निहारने चलते हैं तो ज्ञानज्योति जाननस्वरूप, यह कला विदित होती है, सो वह ज्ञान स्वभावपने को प्रकट करता है । जीव ज्ञानस्वभावरूप है । तब ही तो उससे ज्ञान की वृत्तियां प्रकट होती हैं । ज्ञानस्वभावरूप क्यों है कि यह चेतन है, चैतन्यस्वभावमय है और चैतन्यस्वभाव सामान्य विशेषात्मक है, क्योंकि चैतन्यमात्र ही तो आत्मद्रव्य हैं और प्रत्येक द्रव्य सामान्यविशेषात्मक होता है । तो आत्मा में जो सामान्य चेतना है वह तो है दर्शनगुण और जो विशेष चेतना है वह है ज्ञान गुण, सो यह जीव ज्ञान दर्शन चेतना सहित है । तो ऐसे जीव की जब आराधना चलती है अर्थात् मैं यह हूँ, मैं यह हूँ, इस तरह का जब दृढ़ अभ्यास बनता है तो यह शब्दावलि भी शांत हो जाती है । यह अंतर्जल्प भी नहीं रहता है किंतु अपने को ज्ञानमात्र निरखकर ज्ञानरूप ही अनुभवन बनता है । तो ऐसा यह अनुभव कर्मों के क्षय का कारण रूप है ।

(110) ज्ञानस्वरूप आत्मा के स्वरूप की स्वीकारता में अद᳭भूत प्रकाश―यहाँं जीव को चेतनासहित बताया । इसमें उन सिद्धांतों का निराकरण हो जाता है जो जीव को चेतनासहित नहीं मानते, किंतु पृथ्वी जल अग्नि वायु का संयोगरूप मानते हैं । अच्छा, जीव को चेतनासहित सांख्य सिद्धांत वाले भी मानते हैं, किंतु वे ज्ञानस्वभावरूप नहीं मानते, ज्ञान को प्रधान का याने प्रकृति का धर्म कहते हैं । और, जीवन को उदासीनरूप नित्य, अपरिणामी चेतनारूप मानते हैं । सो ज्ञानस्वभाव है आत्मा, ऐसा कहने से उस एकांतमत का निराकरण हो जाता है । जीव यदि परिणमे नहीं तो जो वस्तु परिणमता नहीं है वह सत् ही नहीं हुआ करता । आखिर किसी न किसी दशा में तो वस्तु का रहना होता ही है । सो आत्मा ज्ञानस्वभावी है, चैतन्य स्वभावी है, परिणमन निरंतर करते रहने वाला है । सो जो स्वरूप है, स्वभाव है वह तो वही सदा रहता है किंतु परिणमन भिन्न-भिन्न समय में भिन्न-भिन्नरूप होते जाते हैं । सो यह जीव इस स्वभावरूप में जाना गया होकर कर्म के विनाश करने में निमित्त बनता है । यहाँ एक बात और समझना है कि जीव की आराधना गुण गुणी के अभेदरूप हुआ करती है । और गुण गुणी का अभेदरूप ध्यान बनना तब ही संभव है जबकि एकस्वरूप हो, तो यहाँ गुण गुणी में भेद नहीं है, रंच भी भेद नहीं है, किंतु प्रतिबोध के लिए संज्ञा लक्षण आदिक द्वारा उसमें भेद किया जाता है । तो जो नैयायिक आदिक गुणगुणी में सर्वथा भेद मानते हैं, गुण को अलग पदार्थ और द्रव्य को अलग पदार्थ मानते हैं तो इस आराधना के उपदेश में उस एकांत मत का निराकरण हो जाता है । तो जो जीव के स्वरूप को अपने स्वभावरूप से भाते हैं, उनके तो कर्म का क्षय होता है और जो जीव को अन्य विपर्यय रूप से भाते हैं उनके कर्मक्षय नहीं होता ।


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