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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 64

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अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेयणागुणमसद᳭दं ।

जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं ।꠰64।।

(112) आत्मा का असाधारण लक्षण―जीव का स्वरूप वचन के अगोचर है । वचन के अगोचर होने पर भी आत्मा अनुभवगम्य अवश्य है, क्योंकि अनुभव करने वाला स्वयं जीव है । तो जो ज्ञानमय पदार्थ है वह अपने आपके स्वरूप को न जान सके, यह अंधेर न होगा, जानता है । तो वह जीव स्वरूप क्या है उसका निरूपण इस गाथा में किया है―जीव, रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द से रहित है । इन 5 बातों में से रूप, रस, गंध और स्पर्श ये तो गुण हैं और पर्याय हैं । गुण तो यह ही है शक्तिरूप और इसकी जो अवस्था होती है वह है पर्याय, किंतु शब्द सिर्फ पर्यायरूप है । शब्द गुण नहीं है । हाँं शब्द जिनसे उत्पन्न होते हैं ऐसे भाषावर्गणा के जो पिंड हैं वे द्रव्य हैं और इनमें स्वयं रूप, रस आदिक गुण पाये जाते हैं । तो जीव में ये 5 ही बातें नहीं, न तो जीव में रसगुण है, न रूपगुण है, न गंधगुण है, और न स्पर्शगुण है और न जीव में इन चार गुणों की पर्यायें हैं । जैसे रस गुण की पर्याय है खट्टा मीठा आदि, रूप की पर्याय है हरा पीला आदिक, गंध की पर्याय है सुगंध दुर्गंध आदिक और स्पर्श की पर्याय है चिकना रूखा आदिक, ये भी जीव में नहीं हैं, शब्द पर्याय भी जीव में नहीं है, किंतु क्या है? चैतन्यगुण है । जीव चैतन्यस्वरूप है, वह किसी भी लिंग लक्षण के द्वारा, परिचय चिन्ह के द्वारा ग्रहण में नहीं आता । जैसे मीठी वस्तु का कोई वर्णन करे तो उस मीठी वस्तु का तथ्य शब्दों द्वारा समझ में नहीं आता, किंतु जब उसे खाये तो उससे समझ में आता है, तो ऐसे ही अनुभव गम्य है यह जीव पदार्थ । इस जीव पदार्थ में कोई संस्थान निर्दिष्ट नहीं है कि यह जीव चौकोर है, यह गोल है । हाँं जैसे दीपक मटके के अंदर रखा है तो उसका प्रकाश मटका रूप है, अगर कमरे में रखा है तो वह प्रकाश कमरेरूप है तो ऐसे ही जो जीव जिस देह में है उसका उतना ही प्रसार है किंतु स्वयं अपने आप इसका नियत आकार कुछ नहीं है ।

(113) भावों पर भविष्य की निर्भरता―जीव का सुधार अपने भावों के सुधार पर निर्भर है । भावों से यह जीव सुख दुःख पाता रहा तो भावों से ही सुख दुःख से छूटकर निर्वाण को पायेगा । अनादि से अब तक यह जीव अपने ही भावों के विकार से अपने को अनुभव करता रहा और जन्ममरण के दुःख सहता रहा । इन दुःखों में भी किसी दूसरे का हाथ न था । तो अब दुखों से छूटना है तो अपने ही भावों की सम्हाल करना है, उससे ही दुःखों से छुटकारा प्राप्त हो जायेगा । अपने भावों की सम्हाल से मौलिक सम्हाल है आत्मा का ज्ञान । आत्मा का अपने आप सहज जो भी स्वरूप है, अपनी ही सत्ता के कारण स्वयं का जो स्वभाव है, उस स्वरूपमात्र अपने को जानना, अनुभवना, यह संसार के दुःखों से छूटने का उपाय है ꠰ तो अपने को वैसा समझना चाहिये, वास्तविकता क्या है इसी का वर्णन इस गाथा में चल रहा है । अपने को अनुभव करो कि मुझमें क्या है और क्या नहीं है, इस तरह का ज्ञान बनाओ और उस द्वार से फिर अपने आपके अंत: प्रवेश कीजिये ।

(114) आत्मा की स्वरूपमात्रता व अमूर्तता―मैं रसरहित हूँ, रस पुद्गल द्रव्य का गुण है, पुद्गल द्रव्य की परिणति है, पुद्गल का भाव है, उससे इस मुझ जीव का क्या संबंध? मैं न रस वाला हूँ, न स्वयं रस हूँ और न रस को यों व्यक्त समझने का वर्तमान बाह्य साधन द्रव्येंद्रिय मैं हूँ । द्रव्येंद्रिय याने स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु आदिक, ये रंच भी कुछ नहीं जानते, किंतु ये सब जानने के साधन हैं । जानने वाला यह आत्मा है । सो इस विषय का जो ज्ञान है वह भावेंद्रिय कहलाता है । उस भावेंद्रिय से भी मेरा तादात्म्य नहीं अर्थात् भावेंद्रिय क्षायोपशमिक भाव है । मैं रस को ही जानता हूँ, पर केवल रस को ही नहीं जानता, सबको जानता । जानने का मेरा स्वभाव ही है । तो केवल रस को जानने से क्या मैं रसरूप हो जाऊंगा? नहीं, मैं तो उससे अत्यंत भिन्न हूँ । मुझमें रस नहीं, रूप नहीं, गंध नहीं, स्पर्श नहीं, शब्द नहीं । पंचेंद्रिय के विषयभूत इन 5 बातों से मैं अत्यंत निराला हूँ । ये पौद्गलिक हैं । प्राय: लोग इस देह को देखकर इस देहरूप अपने को अनुभवते हैं सो ऐसा समझते हैं कि मैं काला हूँ, गोरा हूँ आदि, अनेकरूप अपने को मानते हैं, पर यह मैं आत्मा आकाशवत् निर्लेप हूँ, अमूर्त हूँ, अपने को ऐसा ही अनुभव करो कि जैसे आकाश अमूर्त है वैसे ही मैं भी अमूर्त हूँ । आकाश तो अनंतप्रदेशी सर्वव्यापक है, मैं अनादि से बंधन में चला आया, ऐसा मैं जिस शरीर में पहुंचता हूं उस शरीर के ही आकार रहता हूँ । रहूं किसी भी आकार में, यह तो एक कारण की बात है, मगर मैं अमूर्त हूँ, मुझमें रूप, रस, गंध, स्पर्श नहीं है, शब्द तो पुद्गल द्रव्य के संयोगवियोग से होने वाली एक पर्याय है और रूप, रस, गंध, स्पर्श आदिक ये शक्ति भी हैं और पर्याय भी है । परिणमन पर दृष्टि दें तो पर्याय हैं और सदा रहने वाली शक्तियों पर दृष्टि दें तो गुण हैं । मैं इन रूप नहीं हूँ ।

(115) आत्मा की चैतन्यगुणमयता―मैं रसादि नहीं हूँ तो फिर क्या हूं ? चेतना गुण हूँ, अमूर्त होने पर भी जिसमें चेतना है, जानन है, ज्ञान है, प्रतिभास है, ऐसा एक अद्भुत पदार्थ मैं जीव हूँ । अब समझ लीजिए कि ऐसे चेतना गुण वाले मुझ जीव का किसी भी अन्य द्रव्य के साथ क्या संबंध है? एक द्रव्य का दूसरा द्रव्य कुछ नहीं होता । न स्वामी है, न कर्ता है, न भोक्ता है । प्रत्येक द्रव्य अन्य समस्त द्रव्यो से पृथक् स्वतंत्र सत्ता वाला है । मैं भी अपने ही स्वरूप में अपनी स्वतंत्र सत्ता रखता हूँ, अनंत हूँ । इसका किसी दूसरे पदार्थ से कोई संबंध नहीं । एक तो जीव को साधारण घटना रूप से देखना और एक अपने आत्मा को अपने सहज स्वरूप में निरखना । घटनारूप से भी देखें तो यह जीव किसी दूसरे पदार्थ का कुछ नहीं करता । हाँं उसका योग और उपयोग निमित्तमात्र होता है । सो वहाँ निमित्तपने से बढ़कर यह जीव कर्तारूप में मानने लगता है? मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है । मैं आत्मा भी भावों के सिवाय अन्य कुछ कर ही नहीं सकता । हाथपैर का उठाना, चलना फिरना आदिक इन क्रियावों को भी यह जीव नहीं करता । जिस जीव की चर्चा चल रही है उस स्वरूपमात्र जीव इन क्रियावों का निमित्त भी नहीं है, पर उस जीव में कुछ योग और उपयोग होता है । मायने चेतना गुण के परिणमन में तो उपयोग बना और आत्मा के प्रदेशों से योग बना । मायने भीतर हलन-चलन होना, प्रदेशों में परिस्पंद होना यह तो है योग और किसी पदार्थ में अपना दिल जाना, उपयोग लगना यह हुआ उपयोग । सो ये योग और उपयोग ये भी उठने बैठने की क्रियावों के कर्ता नहीं है, किंतु ये निमित्तमात्र हैं । जीव में योग हुआ, उपयोग हुआ, इच्छा हुई, भावना जगी, इन बातों का निमित्त पाकर शरीर में वायु का संचरण हुआ और चूंकि जिस प्रकार की इच्छा की थी उसके अनुरूप वायु का संचरण हुआ, तो उसी के अनुरूप हाथ पैर चले । वस्तुत: मैं जिसमें आत्मा का अनुभव करूं या जो सहजस्वरूप है, वह इन क्रियावों का करने वाला नहीं है । योग उपयोग निमित्त हैं । तो जब मैं सिवाय अपने भावों के कुछ कर ही नहीं सकता तो फिर अन्य द्रव्यों से मेरा क्या संबंध रहा और फिर क्यों मैं अन्य पदार्थों को विकल्पों में इतना छाकर रहूं? यह सब भ्रम रूप है जिससे यह जीव बड़ा परेशान है । लोग तो सोचते हैं कि मेरा अच्छा घर हैं, मेरा परिवार अच्छा है, मुझको बड़ा सुख है और वे अपने में संतोष की श्वास लेते हैं, मगर यह सब एक अज्ञान भरी बात है । अज्ञानी जीव को पता क्या कि ये सब विपत्तिरूप हैं । जिसे यह ज्ञान जग गया कि मैं आत्मा चैतन्यस्वरूपमात्र हूँ उसे ये सब विपत्तिरूप लगते हैं ।

(116) चैतन्यमयता के साक्षात् परिचय का उपायभूत मनन―जीव का बाहरी बातों में उपयोग जगना यह तो जीव के लिए कलंक है और यह उसके लिए बड़ी भारी विपत्ति है । इस जीव का यह कलंक तब मिटेगा जब कि यह मोक्षमार्ग में बढ़ेगा, चलेगा और अरहंत सिद्ध अवस्था पायेगा । मैं चेतनागुण मात्र हूँ, यह अनुभव करना । और भैया सीधे सादे रूप से इन शब्दों में अनुभव कीजिए कि मैं अमूर्त हूँ, ज्ञानमात्र हूँ । अमूर्त हूँ, ऐसा सोचने के साथ ही आकाशवत् जिसे कहो शून्य, कुछ भी पिंड नजर न आये, इस तरह का अपने को अनुभवना और ज्ञानमात्र कहते ही केवल ज्ञानस्वरूप, जो जान रहा है उस ही जानन का स्वरूप अपने में अनुभवना, ऐसी मुख्य ये दो बातें आने पर याने अपने को अमूर्त और ज्ञानमात्र अनुभवने पर इसके भीतर आत्मदृष्टि जगती है और ऐसा अलौकिक अनुभव आता है कि सारे संकटों का बोझ दूर हो जाता है । तो यह मैं परमार्थत: चैतन्यगुण स्वरूप हूँ ।

(117) अलिंग अंतस्तत्त्व की अलिगग्रहणता―इस अपने अंतस्तत्त्व को, अपने ज्ञानस्वरूप को हम किसी लिंग से पहिचान नहीं सकते । जिसकी यह श्रद्धा और दृष्टि बनी हैकि मैं पुरुष हूँ वह कभी आत्मदर्शन नहीं कर सकता । जिसमें यह सत्य श्रद्धा बनी है कि मैं स्त्री हूँ अथवा पुरुष हूँ अथवा नपुंसक हूँ, वह आत्मदर्शन नहीं कर सकता । आत्मदर्शन की तैयारी पर जब आये तो इन सब पर्यायोंरूप अपन को भूलना होगा । मैं इन सब रूप नहीं हूँ ऐसा निर्णय करना होगा । मैं यह देह ही नहीं हूँ, फिर स्त्री पुरुष आदिक की तो कथा ही क्या है? शरीर से ही जब मैं न्यारा हूँ तो वे तो सब एक समान हैं । आत्मा चाहे पुरुष रूप हो चाहे स्त्री रूप हो, वह सब पूर्णतया एक समान स्वरूप वाला है, इसमें पुरुष स्त्री का कोई फर्क नहीं है, बल्कि जो अपने को पुरुष माने अथवा स्त्री माने वह अपना विघात कर रहा है । वह अपने आपका दर्शन नहीं कर सकता । इन चिन्हों को, इन लिंगों को बिल्कुल भूल जाना होगा । ये मैं कुछ नहीं हूँ । मैं तो एक अमूर्त चेतनामात्र हूँ । जब मैं ये पुरुष, स्त्री आदिक रूप वाला भी नहीं हूँ तो फिर इन धनवैभव आदिक वाला अथवा इन रूप तो मैं हो ही कैसे सकता हूं? इस कुटुंब परिवारवाला भी मैं नहीं हूँ । ये कुछ भी मेरे नहीं हैं फिर भी जिनको बड़ा मोह है धन वैभव कुटुंब परिजन आदिक में वे तो अनंत संसारी प्राणी हैं । उनमें और पशु-पक्षियों में कोई अंतर नहीं है, बल्कि उनसे कोई-कोई पशु पक्षी अच्छे हैं, क्योंकि उनके भी विवेक हो सकता है । होता जिन किन्हीं बिरलों को है । वह जिंदगी भी क्या जिंदगी है जो मोह में लिपटी हुई जिंदगी है । वह तो एक मूर्खतापूर्ण जिंदगी है । सत्य बात ध्यान में लाइये कि मैं इन सबसे निराला केवल चेतनामात्र हूँ । यह किसी लिंग से चिन्ह से परिचय में नहीं आ सकता । इन लिंगों की तो अत्यंत उपेक्षा हो । मानो वे हैं ही नहीं । ऐसी तीव्र उपेक्षा होने के साथ यह जीव जब स्वरूप में चले बर्ते तो इसको पता पड़ सकेगा कि मैं यह आत्मा हूँ । अनेक लोग मोहवश मिथ्यात्व वश यह समस्या रख देते हैं कि हमें दिखाओ कि आत्मा कहां है? अरे यह आत्मा इन चर्म इंद्रियों से दिख ही नहीं सकता, बल्कि इंद्रियों से देखने का कोई प्रयत्न करे तो नियम से वह अदृश्य रहेगा । यह तो ज्ञान के ही द्वारा ज्ञानस्वरूप अनुभव में आता है । जो अपनी स्थिति यह बना पायगा कि ज्ञान से ज्ञान में ज्ञान ही हो, कल्पनाओं का इकदम विलय हो वह पुरुष इस भगवान आत्मा का दर्शन कर पायगा । तो यह परमार्थ आत्मतत्त्व अलिंगग्रहण है । किसी लिंग के द्वारा ग्रहण में नहीं आता ।

(118) आत्मा की संस्थानरहितता―इस जीव का कोई संस्थान नहीं है, कोई आकार नहीं है । इस जीव का आकार होकर भी उसे निराकार बताना यह तथ्य किन-किन दृष्टियों से है । जीव में आकार स्वयं सहज नहीं । यदि यह जीव धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य की तरह सहज ही पर्याय से भी निर्मल शुद्ध होता तो इसका आकार नियत रहता । धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य सहज लोकाकाश में व्यापक है, मगर ऐसा जीव कभी नहीं हुआ कि जो अनादित: पर्याय से स्वयं शुद्ध हो । यह जीव अनादि काल से कर्मों में बंधा, अनेक शरीरों में आया नाना आकाररूप चल रहा है । कैसा विचित्र निमित्तनैमित्तिक भाव है । कीड़े में जीव है तो कीड़े के शरीरप्रमाण ही तो यह जीव रहा, हाथी में जीव है तो वहाँ हाथी के शरीरप्रमाण जीव रहा । आज मनुष्य है तो मनुष्य के शरीरप्रमाण जीव रहा । जिस-जिस शरीर में यह जीव गया उस-उस शरीर के आकार यह जीव रहा । यह अन्य तरह कैसे हो? जब शरीर में यह बद्ध है तो यह कैसे अन्य आकार में जाये? भले ही समुद्धात की स्थितियों में कुछ स्थितियों से अन्य आकार बन जाता है मगर मूल शरीर तो नहीं छोड़ता । तो नाना आकारों में जो यह जीव रहा है तो वह देहबंधन के कारण रहा है । यदि इन नाना आकारोंरूप में कोई अपने को देखे, जैसे इस पैर में भी जीव है इस हाथ में भी जीव है, इस अमुक हिस्से में भी जीव हैं, तो उसे इस आत्मा भगवान के दर्शन नहीं होते । भले हो उन सब हिस्सों में जीव है मगर इस तरह हिस्से के निगाह से उस-उस आकार में जीवको देखे तो उसे भगवान आत्मा के दर्शन नही होते । जीव की नाना परिणतियां बन रही हैं जैसे जीव क्रोधी है घमंडी है, लोभी है, सुखी है, दुःखी है, शांत है आदिक । इन सब परिणतियों पर भी दृष्टि दें और इन परिणतियों की निगाह से भी देखें तो वहाँ इस भगवान आत्मा का दर्शन नहीं होता । इस भगवान आत्मा का दर्शन होता है भावों रूप से ही जीव को देखने पर । इस भावपाहुड़ ग्रंथ में भावों की नाना विशेषतायें बताकर इस दर्शन ज्ञानस्वरूप सामान्य भाव में अपने को उपयोगी बनाना चाहिये । यहाँ यह शिक्षा दी जा रही है कि मैं ज्ञानसामान्य हूँ । जीव का आकार तो ऐसे बनता है संसार में देहबंधन के कारण और जब मोक्ष होता है देह को छोड़ता है यह जीव तो वहाँ फिर यह घटता बढ़ता नहीं क्यों, कि घटे तो बढ़ने के पसंद वाला प्रश्न करेगा कि क्यों घटा और बढ़े तो घटने के पसंद वाला ऐसा प्रश्न करेगा कि, क्यों बड़ा शरीर में रहकर तो शरीर के अनुसार घटने बढ़ने का कारण शरीर बंधन है । शरीर से अलग होने पर घटने बढ़ने का क्या काम? कर्मरहित होने पर, शरीर से जुदा होने पर यह जीव उसी आकार में रहता है । सिद्ध लोक में पहुंचा हुआ जीव उसी आकार में बना हुआ है जिस आकार में रहते हुए यह मुक्त हुआ है । उसका स्वयं का अपने सत्त्व के कारण कोई आकार निर्णीत नहीं है और फिर आकार से मतलब क्या? आकार पर ही दृष्टि दें तो वहाँ भगवान आत्मा के दर्शन नहीं होते, वह तो एक जानकारी सी हुई, परिचय भर हुआ कि आत्मा ऐसा है मगर ज्ञान में ज्ञानमग्न हो जाये आत्मा में यह उपयोग रम जाये, ऐसी बात भावों से विचारने पर ही बनेगी, पर आकार आदिक से विचारने पर न बनेगा । तो जिसका कोई आकार नहीं ऐसा यह जीव परमार्थ है ।

(119) आत्मानुभव से कर्मप्रक्षय―अहा, अमूर्त, ज्ञानमात्र, निराकार आत्मा को निरखिये, ऐसा आत्मा को निरखने के लिए प्रथम प्रयत्न यह होगा कि किसी भी बाहरी पदार्थ में उपयोग न जाये, कोई भी पर पदार्थ ख्याल में न आये । बाह्य पदार्थ ख्याल में न आयें यह बात इस ज्ञानबल पर हो सकेगी । इन बाह्य वस्तुओं से मेरा क्या मतलब? सब अपनी-अपनी सत्ता लिए भिन्न-भिन्न हैं, इनसे मेरा न सुधार, न बिगाड़ न कोई संबंध । कुछ भी बात नहीं है, बल्कि इनका ख्याल बनाकर मैं अपने आपको बरबाद कर डालता हूँ । तो मेरी ऐसी क्या अटकी है जो इन बाहरी पदार्थों में मैं अपना दिल फंसाऊं । ज्ञानीजन अपने ज्ञान के बल पर इन बाहरी पदार्थों का ख्याल छोड़ देते हैं, और जहाँ इन समग्र बाह्य पदार्थों का ख्याल छोड़ा वहाँ स्वयं ही यह ज्ञान सहज ही अपने ज्ञानस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यह उपयोग हमारे आत्मा में ही रहे, यह ज्ञानस्वरूप को ही देखता रहे, इस स्थिति में जो आनंद जगता है वह आनंद जगत के प्राणियों को मिलता नहीं इसलिए पंचेंद्रिय के विषयों को भोगने और उनके साधन जुटाने में ही रात दिन उनका उपयोग लगा है । आत्मानुभव का आनंद वह आनंद है कि जिसके प्रताप से भव-भव के बंधे हुए कर्म तड़- तड़ टूट जाते हैं । धर्म यही है बाकी तो ये बहुत बड़े बिगाड़रूप है या यों कहो कि मिटने के लिए, बरबाद होने के लिए जो व्यसन हैं उनसे हटने के साधन हैं । मंदिर आना साधर्मी जनों की सेवा करना, शास्त्रस्वाध्याय करना, जप तप, व्रत आदि करना, विधि विधान करना आदिक ये सब उस बिगाड़ से बचने के साधन हैं, कर्म काटने के साधन नहीं है । कहीं मंदिर में आने या ये सब धार्मिक क्रिया कांड कर लेने मात्र से कर्म नहीं कटा करते । जिन-जिन बाहरी बातों को लोगों ने धर्म माना है उनसे कर्म नहीं कटते, कर्म मैं कांटूं ऐसी कर्म पर दृष्टि देने से भी कर्म नहीं कटते, अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपं ऐसा चिल्लाने और ढेरों धूप खे देने से भी कहीं कर्म नहीं कटते, कर्म तो कटते हैं अपने इस सहज ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व के अनुभव से, दूसरा कोई उपाय नहीं है कर्मों के मूलत: काटने के लिए, पर यह बात कोई कर सके तो उसके लिए है । अपना ज्ञानस्वरूप अपने ज्ञान में आवे इसके लिए जो तैयार होता है वह इन स्थितियों में आता है । वह मंदिर आयेगा, स्वाध्याय करेगा, व्रत, तप, त्याग आदि करेगा, साधर्मी जनों की सेवा करेगा, सारे धार्मिक क्रियाकांड करेगा, ये सब साधन हैं? इनमें गुजरते हुए वह अपने ज्ञानस्वरूप आत्मा का ध्यान बनायेगा । जैसे चावल और चावल का छिलका, तो छिलके के बिना चावल कहां रहेगा, मगर छिलका ही चावल नहीं है, ऐसे ही मंदिर, विधिविधान आदिक बिना यह जीव कहां अपनी साधना बनायेगा मगर ये सब धार्मिक क्रियाकांड स्वयं धर्म नहीं हैं । धर्म है, अपने आत्मा का ज्ञानमात्र अनुभव, जिसमें कोई विकल्प नहीं उठता उसी आत्मा का इस गाथा में वर्णन किया गया है ।


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