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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 76

From जैनकोष



पयलियमाणकसाओ पयलियमिच्छत्तमोहसमचित्तो ।

पावइ तिहुवणसारं बोही जिणसासणे जीवो ꠰꠰76꠰।

(176) मानकषाय को प्रगलित करने वाले के बोधि का नाम―आत्मा को शाश्वत प्रदान करने वाला रत्नत्रयभाव है । यह उपयोग अपने आत्मस्वरूप को छोड़कर कहीं भी जाये, तो जैसे मछली अपने आवास को (तालाब को) छोड़कर यदि बाहर गिर जाये, तो वह तड़फती है इसी तरह यह उपयोग अपने आत्मस्वरूप को छोड़कर बाहर पड़ जाये तो यह भी तड़फेगा । तड़फता ही है । तो यदि अपनी तड़फन मिटाना है, अशांति, संकट दूर करना है तो अपने स्वरूप में आना चाहिए, इसी को कहते हैं बोधि प्राप्त हो, मायने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक᳭चारित्र प्राप्त हो, इसे कौन प्राप्त करता है उस ही को इस गाथा में कह रहे हैं । जो पुरुष मान कषाय को गला चुका है वह बोधि को प्राप्त करता है । जिसके मान कषाय है उसका उपयोग बाहर खिंचा रहता है । अपने स्वरूप को देखता तो मान कषाय क्यों होती? पुरुष को सबसे अधिक मान कषाय है इसलिए सर्वप्रथम इस ही की बात कही जा रही है । मान कषाय अपने आत्मा के सही परिचय से कटती है, अन्य कोई उपाय नहीं है । मैं मान कषाय न करूं इसकी प्रतिज्ञा नहीं हुआ करती है कि जैसे कोई प्रतिज्ञा कर लेता है कि मैं रोज देवदर्शन करूंगा, मैंने आलू छोड़ दिया, यह तो सब निभा लिया जायेगा, पर मैं मानकषाय का त्याग करता हूँ, यह भावना तो बनेगी, पर प्रतिज्ञा न बनेगी । प्रतिज्ञा क्यों नहीं बनती? मानकषाय प्रकृति का उदय आ गया, जीव में झलका, जीव विवश हो जाता है, जिसको मोह है वह मान करेगा ही । मान मिटता है तत्त्वज्ञान से ।

(177) मात्र के गलन का उपाय तत्त्वज्ञान―भैया, यह तो नियम कर सकते कि में दूसरे के आगे हाथ जोड़कर बैठा रहूंगा, पर तत्त्वज्ञान बिना यह न निभेगा कि मैं मानकषाय न करूंगा । यह उसके निभेगा जिसको अविकार ज्ञानस्वभाव की श्रद्धा है, नहीं तो हाथ जोड़कर बैठने में क्या मान कषाय नहीं बनती? यह तो आज की सभ्यता भी बन गई । यह मान कषाय की विधि बन गई कि प्रेमपूर्वक बोले, दूसरे के सम्मान की बात बोले, यह भी एक तरह की विधि बन गई कि लोक में इस ढंग से भी मान कषाय करते हैं । तो मान कषाय का छूटना यह आत्मज्ञान पर निर्भर है, तब ही यह ज्ञानी अपने स्वरूप को समझता है कि मैं स्वरूपत: ज्ञानमात्र हूँ और इस ज्ञानस्वभाव का कार्य ज्ञानवृत्ति जगते रहना है । बस जाननमात्र परिणमन करते रहना है । यह मेरी स्वाभाविक कुल की विधि है । इसमें विकार नहीं होता । विकार तो पौद्गलिक कर्मों के उदय का निमित्त पाकर होता है, ऐसा जिसको बोध है उसमें यह बल आता है कि वह मान कषाय का लगाव न रखेगा, मैं अपने स्वरूप की ओर ही रहूंगा, वह मान कषाय को दूर कर सकता है । फिर उसकी क्या प्रक्रिया होती हैं? विचार में, तर्कणा में वह जानता है कि मान किस बात का करना? जगत में कौन सी चीज सारभूत हैं जिसको पाकर मान किया जाना चाहिए । जगत में कौन से जीव ऐसे मेरे खास हैं या मेरे कुछ हैं जिनके पीछे मुझे मान करना चाहिए? क्योंकि सब जीव भिन्न हैं । किसको क्या दिखाना?

(178) मान कषाय का मूल पर्यायव्यामोह―मान आता है पर्याय बुद्धि में । जिस जीव को अपने देह में मान है कि मैं यह हूँ, आत्मा का मान नहीं है, किंतु शरीर को निरखकर मान रहा कि मैं यह हूँ यह मैं हूँ, और जिसको माना कि यह मैं हूँ उस बढ़वारी में, उत्कृष्टता में उसको लगन होगी । यदि आत्मा को मानता कि यह ज्ञानस्वरूप मैं हूँ तो मानरहित होकर ज्ञानस्वरूप की बढ़वारी करता और जब शरीर को माना कि यह मैं हूँ तो अब यह शरीर की बढ़वारी करेगा, तो शरीर की बढ़वारी मान कषाय को उत्पन्न करती है । पर्यायबुद्धि सब कषायों को तीव्र बनाने की जड़ है । तो जब तक यह बात न आयेगी चित्त में कि मैं इस देह से तो प्रकट भिन्न हूँ, पौद्गलिक कर्मों से भी भिन्न हूँ, तब तक कषायों से विरक्ति न होगी । कर्मों का उदय होने पर जो चित्रण होता है, उपयोग पर जो झलक होती है कर्मों की उससे भी में निराला हूँ । मैं तो केवल ज्ञानस्वरूप मात्र हूँ, यह बोझ जिसको होगा वही मान कषाय को गला सकता है । जब शारीर में दृष्टि है कि मैं हूँ, तो उसकी कोई भी कषाय नहीं गल सकती । क्रोध भी रहेगा पद-पद पर । शरीर के पोषक या शरीर को सुखकारी जो बाहरी विषयभूत पदार्थ हैं उनमें बाधा किसी के द्वारा समझी गई उस पर क्रोध जगेगा । और उसी तरह मान जगेगा फिर देह को पोषने वाली चीजों के जुड़ाव के लिए कपट करेगा और लोभ भी रहेगा । जब तक जीव के पर्यायबुद्धि है तब तक कोई कषाय नहीं मिट सकती, इस कारण सबसे पहले मोह को दूर कीजिए । पर्यायबुद्धि कहो, मोह कहो, अज्ञान कहो, सब एक ही बात है । अज्ञान दूर हो तो कषायें दूर हो सकती हैं ।

(179) धर्मार्थी को धर्मयोजना में शीघ्रता―तीन लोक में सारभूत इस रत्नत्रयभाव को वह जीव प्राप्त करता है जिसके मान कषाय गल गयी है । तीन लोकों में सारभूत इस रत्नत्रय विभूति को वही प्राप्त कर सकता है, जिसका मिथ्यात्व मोह गल गया, और समता में चित्त लग गया । जीव अपनी शांति के लिए रात दिन खूब पुरुषार्थ कर रहे हैं, चाहे उन्हें शांति मिली हो या न मिली हो यह दूसरी बात है, मगर देखो रात दिन पौरुष बना रहे हैं । कमाई करते हैं, परिवार के बीच बड़ी ठसक से बैठते, बड़ा हर्ष मानते, बाहर देश विदेश फिरते न जाने क्या-क्या कार्य नहीं कर डालते हैं, पर शांति का रास्ता तो बड़ा सुगम है, स्वाधीन है । उस पर दृष्टि जाये, वहाँ पहुंच बनायें तो शांति मिलेगी, अन्यथा शांति न मिलेगी । इतना धन हो तब शांति मिले, यह झूठ बात है या मैं अपनी ऐसी लौकिक स्थिति बना लूं तो शांति मिलेगी, यह भी बेकार बात है । कितने ही पुरुष ऐसे अब भी पाये जाते हैं जिन्होंने कभी यह सोचा था कि मेरे को इतना वैभव हो जाये फिर मुझे कुछ नहीं करना, ध्यान ही ध्यान में समय बिताऊंगा । मगर जब उतना वैभव हो गया तब यह सब बात भूल गए । अब तो वे तृष्णा में बढ़ गए । तो यह बात क्यों बनी? यों कि मोह तो नहीं गला ? मोह गल जाये तो उसे यह भी भाव न आयेगा कि मेरे पास इतना वैभव हो तब मैं धर्म करूंगा । वह तो वर्तमान स्थिति में चाहे गरीबी की परिस्थिति हो चाहे कैसी ही परिस्थिति हो, कैसी भी स्थित हो उस ही स्थिति में धर्म का योग जुड़ायेगा । जिसे कल्याण की लगन है वह यह क्यों सोचेगा कि मेरे पास इतना वैभव हो जाये तब मैं धर्म करूंगा? वह तो उस ही क्षण से चाहे गरीबी की दशा हो, चाहे कैसी ही स्थिति हो वहाँ ही धर्म का योग जुड़ायेगा तत्त्वज्ञान, स्वाध्याय सत्संग आदिक जो भी चाहिए, उनमें उसी क्षण से वह अपना समय बितायेगा । कितने ही लोग बड़े होने पर और कुछ धर्मध्यान की बात चित्त में आने पर बड़ा पछतावा करते हैं कि मैंने अब तक का जीवन व्यर्थ ही खोया । बचपन से ही मेरे में क्यों ऐसी बुद्धि न जगी? यदि बचपन में मेरे में ऐसी बुद्धि जगी होती तो बचपन से ही मैं धर्म साधना करता और आज मैं अपने को बड़ी अच्छी स्थिति में पाता । मगर कहां से यह बुद्धि जगे? इस जीव में मोह बसा है, अज्ञान बसा है ।

(180) मोह मिथ्यात्व के गल जाने पर समता के प्रताप से त्रिभुवनोत्तम बोधिका लाभ― मोह मिथ्यात्व के गल जाने से जब चित्त में समता आती है तो वह जीव तीन लोक में सारभूत इस रत्नत्रयरूप लक्ष्मी को प्राप्त करता है जिससे कि समता भाव जग गया है । सब जीव एक समान हैं, सब जीवों में चैतन्यस्वरूप है । सब जीव मेरे से अत्यंत भिन्न हैं, सब जीव मेरे स्वरूप से पूर्ण समान हैं । जब ऐसी समता की बुद्धि जगती है तब वह रत्नत्रय विभूति को प्राप्त करता है । सुख दुःख जो भी हालत आयी प्रथम तो यह भ्रम है । किसी परवस्तु का उपयोग लगाया, इष्ट अनिष्ट बुद्धि की, सुख दुःख मानने लगे । बाह्यपदार्थ हैं, अत्यंत भिन्न हैं, उनसे क्या लेना देना और फिर जो कुछ आ भी जाये तीव्र उदय में सुख दुःख तो इसमें भी समता की बुद्धि रखनी है । दुःख है सो विकार, सुख सो विकार, मुझे जैसे दुःख न चाहिए ऐसे ही मुझको सुख भी न चाहिए । ज्ञानी पुरुष की यह दृष्टि बनती है कि दुःख भी बुरे और संसार के सुख उनसे भी बुरे । दुःख में तो प्रभु का ध्यान रख सकते हैं, किंतु सांसारिक सुख में प्रभु का ध्यान नहीं, आत्मा का ध्यान नहीं, तो वहाँ तो बड़ी मलिनता बनती है और इसीलिए बताया कि यह पुण्य तो नरक भी भेज देता है । कैसे भेजता? पहले पुण्य किया, राजा बन गए, राजा बनकर अन्याय किया । जिस चाहे को सताया, जैसा चाहे अभिमान का भाव भरा, नरकायुबंधी, नरक चले गए । उस पुण्य के उदय से वैभव मिला था । अगर वैभव न मिलता तो संभव है कि इतनी तीव्र कषाय न करता । कभी तो ऐसा भी दिखता है । तो जिसने आत्मतत्त्व का ज्ञान किया वह सुख दुःख में समान रहेगा । उसके मान कषाय दूर हो जायेगी । उसके मोह मिथ्यात्व तो रहा ही नहीं । तो मोक्ष का मार्ग बिल्कुल स्पष्ट हो जायेगा । ऐसा जीव तीन लोक में सारभूत बोधि को प्राप्त करता है, सो यह सब जिनशासन में रहकर उस प्रकार की वृत्ति करने का माहात्म्य है ।


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