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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 92

From जैनकोष



दस दस दो सुपरीसह सहहि मुणो सयलकाल काएण ।

सुत्तेण अप्पमत्ता संजमघादं पमोत्तूण ꠰꠰92꠰।

(285) सहज परमात्मतत्त्व की दृष्टि की धुन में परीषहविजय की आसानी―हे आत्मकल्याण चाहने वाले साधु, तू भगवान की वाणी के आज्ञा प्रमाण प्रमादरहित होकर संयमका घात न करके 22 प्रकार के परीषहों को सहन कर । देखो किसी गृहस्थ को जिसको धन की बड़ी तेज धुन लग गई है वह धन कमाने की धुन में कितना दुःख सहता है न? कहां-कहां जाता? किस-किससे लेन-देन करता, कितना ही परिश्रम करता है, कितने ही कष्ट सहता है फिर भी वह, उस कार्य को करता है । यह सब क्यों होता है कि उसको धन अर्जन करने की तीव्र धुन हो गई हैं, इसलिए उसको संकट कुछ महत्व नहीं रखते । धन महत्त्व रखता है तो यह तो हुई संसारी जीवों की बात । अब यहाँ देखिये―जिसको अपने ज्ञानस्वरूप की धुन हो जाये, ज्ञान से ज्ञान में ज्ञान ही हो, इस ही बात की जिसको धुन हो जाये तो उस पर कुछ भी संकट आये, भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, मच्छर अपकान आदिक कितने ही उपसर्ग आयें, वे उसको कुछ महत्त्व नहीं रखते । उनका सहलेना उनके लिए अनंत आसान रहता है । यह तो मोही जीव सोचते हैं कि ये साधु देखो कैसा कठिन परीषह सह रहे हैं । पर उनको कहां है परीषह? जिनको ज्ञान की धुन लगी है, और ज्ञान में ही तृप्त रहते हैं उनके लिए संकट कुछ नहीं है, परीषह कुछ नहीं है, परीषह कुछ नहीं है । ऐसे परीषह 22 प्रकार के होते हैं । जैसे भूख का दुःख सहना, प्यास का दुःख सहना, ठंड, गर्मी का दुःख सहना । ज्ञान की धुन में सर्व परिग्रह उसने छोड़ दिया था, वस्त्र तक की भी वह चिंता न चाहता था । सर्व परित्याग कर दिया, अब जो सहज बात हो सो रहो । तो ऐसी स्थिति में भी लज्जा ग्लानि न करना, किसी से द्वेष न करना यह सब उसे कर्तव्य चाहिए ना? सो जो उसके विरोधी परीषह हैं उनकी ओर दृष्टिपात तक भी नहीं है क्योंकि उस ज्ञानी को तो ज्ञान आराधना की तेज धुन लगी है ꠰

(286) सहजात्ममनन में अप्रमत्तता व संयमपूर्ति―मैं ज्ञानमात्र हूँ, और ऐसा ध्यान बनाकर उसने अलौकिक आनंद पाया है । इस कारण उसके लिए संकट कुछ भी संकट नहीं मालूम होते । सो हे मुने तू अंतर में ऐसा ध्यान बना कि जिससे परीषह समतापूर्वक सह लिए जायें । सो इसी विधि में तू अप्रमत्त रह पायगा, मायने कषाय का अनुभवन हो, मोक्ष के मार्ग में ज्ञानस्वरूप की आराधना में रंच भी प्रमाद न रहे, ऐसी स्थिति बनेगी । और इस ज्ञान की धुन में, इन परीषहों के विजय में संयम का घात भी नहीं है । जैसे कोई जानवर खाने आया (साधुवों की बात कह रहे) और उस समय जो उसे जानवर से द्वेष हुआ, या उसके संबंध में कुछ अपने में विषाद माना तो संयम का घात हो गया ꠰ संयम मायने शुद्ध आत्मा का ज्ञानोपयोग आत्मस्वरूप ही रमे, बाहरी पदार्थों में ख्याल न लाये, यह है वास्तविक संयम, अथवा अन्य कोई आरंभ न करने लगे संकटों को दूर करने के लिए यह है संयम । सो हे मुने ! तू संयम का घात मत कर और परीषहों को जीतकर अपने ज्ञानस्वरूप की आराधना में लग, ऐसा आत्मसाधना में लगने वाले पुरुष को समझाया गया है ।


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