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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 94

From जैनकोष



भावहि अणुवेक्खाओ अवरे पणवीसभावणा भावि ।

भावरहिएण किं पुण वाहिरलिंगेण कायव्वं ꠰꠰94꠰।

(290) भावरहित बाह्यवेश की अप्रयोजकता―हे साधु तू बारह अनुप्रेक्षाओं का चिंतन कर, 25 भावना का चिंतवन कर, क्योंकि भाव से रहित मात्र बाहरी भेष से क्या किया जा सकता है? अर्थात् कुछ भी नहीं किया जा सकता । कोई अपने पुजावा की चाह से या घर की परिस्थिति भली नहीं, इस कारण से या घर में कुछ लड़ाई वगैरह हुई, किसी कारण से दूसरे साधुवों का सम्मान देखकर अगर निर्ग्रंथ भेष धारण कर लिया तो उससे मोक्षमार्ग की प्राप्ति नहीं है । भावसहित होकर निर्गंथ भेष में हो तो वहाँ मोक्षमार्ग में प्रगति है । तो यह बात बनेगी चिंतन आत्ममनन से होती है । इस कारण हे साधु ! तू बारह अनुप्रेक्षावों का चिंतवन कर । अनुप्रेक्षा के मायने, अनुसार प्रकृष्ट ईक्षण करना, अनुप्रेक्षा में तीन शब्द हैं―अनु प्र ईक्षा, जैसा आत्मा का स्वभाव है वैसा यह आत्मस्वभाव दृष्टि में आये, उस ढंग से प्रकृष्ट निगरानी करना, बार-बार चिंतवन करना इसका नाम है अनुप्रेक्षा ।

(291) अनित्य भावना में अनित्य से उपेक्षा कर नित्य में उपयुक्त होने का पौरुष―अनित्यभावना । यदि यह ही यह कोई रट लगाये कि राजा मरेंगे, राणा मरेंगे, छत्रपति मरेंगे, पड़ोसी मरेंगे, मैं मरूंगा, जो जन्मा है सो मरेगा, तो इतने मात्र से अनुप्रेक्षा नहीं बनती, इससे तो घबड़ाहट बढ़ेगी हाय मर जाना होगा, सब मर रहे हैं, मैं कैसे बच सकूंगा, यों सोच-सोचकर वहाँ घबड़ाहट बनेगी । अनुप्रेक्षा कहाँ बनी? अनुप्रेक्षा तब बने जब यह दृष्टि रहे कि पर्याय अपेक्षा मरण है । शरीर का संयोग है, उससे विकार होते हैं ये सब सांसारिक बातें हैं । मैं तो नित्य हूँ, अमर हूँ, ध्रुव हूँ, मेरी सत्ता का कभी विनाश नहीं होता । यों आत्मस्वभाव के अनुसार वहाँ दृष्टि जगे वह है अनित्य अनुप्रेक्षा । अनित्य के लिए, रोने के लिए यह भावना नहीं है, किंतु नित्य जानकर उससे लगाव हटाकर नित्य में प्रवेश करने के लिए यह भावना है । यह हुई अनुप्रेक्षा ।

(292) अशरण अनुप्रेक्षा में शरण्य स्वतत्त्व का शरण ग्रहण―अमरण भावना में निगरानी करें । मेरे को शरण नहीं है, केवल इतनी ही बात दिखे बाहर में कि ये सब धोखा देने वाले हैं, कोई मेरा सहाय नहीं और मरते वक्त तो कुछ भी शरण नहीं, इतने से अनुप्रेक्षा नहीं बनती । यह तो उसका प्रारंभिक रूप है, पर इह द्वार से यह जानकर कि बाहर में कुछ भी कारण नहीं, उनका लगाव छोड़े और जो वास्तविक शरण है उसकी दृष्टि करें, आत्मा का आत्मा ही शरण है उसकी दृष्टि करें । आत्मा का आत्मा ही शरण है, एक यह दृष्टि जगे, मैं स्वरूपमात्र हूँ, ज्ञानमात्र हूँ, शाश्वत शुद्ध हूँ, इसमें कष्ट का नाम नहीं । स्वरूप निहारो, परिपूर्ण हूँ, ऐसी दृष्टि रखने वाले को वास्तविक शरण लिया है और जो बाहर-बाहर ही अपने में लगाव करे वहाँ कुछ शरण नहीं ।

(293) संसार अनुप्रेक्षा में माया से हटकर परमार्थ में उपयुक्त होने का पौरुष―संसार भावना में चिंतन करना कि संसार असार है । देखिये एक तो झुंझलाई दशा में बोला जाता है―भाई ने धोखा दिया, स्त्री ने धोखा दिया, लड़कों ने धोखा दिया, मित्रों ने धोखा दिया । अरे कुछ नहीं, सब बेकार हैं यह जो झुंझलाने की आवाज है और ऐसी आवाज तो शायद घर-घर में दो चार दिन में एक बार सब कह लेते होंगे, क्योंकि झंझट हैं ना अनेक, पर इससे संसार भावना नहीं बनती । स्वरूपदृष्टि होनी चाहिए । हां संसार असार है, क्योंकि यह मायारूप है । माया किसे कहते हैं? अनेक पदार्थों के संयोग से बनी घटना को माया कहते हैं, लक्षण लख लो और सब लोगों से पूछ लो, जो लोग माया-माया चिल्लाते हैं―प्रकृति, माया, पुरुष, ब्रह्म, उनसे भी जरा पूछो कि माया का अर्थ क्या है? तो आपका यह लक्षण ऐसा है कि सर्वत्र घटित करते रहें । एक पदार्थ को कहते हैं परमार्थ और अनेक पदार्थों के संबंध से हुई बात को कहते हैं माया । हम आपको जितना यह कुछ दिख रहा है, बताओ यह परमार्थ है कि माया? यह माया है, अनंत परमाणुओं के संयोग से बना है, और जितने बैठे हैं ये सब परमार्थ है कि माया? ये भी अनेक पदार्थों के संबंध से बने हैं, माया है । तो जरा घर में जिन-जिनसे नेह लगाया हो उन उनका नाम ले लेकर प्रश्न तो करो । जिसे लड़का माना बताओ वह वास्तविक है माया ?....माया । जो देह लगा है बताओ यह वास्तविक है कि माया?....माया । इस माया के लगाव से क्लेश ही क्लेश है । परमार्थ की धुन में परम आनंद है । यह सब संसार माया है, यह असार है, किंतु परमार्थभूत जो मैं ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व हूँ यह ही मेरे लिए सार है । मैं भी क्या निःसार हूँ ?....नहीं, असार तो माया है, मैं तो सहज आत्मस्वरूप हूँ सो यह सारभूत हूँ । असार को छोड़े, सार को ग्रहण करें, यह है अनुप्रेक्षण । जैसे स्वभाव का विकास हो उसके अनुसार निरीक्षण करना अनुप्रेक्षा है ।

(294) एकत्व अनुप्रेक्षा में परमार्थ एकत्व का ईक्षण―एकत्वभावना―दुःखों से घबड़ाये हुये पुरुष बोल देते हैं―कोई किसी का नहीं, सब अकेले हैं, अकेले ही कर्म भोगते, अकेले ही जन्मते हैं अकेले ही मरते हैं । देखिये―ये ही शब्द तत्त्वज्ञानी बोले तो उसने पाया है तत्त्व और ये ही शब्द झुंझलाया हुआ व्यक्ति बोले तो उसने कुछ नहीं पाया । और यह तो एक ऊपरी एकत्व है, पर वास्तविक स्वरूप का जो एकत्व है उसकी भावना करनी है―मैं यह एक अखंड ज्ञानात्मक पदार्थ हूँ । जिसकी एकत्व पर दृष्टि है । उसको कष्ट नहीं । बाहर में कुछ हों रहा है तो उसको चिंता नहीं । यह बाह्य पदार्थों का परिणमन है । मैं तो यह अखंड ज्ञानस्वरूप हूँ, यह है एकत्व अनुप्रेक्षा ।

(295) अन्यत्व अनुप्रेक्षा में अन्य के अन्यत्व का चिंतन और उसका प्रयोजन―अन्यत्व अनुप्रेक्षा में चिंतन चलता है कि सब अन्य हैं, भिन्न हैं, दूसरे हैं, मेरा नहीं है कुछ । कोई तो दुःख से घबड़ाकर बोलता और ज्ञानी स्वरूपदृष्टि रख कर बोलता कि प्रत्येक पदार्थ का अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से सत्त्व है और अन्य पदार्थ अन्य के स्वरूप में प्रवेश करता नहीं । जगह में प्रवेश करना और बात है, स्वरूप में प्रवेश करना और बात है । स्वरूप में तो पर पदार्थों का किसी में प्रवेश नहीं है । यदि प्रवेश हो जाये तो स्वरूप का अभाव हो जायेगा । बिगड़ा होकर भी स्वरूप में अन्य का प्रवेश नहीं है, पर बिगड़ा नाम किसका कि निमित्त के सन्निधान में उपादान अपने आपमें विकाररूप परिणमता है तो वह है बिगाड़ । पर ऐसा बिगाड़ होने पर भी स्वरूप में बिगाड़ नहीं है, उस द्रव्य में बिगाड़ नहीं है, उस पदार्थ में बिगाड़ है । स्वरूप में बिगाड़ नहीं है । पदार्थ से स्वरूप निराला नहीं, फिरभी यह जच रहा है । यह कितना तीक्ष्ण ज्ञानदृष्टि का दर्शन है । जल गरम हो गया, अग्नि का संयोग पाकर । जलने अपनी शीत अवस्था विलीन कर उष्ण अवस्था उत्पन्न कर ली । अब पूछें कि जल का स्वभाव गरम है कि जल गरम है? तो यह कह देंगे कि जल गरम है, पर यह न कहेंगे कि जल का स्वभाव गरम है । कितनी एक अद्भुत बात है कि स्वभाव कहीं अलग नहीं पड़ा जल से और स्वभाव का वहाँ विकास भी नहीं है, फिर भी यह दम भरकर कहते हैं लोग कि जल का स्वभाव गरम नहीं है । दृष्टांत है । यद्यपि जल स्वयं कोई एक द्रव्य नहीं, वह भी परिणमन है, पर एक मोटा दृष्टांत है । आत्मा रागद्वेष आदिक रूप चल रहा है । तो यह जीव तो इस अज्ञानभाव से परिणत हो रहा है मगर जीव का स्वभाव विकाररूप नहीं । जीव विकारी है उस काल में, जब कि विकृत है, मगर स्व स्वभाव विकारी नहीं । तो यहीं से परख लीजिये कि बिगड़ा होने पर भी स्वभाव की उपासना करना धर्मपालन है । कोई बिगाड़ को मना करे तो धर्मपालन की जरूरत क्या? बिगाड़ ही नहीं है । कोई विकार को मना करे तो विकार से हटने को चिल्लाते क्यों? तो स्वरूपदृष्टि करके एक-एक वस्तु को परखा, वहाँ समझ में आया कि एक का दूसरा कुछ नहीं है । अनंतानंत देह के परमाणु इस समय लगे हैं । अनंतानंत कर्मपरमाणु लगे हैं, उनमें से एक भी अणु इस जीव का कुछ नहीं है । सत्त्व सबका निराला है इस तरह से देखना यह है अन्यत्व भावना ।

(296) अशुचित्व अनुप्रेक्षा में अशुचिता का चिंतन और भूमि अंतस्तत्त्व का ईक्षण― अशुचि अनुप्रेक्षा, यह देह अपवित्र है, हाड़, मांस, मज्जा, लोहू, चमड़ा, रोम और जिसकी दुर्गंध और भीतरी मल, मूत्र, पीप आदि कितनी ही दुर्गंधित वस्तु का यह पिंड है । पर मोही पुरुष इस अपवित्रता पर दृष्टि नहीं देता है और चाम चादर लाल, पीली, सफेद चिकनी है उसमें यह दृष्टि लगाता है कि देखो इसमें कितनी सुंदरता है कितनी एक अच्छी वस्तु है, इस तरह की दृष्टि अज्ञानी जीव के होती है, जब कि ज्ञानी को इस शरीर के भीतर का खाका सामने नजर आता है । कहीं तो देखा भी होगा हाड़ का पिंजरा अस्पतालों में या कहीं जहाँ शिक्षा दी जाती है । एक मनुष्य का हाड़ का पिंजरा खड़ा कर देते हैं जिसमें एक-एक पसली दिखती है । बच्चों की पढ़ने की किताबों में तो इस तरह का छपा हुआ दृश्य दृष्टि में आये, इस तरह से देखने पर यह शरीर बड़ा अपवित्र लगेगा ! लगे अपवित्र, इतने पर भी अभी सही मायने में अनुप्रेक्षा नहीं हुई । उसके मुकाबले में प्रतिपक्ष में अंतस्तत्त्व को भी तो देखें । यह ज्ञानस्वरूप आत्मा परम पवित्र है । पवित्र को निरखने का प्रयोजन है कि अपवित्र से हटकर पवित्र स्वरूप में आवो । यह है अशुचित्व अनुप्रेक्षा ।

(297) आत्मपवित्रता और उसका प्रभाव―कोई भव्य प्राणी अपने ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व को निरखकर उस ही में लीन हो तो मानो उसे यो कहो कि वह खुद में खो गया । स्वयं में लीन हो गया, उस समय उसकी पवित्रता का भान करें, पवित्र हो जायेगा । ऐसे ही पवित्रता का जहाँ संबंध हो वहाँ शरीर की भी पूजा होने लगती है । जहाँ पवित्रता समाप्त हुई वहाँ शरीर पर डंडे बरसते हैं । कोई पुरुष गाली बके, हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह पाप में बढ़े, असद्व्यवहार हो तो वह है आत्मा की अपवित्रता । उस पवित्र आत्मा के संबंध से तो शरीर भी लोगों के द्वारा पूजा जायेगा । जहाँ आत्मपवित्रता हैं―सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का भाव बसा है तो कहते हैं ना कि रत्नत्रय से पवित्र शरीर से ग्लानि न करो, बल्कि प्रीति करो, भक्ति करो, सेवा करो । साधु जनों को नहाने की जरूरत नहीं, फिर भी पवित्र । जो पाप करे सो नहाये, और-और बातें करे, अनेक दंड भोगे, वह नहाये । और जो निष्पाप है, जिसकी आत्मदृष्टि है वह तो समझता है कि नहाने से पाप हो जायेगा । न जाने किस जीव पर पानी पड़े और वह दुःखी हो जाये । और फिर इस शरीर की क्या नहा धोकर सफाई करना । यह दृष्टि जगती है ज्ञानस्वरूप की धुन होने पर । और कोई गृहस्थ अगर मुनियों की होड़ करे कि मुनि भी तो नहीं नहाते सो हम भी नहीं नहाये, यह सोचकर 10-10, 15-15 दिन न नहाये तो उसकी यह भूल है । उसकी तो ऐसी दशा समझो कि जैसे गाड़ी में जुतने वाले बैलों के पैरों में नाल ठोकी जाती है तो एक मेंढकी भी उसे देखकर अपने पैरों में नाल ठोकाने चली । अरे भावसहित किया हो तो वह सार्थक है । भावसहित किया एक वह पवित्र वातावरण है कि जिसमें से गुजरते हुए भावों में प्रगति कर लो । निर्ग्रंथभेष में रहकर निःशल्य होने का अवसर मिलता है वहाँ आत्मसाधना द्वारा मोक्ष मिलता है । वहाँ भी यह निर्णय रखना कि निर्ग्रंथभेष से मोक्ष नहीं मिलता, किंतु आत्मदृष्टि से मोक्ष मिलता, मगर वह आत्मदृष्टि निर्ग्रंथ भेष में रहे बिना बन नहीं पाती । मोक्ष मिलता है आत्म उपासना से, न कि मात्र शरीर के भेष से । सो हे साधु पुरुष ! भावों से रहित मात्र बाह्य लिंग से सिद्धि नहीं है, अत: अपनी आत्मदृष्टि की भावना कर ।

(298) आस्रवानुप्रेक्षा में आस्रव की दुःखकारिता का कथन―साधुजनों को उपदेश है कि भावरहित बाह्य लिंग से कुछ प्रयोजन नहीं सधता, अत: बारह अनुप्रेक्षावों को भावो । अभी तक अशुचि भावना का वर्णन हुआ था अब आस्रवभावना की बात सुनो―आस्रव का अर्थ है चारों ओर से स्रवण होना, चूना । जैसे बरसात में कभी छत कोई नीचे गीली हो जाती है, एक-एक बूंदसा दिखता है वह चूना कहलाता है । इसी प्रकार आत्मा में चारों ओर से कर्मों का आना होता है, कर्मों के आने का एक रास्ता नहीं है कि पैर की ओर से आये कि सिर की ओर से आये । आत्मा के एक क्षेत्रावगाह में कार्माणवर्गणायें भरी पड़ी हैं । तो जैसे ही मिथ्यात्व, कषाय, अविरित भाव का निमित्त पाया कि कामार्णवर्गणायें कर्मरूप परिणम जाती हैं, इसे कहते हैं आस्रव । ये आस्रव बहुत दुःख देने वाले हैं । अन्यत्र ऐसा कथानक है कि एक सन्यासी गुरु के अनेक शिष्य थे । तो गुरु ने विचार किया कि अपने बाद किसे उत्तराधिकारी बनायें, तो गुरु ने उन शिष्यों की परीक्षा ली । क्या किया कि एक-एक चिड़िया दे दी । और यह कहा कि इसे ऐसे एकांतस्थान में जाकर वध करो जहाँ कोई दूसरा देखता न हो । तो और तो सभी शिष्यों ने किसी एकांतस्थान में उस चिड़िया का वध किया, पर एक शिष्य को कहीं भी एकांत न दिखा, उसकी समझ में यह बात बैठी हुई थी सर्वत्र भगवान व्यापक है, और कोई यदि नहीं देख रहा तो भगवान तो देख ही रहा । इसलिये उसने उस पक्षी का वध न किया । उसने बहुत-बहुत एकांतस्थान ढूंढा―पर्वत, नदी, श्मशान, जंगल गुफा आदि, पर उसे कहीं एकांत न दिखा और वह सीधा गुरु के पास चला आया । तो उससे पूछा गुरु ने कि बेटे तुमने इस पक्षी का वध क्यों नहीं किया? क्या तुम्हें कोई एकांत स्थान नहीं मिला? तो वह शिष्य बोला गुरुजी मैंने तो बहुत-बहुत ढूंढा एकांत स्थान, पर कहीं एकांत न दिखा, हमें तो हर जगह भगवान दिखाई दे रहे थे, मान लो यहाँ तो कोई नहीं देख रहा था । पर भगवान तो देख रहे थे, इस लिए हमने इस चिड़िया का वध नहीं किया । तो ठीक है, यहाँ कोई कितना ही लुक छिपकर पाप करे, पर कर्मों का आस्रव तो जरूर होगा । इसमें कैसे पर्दा डाला जा सके । और, आस्रव हुआ तो उसी समय कषाय भी है तो स्थिति बंध भी होता है । अब अपने समय पर उदय उदीरण के काल में वे कर्म अपने आप भयंकर रूप धारण करेंगे । और उस समय यह जीव ज्ञानस्वरूप से विचलित होकर खुद अज्ञानरूप में परिणम कर अपना नाश करेगा । तो यह आश्रय दुःखदायी है ।

(299) आस्रवअनुप्रेक्षा में अंत: स्वनिरीक्षण―आस्रव के आने के द्वार हैं मन, वचन, काय । वास्तव में तो कषाय है आने का द्वार, योग है आने का द्वार, मगर उस योग का व्यक्ती करण मन, वचन, काय की क्रिया से होता है इसलिए उसका नाम दिया जा रहा है । बेचारा शरीर जड़ है उसका क्या अपराध है कि हाथ अगर यहाँ से उठाकर दूसरी जगह रख दिया तो आस्रव हो गया । वस्तुत: द्रव्य मन, वचन और काय की चेष्टा से आस्रव नहीं होते, पर यह चेष्टा हुई क्यों ? भीतर में कोई वासना बनी तब चेष्टा हुई? तो वासना की बात इस पर आरोप करके कही जाती कि मन, वचन, काय की चेष्टा से आस्रव होता है, अथवा एक यह कर्तव्य समझने के लिए कि हम मन, वचन, काय को वश न करेंगे तो कर्मों का आस्रव चलता रहेगा । आस्रव दुःखकार घनेरे, गुणवंत तिन्हें निरवेरे, यह हैं आस्रव की कथा, मगर यह आस्रव ही आस्रव देखते रहे तो अब वास्तविक अनुप्रेक्षण नहीं हुआ । आत्मा को तो देखो वह निराश्रव है । आत्मा का स्वरूप स्वभाव अविकार है । जो कि स्वयं सत् होता, जो उसका सहज स्वरूप है वहाँ विकार का गंध नहीं है । केवलज्ञान और ज्ञान की वृत्ति, ज्ञान ज्योति का परिणमन इतनी ही बात स्वरूप में पड़ी है, बाकी बात तो संपर्क वश हुई है । अपने आपको निराश्रव निरखना यह है आस्रव अनुप्रेक्षा ।

(300) संवरानुप्रेक्षा में संवर उपकारी तत्त्व की आदेयता―संवर अनुप्रेक्षा, संवर कहते हैं रुक जाने को, कर्मों का आस्रव रुक जाये आस्रव न हो सके उसको संवर कहते हैं । आते हुए कर्म रुक जायें, यह संवर का अर्थ नहीं है । आते हुए को कौन रोकेगा? पर आना ही न हो इसे कहते हैं संवर । इन कर्मों का आना रुके तो इस जीव को मोक्षमार्ग में प्रगति मिलेगी । और भावसम्वर की दृष्टि से देखें तो विभाव परिणाम न हो सके, ऐसा ज्ञानबल बढ़ावें, ऐसा सहजस्वभाव की दृष्टि दृढ़ करें कि वहाँ विभावों की न अपनाया जाये, स्वभावदृष्टि ही बनी रहे तो वहाँ भावसम्वर होता है । संवर उपकारी तत्त्व है । संवर स्वरूप खुद आत्मा है । आत्मा अकेला है, उसमें संवर स्वरूप है । तो ऐसे संवर स्वरूप अंतस्तत्त्व का निरीक्षण करें यह है संवर अनुप्रेक्षा ।

(301) निर्जरानुप्रेक्षा में भावनिर्जरा की साधना का महत्त्व―निर्जरा अनुप्रेक्षा कर्मों के झड़ने को निर्जरा कहते हैं । जैसे पीछी में से पंख झड़ते हैं, कोई पंख पूरा नहीं झड़ता, थोड़ा-थोड़ा रेसा निकलता रहता है । तो रेसा-रेसा निकलकर कुछ ही दिनों में वह पिछी ठूठ जैसी हो जाती है ꠰ पूरा निकलने का नाम निर्जरा नहीं है । वह तो कहलायेगा मोक्ष, और उन कर्मों में से कुछ परमाणु निकल गए, कुछ बदल गए, उनका क्षीण होना यह कहलाया निर्जरा । निर्जरा तत्त्व इस जीव का उपकारी तत्त्व है । पर अंतर में देखें, भावनिर्जरा स्वभावदृष्टि की प्रखरता से विभावों का झड़ना है, वासनाओं का मिटना यह है भावनिर्जरा । जिसको भावनिर्जरा है उसके उपभोग की दशा में भी उपभोग बंध का कारण नहीं होता । यद्यपि रागांश के अनुसार बंध है, मगर विशेषता यह बतायी कि वर्तमान उपभोग में राग न होने से, उसके भोगने का राग न होने से वह नवीन बंध का कारण नहीं बनता सो निर्जरा ही हो गयी । विषयों का राग और विषयों को भोगने का राग इन दो में कुछ अंतर है ना? पदार्थों का राग और पदार्थों को चिपटाने का राग इन दो में अंतर है । परिस्थितिवश पदार्थों में राग चलता है । अगर राग न चले तो गृहस्थ क्या गृहस्थी में रह सकता? नहीं रह सकता । ज्ञानी भी गृहस्थ होते हैं, उनके भी राग चलता है, नहीं तो वे गृहस्थी में रह कैसे सकते? मगर उन्हें राग में राग नहीं होता । पदार्थ को चिपकाने में राग नहीं है कि यह मेरे सदाकाल बना रहे, इस भोगने का राग न रहने से भावनिर्जरा होती है । यह निर्जरा तत्त्व जीव का उपकारी है ।

(302) लोकानुप्रेक्षा में लोकभ्रमण मिटाने के अर्थ भावशुद्धि की प्रेरणा―लोकानुप्रेक्षा―लोक का स्वरूप विचारना । लोक कितना बड़ा है ? भगवान ने जैसा दिव्यध्वनि में बताया, गणधरों ने जैसी वाणी झेली, आचार्य संतों ने जैसा विस्तार बताया, वैसा लोक के आकार का चिंतन करें । बहुत विशाल लोक है । इस लोक में यह जीव अज्ञानवश कषायवश हर प्रदेशों में जन्म ले चुका । लोक का कोई ऐसा प्रदेश नहीं बचा, जहाँ कि इस जीव ने अनेक बार अनंत बार जन्ममरण न किया हो । तो इस जीव ने सारे लोक का परिचय कर डाला, मगर जिस भव में यह जीव गया बस वही जगह उसे अनोखी लगती रही । खूब घूम आया सारे लोक में, घर बना डाला सारे लोक में, मगर मोहदशा में जहाँ यह जीव इस लोक में भ्रमण कर रहा । यह भ्रमण न चाहिये हो तो उसका उद्यम है आत्मा के सहज स्वरूप का ज्ञान करना और अपने को सहज स्वरूपमय अनुभवना । यह है लोक अनुप्रेक्षा ।

(303) बोधिदुर्लभ अनुप्रेक्षा में रत्नत्रय की दुर्लभता का प्रतिबोधन―बोधिदुर्लभ अनुप्रेक्षा―जगत में सब कुछ मिलना सुलभ है, राजपाट धन-वैभव आदि जो-जो भी सांसारिक बातें हैं ये सब सुलभ हैं, किंतु सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का मिलना दुर्लभ है, और देखो जो अपना नहीं है उसके बीच तो यह आराम कर रहा है और जो अपना है उसकी इसको सुध भी नहीं है । जैसे एक कहावत है ना? ‘‘पानी बिच मीन प्यासी, मोहि सुन सुन आवत हांसी’’ पानी में रहकर भी मछली प्यासी है, इसको कोई सच मान लेगा क्या ? अगर कदाचित् ऐसा हो जाये अथवा ऐसा होता ही नहीं, लेकिन यह आत्मा इस आनंदस्वरूप में बसता हुआ तृष्णा से प्यासा बना रहता है । स्वरूप तो है इसका सहज आनंद, मगर तृष्णा के कारण यह निरंतर प्यासा और आकुलित रहता है । तो यह सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र यह तो आत्मा का स्वाभाविक रूप है, यह तो अत्यंत सुगम हो जाना चाहिए । मगर कोई उल्टा ही चल रहा है तो उसे दुर्लभ बन गया । तो रत्नत्रय की प्राप्ति बड़ी दुर्लभ है । उसको अंदर में देखिये तो विदित होगा कि रत्नत्रय का लाभ जितना सुलभ है उतना सुलभ अन्य कुछ हो नहीं सकता । परद्रव्य पर मेरा अधिकार क्या? हो गया संयोगवश समागम, पर अधिकार इन पर कुछ नहीं । आत्मा का इन पर क्या अधिकार? किंतु सम्यग्दर्शन, ज्ञान चरित्र पर हमारा पूर्ण अधिकार है ꠰ मेरा स्वरूप है कि बाह्य विकल्पों को छोडूं और स्वरूप में आऊँ । यह कौनसी कठिन बात है, लेकिन दुर्लभ बना है । किस कारण से? इस कारण से कि मोह में दृष्टि पड़ी है इसलिए दुर्लभ है ।

(304) विषयकषायभावना के परिहारपूर्वक ज्ञानामृतपान से बोधि की सुलभता―वेदांत की जागदीशी टीका में एक कथानक आया है कि कोई दो दूकानें थीं पास पड़ौस की । उसमें एक तो थी शक्कर की दूकान और एक थी नमक की दूकान । एक बार शक्कर की दूकान में रहने वाली चींटी बहिन नमक की दूकान में रहने वाली चींटी के पास गई और बोली, बहिन तुम यहाँ क्या खाती हो? तो वह दूसरी चींटी बोली―हम नमक की डली खाती हैं । अरे यह क्या? रोज-रोज खारा-खारा खाती हो, तुम हमारे साथ चलो, वहाँ तुम्हें रोज-रोज मीठा-मीठा ही खाने को मिलेगा । पहले तो उस चींटी को विश्वास न हुआ, पर बहुत-बहुत कहने पर वह चलने को तैयार हो गई, मगर सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि भूखों मरना पड़े सो अपनी चोंच में एक दो खुराक खाने के लिए नमक की डली रखकर चली । जब शक्कर की दुकान में पहुंची तो नमक की डली को तो मुख से अलग किया नहीं और शक्कर के दाने पर मुख रख दिया तो वहाँ भी खारी-खारी ही लगे । शक्कर की दूकान वाली चींटी ने पूछा―कहो बहिन मीठा स्वाद आया ना? तो वह बोली―नहीं ।.... तुम कुछ मुख में रखे तो नहीं हो ?....हां एक-दो खुराक खाने के लिए नमक की डली अपनी चोंच में रखे हैं ।....अरे, तो फिर कैसे मीठा स्वाद आये । तू इस नमक की डल को मुख से निकाल दे, फिर देख कि मीठा स्वाद आता है नहीं । उसने नमक की डली को मुख से निकाल दिया तब उसे मीठा स्वाद मिला । और बड़ी कृतज्ञ होकर बोली―बहिन, तुम बड़ी भाग्यशाली हो जो रोज-रोज ही मीठा का स्वाद लेती रही । तो जैसे नमक की डली अपनी चोंच में रखे रहने के कारण चींटी को मीठा स्वाद नहीं आया, इसी प्रकार जब यह जीव अपने उपयोगरूपी चोंच में बाह्यपदार्थों से ममत्व रखे हुए है तो इसको अपनी सहज ज्ञानमूर्ति का भान कैसे बने? आखिर उपयोग ही तो है । इस उपयोग को चाहे विषय कषायों की ओर लगा दें, चाहे सहज परमात्मतत्त्व की ओर लगा लें, चाहे शांति पा लें चाहे अशांति । तो मोह रागद्वेषवश इस जीव को यह रत्नत्रय दुर्लभ रहा । तत्त्वज्ञान जगे और परभावों से दृष्टि हटे तो इसको बोधिलाभ सुलभ है ।

(305) धर्मानुप्रेक्षा में भावशुद्धि―धर्म अनुप्रेक्षा-धर्म के स्वरूप का विचार करना धर्मानुप्रेक्षा है । धर्म है आत्मा का स्वभाव । आत्मा का स्वभाव है ज्ञाताद्रष्टापना । ज्ञानमात्र । सो ज्ञाता दृष्ट रहें, ज्ञानवृत्तिरूप रहें, अन्य पदार्थ को न अपनावें तो वहाँ धर्मपालन है । इस धर्मपालन का बहुत ऊंचा फल है । कुछ राग शेष रहे तो उत्तम देवभव मिले, उत्तम मनुष्य पर्याय मिले, राग का क्षय होने पर मुक्ति मिले । धर्म का फल मांगने की जरूरत नहीं पड़ती । धर्म का फल सोचने की जरूरत नहीं पड़ती । जहाँ धर्म है वहाँ धर्म का फल अवश्य मिलता है । बहुत से लोग कहने लगते हैं कि हमको पूजा करते-करते बीसों वर्ष व्यतीत हो गए, पर दरिद्रता न मिटी कोई प्रकार का आराम न मिला, धर्म का कुछ फल नहीं है, मगर ऐसी जिनकी स्थिति है उन्होंने धर्म किया कहां? शरीर का परिश्रम किया । सुह उठे, नहाया धोया ठंडे पानी से । फिर जल भरा, द्रव्य धोया, यहाँ वहाँ द्रव्य चढ़ाया, पूजा पाठ किया, कोई लोग दर्शन करने आये तो उन्हें देखकर टन्नाकर बैठ गए इसलिए कि लोग समझ जायें कि यह बड़े धर्मात्मा हैं । कितने ही प्रकार के मिथ्याभाव उत्पन्न किये । बताओ वहाँ धर्म कहां किया? यदि आत्मा के स्वभाव की दृष्टि बनती, परमात्मा के स्वरूप की दृष्टि बनती है और उस स्वरूप के समान अपने आपको मानने की दृष्टि बनती तो वहाँ धर्मपालन होता । धर्म का फल बिना याचना किए, बिना चिंतन किए मिलता है । इस प्रकार साधुजनों ने बताया है ।

(306) अहिंसाव्रत―भावरहित बाह्य लिंग से कोई फायदा नहीं है । अनुप्रेक्षावों का चिंतन करें और 25 भावनाओं को भायें । व्रत 5 होते हैं―अहिंसा, सत्य, आचार्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । प्रत्येक व्रत की 5-5 भावनायें होती हैं । उन भावनाओं का यह प्रभाव होता है कि उससे व्रत निर्दोष पलता है । तो उन भावनाओं को भावें । जैसे अहिंसाव्रत की 5 भावनायें हैं वाङ᳭मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजना न पंच । वचन को वश में करना―यह अहिंसा व्रत की भावना है, जिसके वचन वश में नहीं, अधिक बोलने की आदत है वह खुद दुःखी रहता है और उसके संग में जो हो वह भी दुःखी रहता है, इसलिए वचनगुप्ति की भावना से अहिंसाव्रत की साधना बनती है । अधिक बोलने वाला कभी ऐसा अटपट बोल जाता है कि उस पर वह खुद पछताता है । कम बोलने वाला खूब सोच समझकर बोलता है । दूसरों की बात सुनना अधिक और बोलना कम, यह वृत्ति होनी चाहिए हर एक की । और देखो जो ये दो कान मिले तो मानों डबल सुनने के लिए मिले और जिह्वा एक मिली सो मानो सिंगल वचन बोलने के लिए । वचनों को वश में रखने वाला बहुत से संकटों से बच जाता है । सो साधुजन तो वचनगुप्ति का बड़ा प्रयास करते हैं ꠰

(307) अहिंसाव्रत की शेषभावनाओं की भावना―ऐसे ही दूसरी अहिंसाभावना है मनोगुप्ति, मन को वश में करना । यह मन बड़ा चंचल होता है, मन विषय में गया तो उससे दुर्भावना बनी और तत्काल हिंसा हो रही । दुर्भावना होने से खुद के चैतन्य प्राण की हिंसा हो रही । इसलिए मन को वश में करना । जितने बाह्य क्रियाकांड हैं ये केवल मन को वश करने के तंत्र हैं । अभी यह क्रिया करें फिर वह क्रिया करें, लगे रहें क्रिया करने में उससे मन विषयों की ओर नहीं लगता । इस मन को बंदर की उपमा दी है । बंदर शायद सोते हुए में तो थोड़ा स्थिर रहता होगा मगर जगते हुए में कभी स्थिर नहीं रहता । कभी हाथ उठाता, कभी पैर चलाता, कभी सिर मटकाता, कभी देह खुजलाता, कभी कुछ क्रिया करता । नाटक करने वालों को तो सीखनी पड़ती हैं आंखों की भौं नीचे ऊपर चलाना, आँखों की पुतली इधर-उधर करना, मगर बंदर के लिए ये सब क्रियायें करना बड़ा आसान है । तौ जैसे बंदर निरंतर चंचल रहता है ऐसे ही यह मन भी बड़ा चंचल रहता है । कभी कुछ सोचा कभी कुछ । तो ऐसे मन को वश में करना यह होता है ज्ञानबल से । तो जिन्होंने अपने मन को वश में किया है उनके अहिंसाव्रत अच्छी तरह पलता है । प्रथम तो परम अहिंसा आत्मा के सहजस्वरूप की दृष्टि है, सो मन को वश में करने वाले को आत्मस्वरूप का दर्शन बहुत सुगम रहता है ? उस मनोगुप्ति के अभ्यास से, पालन से अहिंसाव्रत पलता है । ऐसे ही तीसरी अहिंसाभावना है ईर्यासमिति―देखभाल कर चलना । ईर्यासमिति वाला सोचता है कि मेरे जीव के ही समान ये जीव हैं, ये सब भी परमात्मस्वरूप हैं, इन पर मेरा कहीं पैर न पड़ जाये (4) आदाननिक्षेपणसमिति―किसी जीव-जंतु को बाधा न हो, खूब निरीक्षण करके वस्तु धरना उठाना, मलमूत्र, थूक आदिक का वहाँ क्षेपण करना जहाँ जीव-जंतु न हों, यह भावना रहती है वह अहिंसा-

व्रत निदान पालने के लिए है । इन भावनाओं को भायें जिससे व्रत का निर्दोष पालन हो ।

(308) भावशुद्धि के साधक सत्य व्रत की साधना के लिये क्रोधप्रत्याख्यान की भावना― आचार्यदेव यहाँ साधुओं को संबोध रहे हैं कि भावरहित लिंग के धारण करने से क्या लाभ है? बारह अनुप्रेक्षावों को भावो और 25 भावनाओं को भावो । बारह अनुप्रेक्षा और 25 भावना में से प्रथम अहिंसाव्रत की भावना तक का वर्णन हुआ । अब सत्य व्रत की भावना देखिये, सूत्रजी में बताया ―‘‘क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं च पंच’’ सत्यव्रत की 5 भावनायें क्या-क्या है―(1) क्रोध का त्याग, (2) लोभ का त्याग, ( 3) डरपोकपने का त्याग, (4) हंसी मजाक का त्याग और आगम के अनुसार बोलना । जिन जीवों के क्रोध का त्याग नहीं है, क्रोध रखने की आदत बनी रहती है, उनके वचनों में सच्चाई नहीं समझी जाती है । स्पष्ट भी झूठ बोलते हैं । किसी पर गुस्सा आये तो उसका बिगाड़ ही तो करना चाहते हैं । अब यों ही तो बिगाड़ हो नहीं जाता । वैसे बिगाड़ तो उसका उसके ही पाप के उदय से होगा, और लौकिक दृष्टि से मान लो तो दूसरे का बिगाड़ किया जाना बड़ा कठिन है ना? तब असत्य बोलकर और अन्य उपाय बर्तकर बिगाड़ करना चाहते हैं । क्रोध में अपनी सुध नहीं रहती और न सत्यव्रत पालन की उसे सुध रहती हैं । बड़े-बड़े लोग भी यदि क्रोध में आ जायें तो उनके वचन कुछ न कुछ असत्यता से भरे निकलते हैं । इस कारण सत्य व्रत का पालन करना हो तो क्रोध का त्याग होना चाहिए । अब क्रोध के त्याग का नियम तो होता नहीं कि हमने कहीं नियम ले लिया कि मैं कभी क्रोध न करूंगा । यद्यपि ऐसा भी किया जाता है, पर जब कर्मविपाक उदित होता है तो उनका निमित्तनैमित्तिक योग में जो होना है सो होता है । तब क्रोध को कैसे त्यागा जाये? ज्ञानबल से अपने सहज ज्ञानस्वरूप की भावना बहुत-बहुत भाइये, उससे अपना आत्मबल बढ़ेगा, ज्ञानरुचि बनेगी, जिसके प्रताप से क्रोध का परिहार हो जायेगा । तो क्रोध का परिहार करना सत्यव्रत पालन का उपाय है ।

(309) भावशुद्धिसाधक सत्यव्रत के साधनार्थ लोभप्रत्याख्यान की भावना―दूसरी भावना है लोभ का त्याग । जब चित्त में लोभ आ जाता है तो धन मिले या यह मेरा धन नष्ट न हो जाये इस आश्रय में जैसा बोलने से काम बने वैसा बोलना पड़ता है, क्योंकि उसको तृष्णा लगी है । तो लोभ कषाय जब चित्त में हैं तब असत्य वचन निकल जाते हैं । प्राय: देखते ही हैं । कितने ही लोग तो कसम भी खा लेते हैं धन के लोभ से । तो जिनके लोभकषाय नही मिटी उनके सत्य वचन का व्यवहार नहीं बन पाता । तब सत्य व्रत पालन की जिनके इच्छा है, भावना है, नियम ले लिया है उनका कर्त्तव्य है कि वे लोभ का परित्याग करें । लोभकषाय का भी परिहार करना कठिन है । उसका नियम कैसे लिया जाये? वह तो कषाय का उदय आया और उसी तरह ढल गया । तो इसका भी परिचय ज्ञानबल से होता है । अपने आप में निरखिये मैं अनंत ज्ञान, अनंत आनंद के वैभव वाला हूँ । इसके समक्ष तीन लोक का भी वैभव सामने इकट्ठा हो तो उससे कुछ लाभ नहीं मिलता है । तो यह ज्ञानी पुरुष अपने सहज स्वभाव का आदर करता है और उसकी दृष्टि में यह ही लोकोत्तम है, इस कारण लोभ का परिहार हो जाना उसके लिए बहुत आसान है । लोभ का परित्याग यह सत्य व्रत का निर्दोष पालन कराता है । अनेक पौराणिक कथायें और लोक पद्धति है कि लोभ में केवल कष्ट ही पाया । अच्छा अपनी ही बात देख लो, लोभ में रंग रहे, धर्म हेतु, उपहार हेतु कुछ भी खर्च करने के की भावना न बने, ऐसी जिंदगी बिताई जाये, बहुत सा धन इकट्ठा भी कर लिया जाये तो उससे इस आत्मा को लाभ क्या है? लाभ नहीं बल्कि तृष्णा का पाप लादे रहने से तो दुर्गति ही होगी । तो लोभ का परित्याग हो तो सत्य व्रत का निर्दोष पालन बनेगा ।

(310) भावशुद्धि के साधक सत्य व्रत के साधनार्थ भयप्रत्याख्यान भावना―भय का त्याग―अगर कायरता है, डरपोकपना है, भयभीत हो रहे हैं तो ऐसी स्थिति में जैसी अपनी रक्षा समझी उस ढंग से वचन बोलते हैं । और वह बोल असत्य निकलता है । जैसे जीवन में कितने ही अवसर आये होंगे । छोटे-छोटे बालक तो भय दिखाया जाने पर अनेकों बार झूठ बोल जाते हैं । मान लो कि किसी बच्चे ने गिलास फोड़ दिया, उसके दादा बाबा किसी ने पूछा यह गिलास किसने फोड़ा? तो वह बच्चा बोलता हमने नहीं फोड़ा । यों एक बार नहीं, अनेकों बार झूठ बोलता है । वही बच्चा जब जवान हुआ तो अनेकों भय उसके सामने आते हैं । कभी किसी सांप्रदायिक झगड़े में फंस जाये, बड़ी भारी कलह हो जाये, और निकल गया किसी दूसरी जाति के मोहल्ले से तो वह अपनी जाति बदलकर किसी तरह से अपने प्राण बचाता है । तो एक ही क्या, अनेकों ऐसी घटनायें बनती हैं जिनमें अनेकों बार झूठ बोलना पड़ता है । और बुढ़ापे में कोई सत्य की मूर्ति थोड़े ही बन जायेगा । यहाँ भी अनेक भय बनते हैं, वहाँ भी झूठ बोल सकते हैं । सत्य व्रत का निर्दोष पालन वही कर सकता है जिसके किसी भी प्रकार का भय नहीं । जिसने आत्मा का अंत: स्वरूप अनुभवा है उसका यह दृढ़ निश्चय है कि मेरा आत्मा अमर है । वह कभी मिटता नहीं, यहाँ न रहा दूसरी जगह चला गया । इस देह से क्या राग करना? जिसने ज्ञानस्वरूप का अनुभव पाया वह निःशंक रहता है और सत्य महाव्रत का पालन सम्यग्दृष्टि पुरुष ही तो कर पाते । तो डरपोकपने का त्याग होना, निर्दोष सत्य व्रत का पालन कराता है ।

(311) सत्य वचन बोलने का व्रत निर्दोष पालन करने के लिये हास्यपरित्याग की आवश्यकता―हंसी मजाक का परित्याग हो तो सत्य वचन बोले जा सकते, हंसी मजाक दिल्लगी करने वाला सत्य वचन का व्यवहार नहीं कर सकता । और फिर कहते हैं ना―लड़ाई की जड़ हांसी और रोगों की जड़ खांसी । हास्य से कलह भी बढ़ता है और कलह बढ़ेगी तो वहाँ सत्य वचन की सुध थोड़े ही रहेगी । एक बार कोई मित्र अपने कंजूस मित्र के घर पहुंचा । अब उस कंजूस मित्र ने यह देखा कि यह आ गया, पता नहीं कितने दिन यह ठहरेगा, तो उसके घर रसोई बनाने वाला एक रसोइया (नौकर) था सो उस नौकर को कुछ समझा दिया कि हम कुछ लाठी से आवाज करेंगे और तुम रोने लगना, इससे वह ऐसा वातावरण देखकर अपने आप भग जायेगा, सो उसने वैसा ही किया । लाठी का प्रहार किया जमीन पर, और उधर वह रसोइया रोने लगा और वह मित्र डरकर वहाँ से बड़ी दूर भाग गया । अब भाग तो गया, मगर फिर सोचा कि हम भाग तो आये, पर मित्र से कहकर तो नहीं आये, इसलिए पुन: वहीं लौट चलना चाहिए । यह विचारकर वह पुन: वापिस लौट आया । इधर वह कंजूस सेठ (घर का मालिक) आंगन में रसोइया से बात कर रहा था―हमने लाठी से पीटा तो नहीं, तो रसोइया बोला―हमने रोया भी तो नहीं, तो इतने में वह मित्र वहीं पौर में खड़ा पीछे से बोला―मैं भी गया तो नहीं । तो ऐसी कितनी ही घटनायें हो जाती हैं हंसी मजाक में, लोभ में कि जिनमें सत्य वचनव्यवहार नहीं बनता ।

(312) भावशुद्धि में अनुवीचिभाषण का महत्त्व―5वीं भावना है अनुवीचि भावना । आगम की आज्ञा की अवहेलना का कुछ ख्याल तो रखना चाहिए । आगमविरुद्ध वचन बोलना यह दोष है । जिसकी छाया में रहकर अच्छी जिंदगी से जियेंगे, और भविष्य में हम अच्छी प्रकार रहेंगे हमें उस आगम की आज्ञा में रहना चाहिये । उद्दंडता से तो काम नहीं बनता । भगवान की वाणी के शासन में रहना हो तो कोई बात ऐसी न निकल जाये शास्त्र के विपरीत इसका ध्यान रखना चाहिए । अब आजकल श्रद्धाहीन लोग अधिक हो रहे हैं तो उन्हें कुछ परवाह ही नहीं है, जैसा मन में आया वैसा बोल दिया । और अपनी कषाय के अनुसार पंक्ति का अर्थ निकालना यह बड़ा सुगमसा बन गया है, जबकि आचार्यदेव ने किसी आर्ष सूत्र की या अन्य की टीका की है तो कोई शब्द अगर ऐसा भी आया हो जो वहाँ पूरा फिटसा नहीं जचता हो, लेकिन टीकाकारों की ऐसी दृढ़ श्रद्धा आचार्यों के प्रति, प्राचीन ऋषियों को ओर थी कि ऐसी वाक्य रचना से टीका की कि उसे जंचा दिया कि यह सब लेख पूर्णतया ठीक है ꠰

(313) आगम और युक्ति से सत्य ध्यान करने में कल्याण―अब जो स्वच्छंदता चल रही है उसमें इतना तक लोग कहने लगे कि सूत्रजी का तीसरा अध्याय या चौथा अध्याय में से भूगोल की बातें ये तो निकाल देना चाहिए क्योंकि यह सिद्ध हो गया कि जमीन नारंगी की तरह गोल है, कुछ यह भी बतलाते हैं कि एक समान है, थोड़ी भी युक्ति नहीं सोचते कि आंखों के देखने का ढंग ऐसा होता है कि हम कहीं भी खड़े होकर देखें तो दूर की जमीन ऐसी लगती जैसे नीचे धस गई हो । आंख से देखने का तरीका ही यों है । अच्छा और तो जाने दो, रेल की पटरियों में तो एक इन्च का भी अंतर नहीं होता । जितने चौड़े अंतर से रेल की पटरियां रखी जाती हैं उतनी ही रखी जायेगी । कोई लाइन अगर ऐसी सीधी हो कि आपके एक दो मील तक भी सीधी दिखाई पड़े उसे आप खड़े होकर देखें तो सही, जितना अंतर आप अपने निकट पा रहे हैं क्या ऐसा अंतर वह एक मील दूर का भी नजर आयेगा? नहीं, वे तो दोनों लाइनें एक दूसरे से मिली हुई नजर आयेंगी । देखो वे दोनों लाइनें एक दूसरे से मिली तो नहीं होती, यहाँ तक कि आधा या पाव इन्च तक का भी फर्क नहीं होता, यदि फर्क हो जाये तो कितनी ही दुर्घटनायें प्रतिदिन होती रहे, पर ऐसा नहीं होता । तो आंखों से देखने का ढंग ही ऐसा है । यों श्रद्धा तो नहीं बना पाते कि युक्ति से, मनन से ये सही जानने की कोशिश करें कि आचार्यों ने जो लिखा है वह अक्षरश: ठीक है । अपने को मुग्ध लोग अभिमानी बुद्धिमान मान लेते हैं, जैसे कि मानों दुनिया के सभी जीवों के लिए कुल दो आंखें मिली हों तो मानते कि डेढ़ आंखें तो हमारे पास हैं बाकी आधी आंख में सारी दुनिया के जीव है, इतना बुद्धिमान अपने को मान लेते हैं । तो सूत्र विरुद्ध जो बात करता है वह सत्य व्रत का पालन नहीं कर सकता । तो इन 5 भावनाओं से सत्य व्रत का पालन होता है । सो हे मुने इन भावनाओं के द्वारा तुम सत्य व्रत का निर्दोष पालन करो ।

(314) अचौर्यव्रत के निर्दोष पालन का साधुवों को आगम का उपदेश―तीसरा व्रत है अचौर्याणुव्रत―चोरी का त्याग । चोरी तो बहुत तरह की होती हैं―धन की चोरी, नाम की चोरी, साहित्य की चोरी । उनके नाम भी अलग-अलग चलते हैं । जैसे साहित्यचोर, धनचोर, आचरणचोर आदिक । चोरी किसी भी तरह की करे, उसका आशय बहुत खोटा होता है । एक बार हम (प्रवक्ता) दुर्ग में थे तो वहाँ एक व्यक्ति एक किताब लिए हुए था उसने कहा―देखिये महाराज जी, यह किताब बहुत अच्छी है, उसे मैंने खोलकर देखा तो एक लाइन देखते ही मैंने कहा कि यह तो मेरी लिखी हुई एक डायरी हे, इसका नाम संपादक सुमेरचंदजी ने रखा था―‘सहजानंदवर्णी’, पर उसमें क्या देखने में आया कि उसका कोई दूसरा नाम रखकर आचार्य निर्मलसागर नामधारी मुनि ने उसमें लेखक की जगह पर बदलकर अपना नाम डलवा दिया था, और उस पुस्तक में पांच जगह अपना फोटो भी मायाचारी से लिखते हुए का, और और प्रकार का छपवा रखा था । यह दृश्य देखकर मैं तो बड़ा दंग रह गया? निर्मलसागर जी जब मुजफ्फरनगर आये थे तो छपते ही यह पुस्तक संपादक ने निर्मलसागरजी को भेंट दी कि कल्याण करें । निर्मलसागर जी ने दो वर्ष बाद तेज विहार कर औरंगाबाद में मायाजाल कर उसे छपवाया । इतनी बड़ी साहित्य की चोरी की निर्मलसागर मुनि ने । बताओ―इससे बड़ा पापकार्य और किसे कहा जाये? वहीं कई सदस्य थे, सहजानंदवर्णी, पुस्तक मंगवाई । लोगों ने देखा कि न एक अक्षर कम न एक ज्यादा । पता चला कि औरंगाबाद चातुर्मास में उन मुनि ने हमारी प्रकाशित डायरी को ज्यों की त्यों प्रेस में दे करके किताब छपवायी थी । आखिर हम औरंगाबाद पहुंचे, वहाँ पता लगवाया जिन प्रेसों में वह पुस्तक छपी थी, वहाँ पता लगवाया तो जिस पुस्तक के आधार पर वह नई पुस्तक छपी थी वह भी देखने को मिली । उन मुनि को इतनी भो अकल कहां थी कि वह एक भी अक्षर उस पुस्तक में से बदलकर लिख सकें । सिर्फ लेखक का नाम बदलने भर की अकल थी । उस पुस्तक के संपादक को जब इसकी वास्तविकता का सही पता पड़ा तो वह भी बड़ा भयभीत हुआ । निर्मलसागर को भी बाद में जब पता पड़ा कि वर्णीजी को हमारी साहित्य की चोरी का पता पड़ गया तो वह भी बड़ा व्यग्र हुआ, स्थिर चित्त न रह सका । चित्त भंग हो गया । और चोरी करने के परिणाम में फिर और और भी बुरी बातें आने लगीं । निर्मलसागर से और भी अनेक अटपट बातें हुई जिससे लोगों ने उसे कपड़े भी पहना दिये । वह मुनिपद से च्युत हो गया । पता चला है कि बाद में फिर उसने कपड़े उतार दिये । तो साहित्य की चोरी एक बहुत बड़ी चोरी है और फिर ऐसे ऊंचे पद पर आकर इस प्रकार का जघन्य काम यदि कोई करे तो उससे बड़ा पाप और किसे कहा जाये? निर्मलसागर ने चोरी भी की और प्रस्तावना में लिखा कि कागज की महंगाई आदि के कारण से थोड़ा लिखा । निर्मलसागरजी ने बाद में घबरा कर मुजफ्फरनगर पत्र भी दिया कि हमने वर्णीजी के इस उत्तम साहित्य का प्रचार हो इससे छपवाया, यदि चोरी का भाव नहीं था तो पुस्तक नाम व लेखक नाम सही रहने देते । अहो ऐसे ही व्यामूढ़ व्यक्तियों ने धर्म की ओट में अपना मौज बनाकर लोगों को श्रद्धाहीन कर दिया है । तो साधु को अचौर्यव्रत का निर्दोष पालन करना चाहिये ꠰

(315) भावशुद्धिसाधक अचौर्यव्रत की साधना के लिये पंच भावनावों भाने व प्रयुक्त करने का आदेश―अचौर्यव्रत की प्रथम भावना है सूने घर में रहना । सूने घर में रहने से क्या होता कि भाव बुरे बनेंगे नहीं । चोरी करने का भाव बनने का अवकाश ही नहीं वहाँ । अगर कहीं भरी पूरी जगह में रहें या किसी गृहस्थ के घर में रहे और कोई मूल्यवान चीज दिखे तो उसे देखकर उस मुनि की भावना बिगड़ सकती । अगर संगति उत्तम नहीं है और गृहस्थों के बीच आवास अधिक है, ज्ञानबल भी नहीं है तो उसका चित्त डगमगा जाये यह बहुत कुछ संभव है, सो सूने घर में रहना यह अचौर्यव्रत का निर्दोष पालन कराने का साधन है । छोड़े हुए घर में रहना । जो घर छूट गया वा उस घर के लोग अन्य गांव भाग गए ऐसा घर अब खाली पड़ा है, वहाँ भी भावना ठीक हो सकती । तो जो विमोचित स्थान हैं वहाँ रहना भी अचौर्य व्रत का साधक है । मुनि महाराज जहाँ ठहरे हों, वहाँ दूसरे को न ठहरने देना यह उस मुनि के लिए कलंक है, और इसके अनेक दृष्टांत मिल सकते हैं । कहीं तो पुराल में नोट (रुपये) छिपायें हैं, कहीं चटाई में छिपाये हैं, उसे छिपाने के लिए किसी को वहाँ न ठहरने दे, लोग जान जायेंगे, चोरी की पोल खुल जायेगी, यह सोचकर दूसरे को न ठहरने देना यह उस मुनि के लिए कलंक है । दूसरे को ठहरने के लिए रोकना नहीं, यदि जगह है तो दूसरे को भी ठहरने दे, किसी को ठहरने से रोकने का कारण क्या? या अन्य प्रकार की चोरी भी संभव है । ये हमारे चारित्र को देखेंगे या हम अपनी इज्जत बनाने के लिए जैसे नटखट करते हैं उनका परिचय पा लेंगे, इसलिए न ठहरने देना । तो परोपरोधाकरण । दूसरे को ठहरने देना, रोकना नहीं रोकना नहीं, यह भावना भाना । तब अचौर्य व्रत का निर्दोष पालन होता है । भैक्ष्यशुद्धि, भोजन पान आहार पूर्ण शुद्धि के साथ करना, उसका अचौर्य के साथ संबंध है । भाई भोजन में कोई छोटासा बाल निकला यों छिपा लिया, नीचे गिरा दिया या अन्य कोई बात हुई ओर उसकी उपेक्षा कर देना, ऐसी घटना चोरी से संबंध रखती है, इसलिए बताया है कि भैक्ष्य की शुद्धि होना यह अचौर्यव्रत का निर्दोष पालन करता है । 5वीं अचौर्य भावना है साधर्मी के साथ विवाद झगड़ा विसंवाद न करना, क्योंकि अपने साधर्मी भाइयों के साथ अगर विवाद किया, झगड़ा किया तो उसमें इतना मन में आ जाता है कि इसका कुछ बिगाड़ हो जाये । कलह का तो यह ही फल है । यों सोचना कि इसका बिगाड़ हो जाये, इस धुन में कहो उसका कुछ नुकसान भी कर दे । गुस्सा में न जाने क्या-क्या नहीं किया जा सकता । तो साधर्मियों के साथ विवाद न करना यह अचौर्य व्रत का निर्दोष पालन कराता है । सो यहाँ कुंदकुंदाचार्यदेव साधुजनों की समझा रहे कि हे साधुजन भावरहित भावलिङ से कोई लाभ नहीं है, अत: अपने भावों को संभालो । बारह अनुप्रेक्षावों को भावो और 15 भावनाओं को भावो ।

(316) भाव शुद्धि साधक ब्रह्मचर्य व्रत की निर्दोष साधना के अर्थ पंच भावना―यहां कुंदकुंदाचार्यदेव साधुजनों को प्रतिबोध रहे हैं कि भावरहित बाह्य लिंग से कोई लाभ नहीं मिलने का । इस कारण भाव बनावें, अनुप्रेक्षा की भावना भावें और 25 भावनाओं को भावें । 25 भावनाओं में तीन व्रत की भावनायें कह दी गई हैं, अब ब्रह्मचर्य व्रत की 5 भावनायें सुनें ꠰ तत्त्वार्थसूत्र में बताया है―स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहरांगरानिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागा: पंच । ये 5 भावनायें वे हैं जिनकी भावना भाने से, जिनका प्रयोग करने से निर्दोष ब्रह्मचर्य व्रत की साधना होती है । पहली भावना है स्त्रीरागकथात्याग, स्त्रीविषयक राग बने, ऐसी कथाओं का त्याग करना, चर्चा कहानी न सुनना, ऐसी जो स्त्रीविषयक राग कथायें, जैसे कि प्राय आजकल सिनेमाओं में देखी जाती ऐसी कथायें, और भी उस प्रकार की कथायें न करना । दूसरी भावना है―स्त्री के मनोहर अंगों के निरीक्षण का त्याग करना । देखो इसमें लग रहा होगा ऐसा कि पुरुषों को ही संबोधा गया तब ही तो स्त्रियों की बात कही जा रही, पर यही अर्थ यहाँ स्त्रियों के लिये भो लगायें तो होते दोनों अर्थ हैं । स्त्रियों को भी ब्रह्मचर्य व्रत के लिए कहा गया और पुरुषों को भी । स्त्रियां भी आर्यिका आदिक होती है और पुरुष भी मुनि तक होते हैं । पर विशेषतया जो पुरुषों का लक्ष्य रखकर संबोधन मिलता है उसका कारण यह है कि साक्षात् मोक्ष तो पुरुषों को मिलता है इसलिए उनको संबोधन करना और उसमें स्त्रियों का संबोधन अपने आप हो जाता है । दूसरी भावना है पूर्व में भोगे हुए भोगों का स्मरण न करना । यदि पूर्व में भोगे गए भोगों का ख्याल करेगा तो मलिनता आयेगी । तो ब्रह्मचर्य का निर्दोष पालन उनके होता जो इन भावनाओं को भाते, प्रयोग करते पूर्व में भोगे गए भोगों का स्मरण नहीं करते । ज्ञानी है ना? जो गया सो गया मगर अज्ञानियों को देखो अगर किसी बरात से दो चार दिन पहले हलुवा पूड़ी खाकर आये तो उसी की चर्चा करते कि मैंने खूब अच्छा भोजन खाया था । अरे खाया सो खाया अब क्या वह धरा हैं ? उसकी चर्चा करने से अब क्या फायदा? ज्ञानीजन पूर्व में भोगे हुए भोगों का स्मरण नहीं करते । चौथी भावना है कामवर्द्धक इष्ट रसों का सेवन न करना । यों खाऊं, यों बनाऊं । ऐसा करूं, ऐसी दृष्टि ज्ञानीजनों की नहीं रहती । तो सारा दिन काहे में बितायें ? इसलिए ज्ञानीजनों का सारा समय ज्ञानाराधना में व्यतीत होता है ꠰ वे ऊलजलूल बातों में नहीं पड़ते । तो इष्ट रसों का त्याग करें । 5वीं भावना है अपने असार शरीर के संस्कारों का त्याग करना । इस शरीर के लिए न जानें कितने प्रकार के शृंगार होते उनके कोई संस्कार शृंगार ज्ञानी जनों के नहीं होता । तभी तो मुनिजनों के शरीर पर धूल मिट्टी चिपटी रहती, क्योंकि उनको शरीर के संस्कारों का त्याग रहता है । इन 5 भावनाओं से और इनके प्रयोग से हे मुनिजनो, ब्रह्मचर्य व्रत का निर्दोष पालन करो और भावशुद्धि में बढ़ो ।

(317) भावशुद्धिसाधक परिग्रहत्यागव्रत की निर्दोष साधना के अर्थ पंच भावना―5वां व्रत होता है परिग्रहत्याग महाव्रत । उसका निर्दोष पालन करने के लिए 5 भावनायें हैं सूत्रजी ने कहा है मनोज्ञ इष्ट और अनिष्ट जो इंद्रिय के विषय हैं उनमें राग और द्वेष का छोड़ना । कोई आदमी परिग्रह क्यों बढ़ाता है, क्यों रखता है कि उसको इंद्रिय के विषयों में प्यार है और अनिष्ट बातों से द्वेष है और उसके लिए फिर आवश्यकता धन की विशेष है इसलिए परिग्रह को जोड़ता है । तो परिग्रह का मूल है विषयराग । सो 5 इंद्रिय के विषयों में रागद्वेष न जगे, रागद्वेष का परिहार हो, ऐसी भावना भाना और प्रयोग करना, इस तरह हे मुने जो भावों की शुद्धि रही, सम्यग्दर्शन रहा, आत्मा के सहज ब्रह्मस्वरूप में रुचि रही तो उसके साधन बढ़ाया । वह साधन बढ़ाता है मुनिभेष में, क्योंकि वहाँ कोई चिंता करने का रूप नहीं है, निर्ग्रंथ है, कोई परिग्रह पास नहीं, किसी काम में पड़ना नहीं किंतु उसकी साधना में रहना । तो उनके लिए सुगम है कि सहज आत्मस्वरूप की भावना बढ़ायें और यदि कोई मुनि भेष रखकर भी परिग्रहसार समझे, परिग्रह रखें बहुत से आरंभ साधन रखे और चेला बनाने का शौक है तो वह भी परिग्रह है । परिग्रह रहते हुए में भावों की शुद्धि नहीं बनती । इस कारण हे मुनिजनो, भावों की शुद्धि बढ़ाओ और अपना भेष सफल करो ।


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