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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 96

From जैनकोष



णवविहबंभं पयडर्हि अव्बभ दसविहं पमोत्तूण ।

मेहुणसण्णासत्तो भमिओसि भवण्णवे भीमे ।꠰96꠰꠰

(346) भावशुद्धि से आत्महित―यह भावपाहुड़ ग्रंथ है, इसमें भावों का महत्त्व बताया गया है । जीव का ब्रह्म भाव है । भाव शुद्ध है तो जीव को शांति है और भाव अशुद्ध है तो जीव को व्यग्रता है । आज जितना भी कष्ट हो रहा, लोग अपने को आकुलित अनुभव कर रहे वह भावों की अशुद्धि के ही कारण । मिथ्यात्व ममता, अहंकार, क्रोध, विषयो में प्रीति परिग्रह का लगाव ये सारे असंयम भाव जो चल रहे हैं उनके कारण उन्हें प्रकृत्या ही दुःखी रहना पड़ेगा । तो इस आत्मा के सही शुद्धस्वरूप का परिचय मिले और यह मैं हूँ इस प्रकार का अपने आप में निर्णय बने तो उसको संक्लेश नहीं रह सकता । भावशुद्धि के प्रकरण में आचार्य कुंदकुंददेव ने मुनिवरों को समझाया कि केवल बाह्य भेष से काम न चलेगा, मोक्षमार्ग न मिलेगा किंतु बाह्य परिग्रह का त्याग किया है तो भावों की निर्मलता बनावें, सम्यक्त्व की उपासना बनावें आत्मा में रमण करने का पौरुष करें तो मोक्षमार्ग मिलेगा ।

(347) शील की बाड़ मर्यादा रखने के प्रकरण में प्रथम द्वितीय तृतीय व चतुर्थ बाड़ का वर्णन―उसी प्रकरण से संबंधित इस गाथा में आज यह कह रहे हैं कि ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें तो भावशुद्धि बनेगी । 9 प्रकार के ब्रह्मचर्य को प्रकट करें । मन से, वचन से, काय से, कृतकारित अनुमोदना से 9 प्रकार का ब्रह्मचर्य है, उस ब्रह्मचर्य का पालन करें और साथ ही जो ब्रह्मचर्य की 9 बाड़ हैं उनकी मर्यादा करें । जैसे खेत के चारों तरफ बाड़ लगी होती है तो पशु उस खेत को खराब नहीं कर सकते, ऐसे ही 9 प्रकार की ये बाड़ हैं । इनकी मर्यादा में जो रहेगा उसके ब्रह्मचर्य की सिद्धि होती है । वे 9 बाड़ क्या हैं? इन्हें शील की 9 बाड़ कहते हैं । पहली यह है कि स्त्रीविषयक अभिलाषा न होना, मायने मुनिवरों को समझा रहे ना तो स्त्रियों का नाम लेकर समझायेंगे । स्त्रियाँ समझें तो पुरुषों का नाम लेकर समझें । स्त्री जन परपुरुष की अभिलाषा मन में न रखें । ब्रह्मचर्य शुद्धि के अर्थ स्त्री की कामना न करना उनसे प्रीति करने की, संगति की इच्छा न रखनी चाहिए, क्योंकि अभिलाषा के बाद ही और कुछ बन-बनकर कुकार्य परिणति होती है, सो ऐसी जड़ को ही मिटायें ना? स्त्रीविषयक अभिलाषा का त्याग करें । दूसरी बात है अगविमोक्खो याने अपने कामसाधनभूत अंग को उत्तेजित न करना । तीसरी बाड़ है गरिष्ट रस का सेवन न करना, जैसे कुछ रस होते हैं शिलाजीत या और कुछ या खाने में भी बहुत गरिष्ट भोजन इनका त्याग होवे तब शील की बाड़ पलती है । जो जिह्वा का स्वच्छंदी है उसके सारे विषयों में स्वच्छंदता बन जाती है । कोई कहे कि खाने पर इतना जोर क्यों दिया, अरे दो मिनट में खावे और खूब बढ़िया खाना खावे, मगर खाने में लंपटता है तो इससे सिद्ध है कि मन स्वच्छंद है, और जिसका मन स्वच्छंद है उसके सब स्वच्छंदता बढ़ती चली जाती है । फल यह होता है कि वह अपना ब्रह्मचर्य नहीं रख सकता है । इस कारण जिह्वा को वश में करना, गरिष्ट भोजन का सेवन न करना । चौथी बाड़ है―स्त्रियों से संबंधित वस्त्रादिक का सेवन न करना । जो कपड़े स्त्रियां पहनती हैं किसी समय उन्हें छूना, रखना या पहिन ही लेना, कभी-कभी तो अगर चौके में धोती शुद्ध नहीं है और किसी स्त्री की कोई सूती साड़ी पड़ी है तो पुरुष उस साड़ी को भी पहिनकर आहार दे देते हैं । कितने ही लोग ऐसे देखे गये । तो यह बात बतला रहे कि स्त्रीजनों के कपड़ों का सेवन न करें ।

(348) शील की पांचवीं बाड़―50ीं शीलवाड़ है स्त्री के अंगोपांग आदिक को न देखना । अब देखिये कि सारा शरीर अत्यंत अपवित्र है । अंग तो बहुत हैं पैर हैं, हाथ हैं, पेट है, और सिर मुख भी हैं वहाँ एक बात यह बताइये कि सबसे अधिक गंदा कौनसा अंग है जिसमें अधिक से अधिक मैल पाया जाये? तो सबसे ज्यादह गंदा अंग मुख है । हाथ में थूक न मिलेगा, नाक न मिलेगी, कफ न मिलेगा, और जो हाथ में गंदगी है वह सब गंदगी तो मुख में है ही मगर उसके अतिरिक्त थूक, लार, कफ नाक, आंख का कीचड़, कान का कनेऊ याने इतना अधिक मल मुख में है कि इतना अधिक मल अन्य जगह नहीं मिलता । और लोग जो हैं वे मुख को दर्शनीय बतलाते और जितना आकर्षण होता है खोटा वह मुख निरखने से होता है, और सबसे गंदा है मुख । तो जो विवेक करता है वह जानता है कि शरीर क्या है । यह शरीर अशुचि पदार्थों का पिंड है और फिर उसमें एक रूप रंग की भी बात देखो तो सांवला हो तो, काला हो तो, इसमें क्या फर्क? यह रूप रंग कहीं हाथ से पकड़ने में तो आता नहीं, केवल एक दूर से निरखने-निरखने की बात है । और, जिसका मन पवित्र है वह तथ्य निरखकर अपने आपको शुद्ध बनाता है, तो 5वीं बाड़ है स्त्री के अंगोपांग आदिक को न देखना ।

(349) शील की छठी सातवीं आठवीं व नवमी बाड़―छठी बाड़ स्त्री का सत्कारपुरस्कार न करना । इसके मायने यह नहीं कि अपमान करे, किंतु उमंग लेकर अधिक बोलने की आदत पुरुष बनावें स्त्रियों से तो वह बाढ़ के विरुद्ध है । कभी कोई साधारण काम हो तो बोले, मगर ऐसी भीतर में उमंग बनाना मैं कि खूब प्रशंसा करूं, तो उसका अभिप्राय खोटा होता है । 7वीं बाड़ है पूर्व समय में भोगे हुए भोगों का स्मरण न करना । अगर पहले के भोगों का स्मरण करेंगे तो वहाँ भावों में अशुद्धि बढ़कर ब्रह्मचर्य के घात का अवसर आ सकता है । 8वीं बाड़ है आगामी काल में भोगों की इच्छा न करना । मुझे ऐसी देवियां मिलें, ऐसे आगे भोग मिलें, यह चाह न करना । 9वीं बाड़ है इष्ट विषयों का सेवन न करना । जो कानों को प्यारे लगें, ऐसे शब्दों के सुनने की रुचि न करना, सुनना ही नहीं, जो आंख का विषय बने, जैसे सिनेमा या गंदे थियेटर इनको देखने का त्याग । सभी इंद्रिय के विषय जो इष्ट लगें उनमें लगाव मत रखें । जैसे सुगंधित इतर तेल के सूंघते रहने का शौक लग गया, किसी भी इंद्रिय का किसी को शौक बन गया तो वह बाड़ को तोड़ देगा और कुशील की ओर प्रवृत्ति करा देगा । सो इन 9 प्रकार से ब्रह्मचर्य का पालन करें ।

(350) कामवासना के फल में दस दुर्दशायें―देखिये―कुशील सेवन का जिसको कुछ भाव पड़ता है तो उसकी खोटी 10 अवस्थायें बनती है कि पहले तो वह मामूली बात लगती है और उससे बढ़-बढ़कर मरण तक का मौका आता है । पहले तो स्त्रीविषयक चिंतन चला, विचार चले, ख्याल करें, कैसा है, सुंदर है, अमुक हैं, यों किसी प्रकार का चिंतन किया―वह चिंतन जब चल रहा है तो फिर उसको देखने की इच्छा होने लगती हैं । जिसके बारे में ऐसा सुनते हैं वह है कैसा? फिर उसको देखने की चाह उत्पन्न होती । चाह हुई, देखने को मिले अथवा न मिले, मगर वह चाह भीतर में ऐसी दाह उत्पन्न करती है कि उसके फिर हाय की श्वास चलती है । जैसे कभी कोई गहरी चिंता हो जाये तो एक श्वाससी निकलती जिसको सुनकर लोग पहिचान जाते हैं कि यह किसी रंज में है । फिर वही बढ़-बढ़कर ज्वर तक आ जाता है । एक कामविषयक भावना अभिलाषा वासना रखने से धीरे-धीरे बढ़कर यहाँ ज्वर तक का नंबर आता है । उसके बाद फिर दाह पड़ने लगती । जिसको काम की वासना है उसकी दशा बतला रहे । आपने पुराणों में कभी-कभी पढ़ा होगा कि कोई राजपुत्र किसी पर आसक्त हुआ तो उसकी क्या-क्या दशायें बनती रही हैं । वही दशा यहाँ बतलायी जा रही है । फिर भोजन आदिक में अरुचि हो जाती है । भोजन न करना, दुर्बल होना, श्वास लेना, जिसके अज्ञान है उसको कितनी बड़ी विपत्ति होती है, भोजन आदिक में अरुचि होना, 7वीं बात है मूर्छा हो जाये, बेहोश हो जाये, गिर जाये, यहाँ तक नंबर आ गया । चिंतन से चलते-चलते कामवासना वाले को यहाँ तक खोटी दशायें हो जाती हैं । फिर पागल हो गया यह उसकी 8वीं दशा हैं । फिर प्राणों में भी संदेह होने लगा, आखिर मर भी गया । एक वश होकर ये 10 अवस्थायें जीव की होती हैं ।

(351) भावशुद्धि के लिये निर्दोष ब्रह्मचर्य के पालन का कर्तव्य―वह बड़ा पवित्र है जिसका तत्त्वज्ञान में उपयोग लगता है और उस ही ज्ञानप्रकाश में बढ़ने की धुन रखता है । गृहस्थ भी हो तो जितनी देर कमाई का कार्य करते हैं वह तो गृहस्थी में आवश्यक है । उतनी देर कमाई का कार्य करें दूकान का, आफिस का, पर चूंकि शेष समय जो है वह आपको ऐसा अमूल्य जंचना चाहिए कि हम सारे समय का पूरा सदुपयोग करें । स्वाध्याय से, अध्ययन से, सामायिक से, मनन से, सत्संग में बैठकर तो उसके सहज स्वयं ही ब्रह्मचर्य का भली-भांति पालन होता है । ब्रह्मचर्य का पालन करो, ऐसा आचार्य उपदेश करते हैं, क्योंकि यह जीव मैथुन संज्ञा में आसक्त होकर इस भयानक संसार समुद्र में भ्रमण करता रहता है । तो हे मुनिवर ! ब्रह्मचर्य में रंच भी दोष आ गया तो उसके फल में इस संसार में परिभ्रमण करते रहोगे ।


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