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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 106

From जैनकोष



एवं जिणपण्णत्तं मोक्खस्स य कारण सुभत्तीए ।

जो पढइ सुणइ भावइ सो पावइ सासयं सोक्खं ।।106꠰।

मोक्षपाहुड़ ग्रंथ के पठनश्रवण और अनुभावन का फल शाश्वत आनंद का लाभ―इस प्रकार जो मोक्ष का कारण जिनेंद्र भगवान के द्वारा बताया गया है उसको जो उत्तम भक्ति से पढ़ता है, सुनता है और भावना करता है वह मनुष्य शाश्वत सुख को प्राप्त करता है । यह मोक्षपाहुड़ ग्रंथ की अंतिम गाथा है । इसमें एक तो यह जाहिर किया है कि जो मोक्ष का कारण इस ग्रंथ में बताया है वह अपने मनमाना कहा हुआ नहीं है, किंतु वीतराग सर्वज्ञ जिनेंद्रदेव के द्वारा कहा हुआ है । उनकी दिव्यध्वनि में यह सब अर्थ बसा था और उसको गणधर देव ने सुना था और उसकी व्यक्ति गणधर देव ने की थी उस ही परंपरा से चला आया हुआ यह शासन है, यह उपदेश है, जिसको इस मोक्षपाहुड़ में कहा है । दूसरी बात कही गई है कि इस मोक्षमार्ग के रहस्य को उत्तम भक्ति से पढ़ना चाहिए । यह मोक्षमार्ग का प्रकरण मेरे लिए हितकारी है, इस मार्ग पर चलने से ही मेरा हित संभव है, ऐसी श्रद्धा से पढ़ना चाहिए । तीसरी बात इसमें कही गई है कि बड़ी भक्ति से सुनना चाहिए । पढ़ने से सुनने में अधिक आंतरिक उपयोग लगता है, जो पढ़ता है वह भी अपने लिए सुन लेता है । जो दूसरे लोग सुनते हैं वे भी अपना अंतःप्रकाश बनाते हुए सुनते हैं । चौथी बात इसमें कही गई है कि बड़ी भक्ति से उसकी भावना भी करना चाहिए । जो कुछ मोक्षमार्ग में सुना, यह आत्मा अमूर्त अविकार-स्वभाव ज्ञानप्रकाशमात्र है, तो ऐसा सुनकर अपने आपमें ऐसी भावना रखना चाहिए, अपने आपको उस रूप में अनुभवने का पौरुष करना चाहिए । सो जो पुरुष इस मोक्षमार्ग के रहस्य को पढ़ते हैं, सुनते हैं, भावना करते हैं वे अविनाशी आनंद को प्राप्त करते हैं ।

इस जीव की पहिली और अंतिम अवस्था के विषय में संक्षिप्त कथन―इस जीव की पहली और अंतिम अवस्थावों पर ध्यान दें तो विदित होता है कि यह जीव अपने स्वरूपास्तित्त्व से दर्शनज्ञानमय चैतन्यस्वरूप है, फिर भी अनादिकाल से ही पुद्गल कर्म-उपाधि के संयोग से यह उपयोग अज्ञान मिथ्यात्व रागद्वेषादिक विभावोंरूप से परिणम रहा है और उसके फल में नवीन कर्म का बंध होता है और इस तरह यह संसार में भ्रमण करता आ रहा । सो ये सब मिथ्यात्व की दशायें हैं और मिथ्यात्व की सहकारिणी अनंतानुबंधीकषाय है, सो जब कभी इस कषाय और दर्शनमोह के उपशम से सम्यग्दर्शन का लाभ हो गया हो और सम्यक्त्व छूट जाये, मिथ्यात्व का उदय न आ पाये और अनंतानुबंधीकषाय का उदय होता है तो इसका दूसरा गुणस्थान होता है ꠰ सम्यग्मिथ्यात्व का उदय होने पर यह सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में होता है । इन तीनों ही गुणस्थानों में आत्मभावना का अभाव है, चतुर्थ गुणस्थान से इसके विवेक हित-अहित का, हेय-उपादेय का बोध हुआ करता है और तब ही आत्मा की भावना होती है । चतुर्थ गुणस्थान वाला सम्यग्दृष्टि है । जब इसका परद्रव्यों से हटने का परिणाम होता है तो एकदेश हटने पर एक देशचारित्र होता है, यों पंचम गुणस्थान में यह जीव आता है । इसको श्रावक भी कहते हैं और जब सर्व रूप से परद्रव्यों से हटने का परिणाम होता है तब सकल चारित्र होता है । यह छठा गुणस्थान है, यहाँ संज्वलन कषाय के तीव्र उदय से स्वरूप के साधने में प्रमाद रहता है, किंतु सर्वपापों से निवृत्त हो गया इसलिए विरत भी है । अब यहाँ से ऊपर के गुणस्थानों में सहजात्मस्वरूप की साधना प्रगतिरूप चलती है । संज्वलन कषाय का मंद उदय होने पर यह अप्रमत्तविरत गुणस्थान में पहुंचता है । यहाँ धर्मध्यान पूर्णरूप से है, और इस ही गुणस्थान में जब स्वरूप में लीन होता है तो सातिशय अप्रमत्तविरत होता है, आगे के गुणस्थानों में चढ़ने का पात्र होता है ꠰ सो जिस जीव के क्षायिक सम्यक्त्व है, जो तद᳭भव मोक्षगामी है वह क्षपकश्रेणी के 8वें गुणस्थान में पहुंचता है । पुन: 9वें गुणस्थान में पहुंचकर संज्वलन लोभ को छोड़कर यहाँ अन्य समस्त कषायें दूर हो जाती हैं । इसके बाद 10वें गुणस्थान में संज्वलन लोभ का भी क्षय कर देता है । 10वें से 12वें गुणस्थान में पहुंचकर शेष घातियाकर्म-प्रकृतियों का नाश करके 13वें गुणस्थान में केवली भगवान हो जाता है । ये कहलाते हैं अरहंत परमात्मा । ये वीतराग हैं, सर्वज्ञ हैं, अनंत आनंदरस में लीन हैं । इनके जब अघातिया कर्म भी दूर होते हैं, तब ये सिद्ध हो जाते हैं । योगनिरोध पूर्ण हो जाने पर 14वें गुणस्थान में अघातिया कर्मों का क्षय हुआ करता है । क्षय होते ही ये सिद्ध भगवान होते हैं, जहाँ सर्वकर्मों का अभाव है ।

सहज परमात्मतत्त्व की स्वयं के लिये शरण्यता―मोक्षमार्ग का फल सिद्ध भगवान होना है । जीव की आखिरी मंजिल जहाँ आनंद-प्रवाह निरंतर धारा से एकसमान चलता रहता है वह स्थान, वह धाम उस अवस्था का लाभ, यह है आत्मा की मंजिल । ऐसी उत्कृष्ट अवस्था का कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक᳭चारित्र है । इसी को मोक्ष का कारण कहते हैं, इस मोक्षकारण का इस ग्रंथ में कथन हुआ है । इन मोक्षमार्गविषयक तत्त्वों को जो भव्य जीव भक्ति से पढ़ता है, भक्ति से सुनता है और भक्ति से अपने आपमें उसे घटित करता है, भाता है वह पुरुष इस ही सहजात्मस्वरूप के आश्रय से स्वयं अपने अनंत विकास को प्राप्त कर लेता है । हम आपको उस अनंत विकास का लक्ष्य करना चाहिए । शेष घटनायें सब औपाधिक हैं, मेरे हितरूप नहीं हे, ऐसा जानकर उनसे अपेक्षा करना और रत्नत्रय के धाम निज सहजस्वभाव की दृष्टि करना, यह ही हम आपके लिए एक वास्तविक शरण है ।


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