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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 12

From जैनकोष



जो देहे णिरवेक्खो णिद्दंदो निम्ममो निरारंभो ।

आदसहावे सुरओ जोई सो लहइ णिव्वाणं ।।12।।

देहनिरपेक्ष निकटभव्य का निर्वाणलाभ―जो पुरुष देह में निरपेक्ष है वह पुरुष निर्वाण को प्राप्त करता है । देह में अपेक्षा न रहे तो कहीं तो उपयोग लगेगा कि यह मैं हूँ । जब देह को अत्यंत पृथक् देख लिया तो इस ही आत्मस्वभाव को तो मानेगा कि यह मैं हूँ, वह मानता है आत्मस्वभाव को कि यह मैं हूँ । जो शाश्वत चैतन्यस्वरूप है वह मैं हूँ ऐसे आत्मस्वभाव में रत हुआ यह भव्य जीव निर्वाण को प्राप्त होता है । अपनी गल्ती यदि गल्ती मालूम पड़ जाये तो वह गल्ती का सुधार कहलाता है । मोह में तो यह जीव गल्ती को गल्ती ही नहीं समझ पाता । जैसे कोई रास्तागीर दूसरे मार्ग पर चला गया, जहाँ जाना था वह मार्ग छूट गया, पर चित् में यह बात बसी है कि मैं सही मार्ग पर जा रहा हूँ तो उसके कोई साथी ही या अन्य कोई समझायें कि आप तो रास्ता भूल गए, पर उसको यह सही श्रद्धा बनी है कि यह ही है सही मार्ग तो वह वहाँं से वापिस नहीं लौटता, परिणाम यह होता कि वह आगे बढ़ता जाता है और भूल का रास्ता लंबा होता जाता है । जब कुछ और आगे चलकर कुछ बुद्धि ठिकाने होती है तो समझ में आता कि मैं रास्ता भूल गया हूँ, सो उसे उतना रास्ता वापिस लौटना पड़ता है । तो मोह में यह जीव अपनी गल्ती को गल्ती नहीं स्वीकार कर पाता । यदि अपनी गल्ती को गल्ती मान ले तो इसके मायने हैं कि उसकी श्रद्धा में गल्ती नहीं रही । देह में अपेक्षा होना, यह देह ही मेरा कल्याणरूप है, देह से ही मेरा भला है, यह ही मेरा सर्वस्व है, ऐसा मानने वाला देह से निरपेक्ष नहीं हो सकता । जो देह से निरपेक्ष न होगा वह आत्मस्वभाव में लीन नहीं हो सकता । तो देह-निरपेक्ष पुरुष ही, जीव ही आत्मस्वभाव में रत होकर निर्वाण को प्राप्त होते हैं ।

निर्द्वंद्व निकटभव्य का निर्वाणलाभ―जो पुरुष निर्द्वंद्व है वही आत्मस्वभाव में लीन हो पाता है । द्वंद्व का अर्थ है क्षोभ, विभ्रम, उल्झन । जब तक यह द्वंद्व रहता है तब तक, आत्मस्वभाव में उसके रति नहीं होती । यह उल्झन हुई क्यों? यह द्वंद्व शब्द ही बतला रहा । द्वंद्व का असली अर्थ उल्झन नहीं है किंतु इसका अर्थ है दो में पड़ना, इसको कहते हैं द्वंद्व । जो दो में पड़ेगा अर्थात् दूसरे में लगेगा वह नियम से उल्झन में आयेगा । ज्ञानी पुरुषों ने हमेशा अपने आपको निर्द्वंद्व तक, इसमें किसी दूसरे का कुछ दखल नहीं है । दो दर्शन मिलकर एक नहीं होते । प्रत्येक सत् पृथक्-पृथक् स्वयं-स्वयं ही रहा करते हैं । फिर वहाँ द्वंद्व का क्या काम? मैं एक हूँ,असहाय हूँ,केवल ज्ञानमात्र हूं । इससे ही मेरा सारा लोक है, इसमें ही मेरा सारा व्यवसाय है । मैं अपने में आप ही हूँ,ऐसा लखने वाला पुरुष आत्मस्वभाव में लीन होता है । धन्य है वह समागम जिस समागम से यह प्रेरणा मिले कि बाहर में किसी भी दूसरे पदार्थ में भ्रम मत करो, उपयोग मत जोड़, सर्वस्व मत मानो । ऐसा जहाँ एक भाव प्राप्त हो समागम वह धन्य है । गृहस्थ भी वह धन्य है जो कुटुंब में रहते हुए भी अपने आपको समागमों से निराला लख रहा है और धर्ममार्ग में बढ़ रहा है और इस ही प्रकार कुटुंब के दूसरे जीवों को भी उपदेश कर रहा है और उन्हें भी धर्ममार्ग में चलने के लिए स्वतंत्र कर रहा है । आखिर वियोग तो सबका होगा मगर समागम में रहकर धर्म की ओर प्रेरणा मिले एक को दूसरे से और राग मोह से हटने की प्रेरणा मिले तो वह समागम भी उसके लिए एक काम का बन गया, और जिस समागम में केवल विषय हो पोषे जायें, केवल कषाय ही बढ़ायी जाये तो खुद भी डूबे और दूसरों को भी डुबाया । निर्द्वंद्वता कैसे आये, उस भाव का आदर करना चाहिए-―वह है स्वतंत्र-स्वतंत्र सत् का परिचय ꠰ कोई सोचे कि ऐसा अगर स्वतंत्र-स्वतंत्र सत्ता का परिचय करेंगे तो घर में कैसे रहेंगे ? अरे ! हीन संहनन है और चारित्रमोह का उदय है । संहनन-शक्ति का कुछ उपयोग नहीं हो रहा है तो इस परिस्थिति में घर में ही तो रहना पड़ेगा और अंत: है स्वतंत्र सत् का परिचय, तो उसकी यह स्थिति बन जायेगी कि जल में भिन्न कमल है । कमल जल में पैदा हुआ और जल में ही रह रहा, पर जब तक जल से ऊपर उठा हुआ है तब तक वह कमल प्रफुल्लित है, मुस्कराता है और यदि यही कमल जल में पैदा हुआ, उस जल से मोह करने लगे, मैं तो जल से लिपटकर ही रहूंगा, मैं जल से अलग न रहूंगा तो कमल सड़ जायेगा । जल में पड़ा हुआ कमल सड़ता है, प्रफुल्लित नहीं रहता ऐसे ही यह मनुष्य घर में उत्पन्न हुआ, कुटुंब में उत्पन्न हुआ और कुटुंब में ही रह रहा, पर कुटुंब से ऊपर उठा हुआ न रहे, कुटुंब से लिपट कर एकमेक मानकर रहे तो वह मनुष्य भी सड़ा-सा समझिये । ज्ञानप्रकाश नहीं, कायरता बनी है, वह अनेक घटनाओं को देखकर अधीर हो जाता है । अपने आपमें संतोष नहीं तो उसे सड़ा हुआ ही समझिये । तो जैसे कमल जल में उत्पन्न होता, जल में रहकर जल से ऊपर रहता है तो उसकी स्थिति बढ़िया है ऐसे ही मनुष्य कुटुंब में उत्पन्न होकर कुटुंब में रहकर कुटुंब से विविक्त रहता हुआ मानता है तो उसकी स्थिति अच्छी है । जो निर्द्वंद्व पुरुष है वह आत्मस्वभाव में रत होकर निर्वाण को प्राप्त होता है ।

निर्मम निरारंभ निकटभव्य का निर्वाणलाभ―निर्मम मनुष्य आत्मस्वभाव में रत होकर निर्वाण को पाता है । निर्मम का अर्थ है ममतारहित । ये पदार्थ मेरे हैं ऐसा श्रद्धान नहीं है ज्ञानी को, क्योंकि है ही नहीं मेरे । तो ज्ञानी को किसी भी परद्रव्य में ममत्व नहीं है, क्योंकि उसने सर्व पदार्थ का स्वतंत्र-स्वतंत्र सत्त्व खूब समझ लिया है । एक का दूसरा कुछ नहीं, फिर इसका यह है, यह भाव कैसे बनेगा? मेरा कुछ है यह भाव कैसे बनेगा? मेरा मात्र मैं हू̐ और वह मैं एक । क्या ? शाश्वत् चैतन्यस्वभाव । यही मैं हू̐, यही मेरा है । यही सर्वस्व है, ज्ञानी के स्व में आत्मत्व का भाव है अत: वह निर्मम है, ममता रहित है । जो निर्मम होता है वह आत्मस्वभाव में रत हो पाता है । जो आत्मस्वभाव में रत हो गया वह निर्वाण को प्राप्त करता है । ज्ञानी जीव निरारंभ है । स्वभाव से और प्रयोग से दोनों ही बातों से निरारंभ हुआ दिगंबर मुनि आत्मस्वभाव में रत होकर निर्वाण को प्राप्त होता है । श्रद्धान में तो निरारंभ गृहस्थ भी है । मैं बाह्य पदार्थों में क्या कर सकता हूँ । क्योंकि मैं आत्मपरिणमन में ही परिणमता हूँ, बाहर नहीं परिणमता । परमाणुमात्र का परमाणुमात्र भी मैं कुछ करता नहीं हूँ । मैं अपने ही गुणों का परिणमन करता हूँ । बाहर मेरा कर्तृत्व नहीं, ऐसी श्रद्धा में वह निरारंभ है फिर भी जब तक चारित्र में निरारंभ नहीं होता, समस्त द्रव्यों का त्याग कर नहीं सकता, केवल एक धर्मध्यान की ही धुन रहे, ऐसी जिसकी स्थिति नहीं बनती तब तक निर्वाणलाभ नहीं है । सो जो ज्ञानी निरारंभ होता है वह आत्मस्वभाव में लीन होता है और निर्वाण को प्राप्त होता है ।

आत्मस्वभाव में सुरत होने की निर्वाणसाधनता―अपने बारे में कैसा ध्यान रहना चाहिए इसका आत्मानुशासन में दिग्दर्शन कराया है कि मैं अकिंचन हूँ याने अन्य कुछ नहीं हूँ । मेरा अन्य कुछ नहीं है, अकिंचन हूँ, ऐसी भावना करता हुआ अकिंचनरूप ठहर तो जा । तू लोकाधिपति बनेगा । सर्वज्ञता बाहरी पदार्थों को जान-जानकर नहीं मिला करती । मीमांसक सिद्धांत में तो बताया है कि पदार्थों को जानते जावो, जानते जावो, जब सब ज्ञान जुड़ गया तो सर्वज्ञ बन गए, पर वह सर्वज्ञता ऐसी नहीं हुआ करती । बाह्य पदार्थों का जानना छोड़े, विकल्प छोड़े, केवल अपना सहजस्वरूप ही अपने आपके ज्ञान में लेवें तो इस उपाय से सर्वज्ञता प्रकट होगी । एक-एक पदार्थ को जान-जानकर और उनको जोड़-जोड़कर सर्वज्ञता नहीं बनती । जैसे गेहूं भर-भरकर बोरा भर जाता ऐसे ही सबको जान-जानकर सर्वज्ञता हो जाये, ऐसा नहीं होता । सर्व कितना है? अनंतानंत । उनको एक-एक भी जान कैसे सकेगा ? और एक-एक के जान-जानकर सब कुछ जान ले ऐसी योग्यता भी नहीं होती । सबका जानना छोड़ दें तो सबका जानना बन जायेगा । सबके जानने का प्रयास करें तो सबका जानना नहीं बन सकता । इस कारण योगीजन क्या प्रयत्न करते हैं कि मैं अकिंचन हूँ । एक चैतन्यमात्र हूँ, मेरा अन्य कुछ नहीं है, ऐसा ध्यान करते हैं, ऐसा ही ज्ञान करते हैं और उसका परिणाम है कि त्रिलोकाधिपति अर्थात् सर्वज्ञ हो जाते हैं । यह है परमात्मस्वरूप प्राप्त करने का योगिगम्य रहस्य । जिस रहस्य को योगीजन जानते हैं ।

आत्मदृष्टि से विमुख रहने में अकल्याण―आत्मदृष्टि के विरुद्ध दुनियां के मनुष्यों की क्या परिणति चल रही है ? नामवरी, यश, कीर्ति आदिक, जिसके व्यामोह में आत्मा का चाहे बुरा हो जाये पर भला नहीं होता । ऐसे गुरु के हृदय में जीवों के प्रति दया नहीं रह पाती । यह क्या है ? इस अकिंचनता के विरुद्ध पुरुषार्थ है । जहाँ आरंभ है वहाँ दया नहीं रहती । कुछ भी कार्य करे वहाँ सर्व जीवों के प्रति दया का भाव बना रहे चित्त में ऐसी बात उसके लिए असंभव-सी है, क्योंकि वह कुछ कर रहा है बाहरीपदार्थों में प्रवृत्ति तो कुछ सोचकर ही तो कर रहा, कुछ स्वार्थ ही तो वह मान रहा । जहा̐ स्वार्थ है वहाँ दया नहीं बसती । भले ही मोटी दया बने जहाँ तक जाना कि मेरा नुकसान नहीं है वहाँ तक दया तो चलेगी । और जहाँ यह समझा कि अब इसमें तो मेरा नुकसान हो जायेगा, मेरा इतना द्रव्य घट जायेगा, मेरे यश कीर्ति में धक्का लग जायेगा; जहाँ यह स्वार्थ आया वहाँ फिर दया को स्थान नहीं रहता । जहाँ कोई प्रकार की शंका बनी रहती है वहाँ सम्यक्त्व नहीं रहता । पदार्थों का स्वरूप कैसा है ? पदार्थों में सारी पर्यायें इस समय बसी हुई नहीं हैं, वे क्रम से निकलती हैं, क्या ऐसा है या पदार्थ एक समय में एक पर्यायरूप है, अगले समय जैसा योग हुआ वैसी पर्याय प्रकट होती है । सो किसी तरह की भीतर में शंका हो तो वहाँ सम्यक्त्व नहीं है । एक सत᳭कार्यवाद नाम का एकांतदर्शन है, जिनका यह सिद्धांत है कि एक वट के बीज में भी अनगिनते वृक्ष पड़े हैं । और उसकी युक्ति वे इस प्रकार देते हैं कि यदि सैकड़ों वृक्ष न पड़े हों उस अत्यंत छोटे बट के बीज में तो बोया जाने पर उससे वृक्ष कैसे बन जाता ? यह सत्कार्यवाद का सिद्धांत है । उन्होंने यह वस्तुत्व न समझ पाया कि वह दाना तो अब अजीव है । सूखे हुए बीज में जीव नहीं होता । वह प्रासुक कहलाता, पर एक ऐसा निमित्तनैमित्तिक योग है कि वह दाना खेत में पड़े और हवा, पानी आदिक अनुकूल मिलें तो उनका निमित्त पाकर कोई जीव एक शरीर रूप से ग्रहण कर लेता है और अंकुर बन जाता है । सूखे दाने में जीव जरा भी नहीं है, अगर जीव होता तो उसे कैसे खाया जाता ? साधु-संतजन कैसे उसे ग्रहण करते ? तो द्रव्य में सदा पर्याय एक है । अनेक पर्यायें भूत भविष्य में नहीं बसी हैं, किंतु पर्याय के बाद पर्याय ही पायेगा, पर्यायशून्य कभी नहीं रहता है ꠰ सो जैसा उपादान होता है और जैसा निमित्त के सद्भाव या अभावरूप योग होता उसके अनुकूल अगली-अगली पर्याय उत्पन्न होती रहती है । मैं जीव हूँ, जिस पर्यायरूप हूँ वह भी क्षणिक है, शाश्वत नहीं है । मैं शाश्वत चैतन्यस्वरूप हूँ । अपने आपके स्वरूप में सम्यग्दृष्टि जीव को रंच भी शंका नहीं रहती । जहाँ शंका है वहाँ सम्यक्त्व नहीं, जहाँ परिग्रह है वहाँ दीक्षा नहीं । परपदार्थों का जहाँ ग्रहण हो रहा है वहाँ साधुता नहीं रहती । परपदार्थों का जहाँ ग्रहण हो रहा है वहाँ साधुता नहीं रहती । तो सम्यग्दृष्टि अपने को निरांभ निष्परिग्रह निशंक स्थिति में रखना चाहता है और इसके लिए जिनको बाधक मानता है उनको दूर करता है और स्वयं ही एक निर्ग्रंथ अवस्था में आ जाता है । जिससे प्रयोजन नहीं, उसे भी छोड़ा, घर से प्रयोजन नहीं, उसे भी छोड़ा, वस्त्रादिक से प्रयोजन नहीं उसे भी छोड़ा । ‘फांस तनिकसी तन में साले, चाह लंगोटी की दुःख भाले ।’ बाधक कारणों को छोड़ते जाना बस इसी धुन में रहता है । जब सब छूट गया तो उसका वह निर्ग्रंथ मुनिस्वरूप प्रकट होता है । तो ऐसे निरारंभ निर्मम निर्द्वंद्व देह में निरपेक्ष आत्मस्वभाव में रत मनुष्य निर्वाण को प्राप्त होते हैं । वही योगी है जो अपने इस आत्मस्वभाव के योग में जुड़ जाता है । करने का कर्तव्य एक ही है सबके लिए कि बाह्य तत्त्वों में लगाव न रहे और अपने आपके इस सहज परमात्मस्वरूप की सुध रहे । मैं यह हूँ और इस श्रद्धा से विचलित न हो तो वह मोक्षमार्ग में प्रगति करता है ।


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