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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 23

From जैनकोष



सग्गं तवेण सव्वो वि पावए तहिं वि झाणजोएण ।

जो पावइ सो पावइ परलोए सासयं सोक्ख ।।23।।

आत्मध्यान से शाश्वतसुख का लाभ―इस गाथा में कुंदकुंदाचार्य देव कह रहे हैं कि तपश्चरण से तो स्वर्गादिक मिल जाते हैं किंतु जो ध्यान के बल से स्वर्ग प्राप्त करता है, स्वर्ग प्राप्ति तो वह कहलाती है, क्योंकि ध्यान के बल से सद्गति पाने वाला जीव एक भव मनुष्य का पाकर मोक्ष चला जाता है । स्वर्ग मिलना कोई कठिन बात नहीं है । थोड़ासा कीड़े-मकोड़ों पर या पशु पक्षी पर दया करने से भी स्वर्ग मिल जाता है, किन्हीं लोगों पर दया करके उनके संकटो को दूर करने से भी स्वर्ग मिल जाता है, किंतु उस स्वर्ग मिलने में निर्मल शुद्ध आत्मउपासना की बात नहीं बसी है, इसलिए वह तो एक संसार में रुलने जैसा ही कार्य है । भला करने से ही स्वर्ग मिल गया, किंतु जो आत्मतत्त्व का ध्यान करता है और उस ध्यान से जो विशुद्धि बनती है उस विशुद्धि से वर्तता हुआ पुरुष स्वर्ग जाता है तो यह संस्कार वहाँ भी रहता है और उसके प्रताप से एक भव पाकर मोक्ष जा सकता है, जिसको उत्तम ध्यान है वह स्वर्ग में जन्म ले तो वहां देवियों का बड़ा झुंड रहता है, उनके बीच में रहना पड़ता है, तो जो मात्र तपश्चरण से हो स्वर्ग गए वे वहाँ भी मोहित हो सकते हैं और जो आत्मध्यान के बल से स्वर्ग गए वे वहाँ मोहित नहीं होते । एक बात सोचें कि जो आचार्यगण हुए हैं समंतभद्र, अकलंकदेव, कुंदकुंदाचार्य, अमितगति, अमृतचंद्राचार्य आदिक आध्यात्मिक पुरुष जो मुनि पहले हो गए हैं वे इस समय कहां होंगे ? यद्यपि निश्चय में कोई नहीं कह सकता, पर अनुमान यही है कि वे इस समय स्वर्ग में होंगे, और स्वर्ग में क्या कर रहे होंगे ? अनेक देवियों के बीच बैठे होंगे, कोई देवी नृत्य, वादित्य, संगीत, हावभाव आदि भी उनके सामने प्रस्तुत करती होंगी, ऐसी सभायें भी होती होंगी, और वह उनके बीच बैठकर कुछ अपना सिर भी मटका लेते होंगे, जो आचार्य इतने विरक्त थे कि जिन्हें मुनिश्रेष्ठ कहा गया, वे इस समय स्वर्ग में होंगे तो उन देवियों के बीच उस शौक साज का समर्थन भी कर रहे होगे फिर भी आत्मध्यान के प्रताप से वे स्वर्ग गए तो वहाँ भी आत्मा की सुध रख रहे होंगे । वे वहाँ विभ्रांत न हो रहे होंगे । तो जो आत्मा के भानपूर्वक मरकर स्वर्ग जायेगा तो वहाँ भी आत्मा का भान रहेगा और जो मात्र तपश्चरण से या थोड़ी दया से स्वर्ग गए और अंतस्तत्व के ध्यान की बात नहीं है तो उनका जीवन ऐसा ही है जैसे कि अनेक भव पाये । तो यहाँ आत्मध्यान की महिमा बतायी जा रही है । आत्मध्यान का ऐसा प्रताप है कि स्वर्ग सुख भोगेगा और निकटकाल में मनुष्यपर्याय पाकर मुनिव्रत धारणकर मोक्ष पायेगा । कोईसा भी संकट हम आप पर कभी आये तो उस संकट को मिटाने का उपाय क्या है सो तो बताओ । वैभव का संचय करना उपाय नहीं है । परपदार्थों में रागद्वेषमोहादि करना उपाय नहीं है, किंतु आत्मा के यथार्थस्वरूप का ध्यान होना उपाय है । इसके सिवाय कोई अन्य उपाय नहीं और मानो जंचता हो कोई उपाय तो वह केवल थोड़े समय को संकट शमन करने का उपाय है । कोई-कोई तो ज्ञान ध्यान तप में लीन आध्यात्मिक संत इस कलिकाल में भी सर्वार्थसिद्धि के देवों की भांति लौकांतिक देव होकर एकाभवतारी हो जाते हैं ।

आत्मध्यान के प्रताप से सकल संकटों का त्वरित हटाव―एक उदाहरण लो―यमुना नदी में बड़े-बड़े कछुवे रहते हैं, मान लो कोई कछुवा जो कि पानी के अंदर तैर रहा था उसके मन में आया कि मैं पानी से ऊपर अपना मुख निकालकर तैरुं और कुछ विशेष आराम करूं । तो उस कछुवे ने पानी से ऊपर-ऊपर अपनी चोंच करके तैरना शुरु किया । इतने में हुआ क्या कि कुछ पक्षी पूरब दिशा की ओर से उड़कर आये और उसकी चोंच चोटने लगे तो वह बेचारा कछुवा घबड़ाकर पश्चिम दिशा की ओर भागा । फिर कुछ पक्षी पश्चिम दिशा से भी आये उसकी चोंच चोटने के लिए तो वह उत्तर दिशा की ओर भागा । थोड़ी ही देर में चारों ओर से अनेकों पक्षी आ आकर उसकी चोंच को चोटने लगे । वह बेचारा कछुवा अब इधर-उधर चारों ओर भागता फिर रहा था और अपने को बड़ा दुःखी असहाय अनुभव कर रहा था । अब बताओ उसका यह दुःख कैसे दूर हो ? तो उसे कोई समझा दे कि रे कछुवे ! तू व्यर्थ में क्यों दुःखी होता फिर रहा ? अरे ! तेरे अंदर तो एक ऐसी कला है कि यदि उसका उपयोग करे तो एक ही क्या सैकड़ों दुःख तेरे एक साथ टल सकते हैं । क्या है वह कला ? अरे ! कोई 4-6 अंगुल पानी में अपनी चोंच डुबा ले फिर ये सारे पक्षी तेरा क्या बिगाड़ कर सकेंगे ? ठीक है, उसकी समझ में आ गया वह उपाय सो वह पानी में कोई 4-6 अंगुल पानी के अंदर अपनी चोंच डुबा लेता है, सो सारे संकट उसके एक साथ टल जाते हैं । उन पक्षियों का फिर उस पर कोई वश नहीं चलता, तो ऐसे ही हम आप यह समझें कि हम आप क्यों निरंतर दुःखी रहा करते हैं ? सो उसका कारण यह है कि हम आप अपने उपयोगरूपी चोंच को बाहर निकालकर चारों ओर भगते फिरते हैं याने यह उपयोग बाहर-बाहर दौड़ रहा है जिसके फल में सैकड़ों प्रकार के कष्ट आते रहते हैं, संकट आते रहते हैं । कहीं बाहर में थोड़ा भी आराम में कमी आये तो यह खेद मानता है, पर इस पर भी संकट आते रहते हैं, अपनी इज्जत प्रतिष्ठा में कमी आये तो उसका भी संकट मानता है । मान लो, धन वैभव में कुछ कमी आयी तो उसका भी बड़ा कष्ट मानते हैं । फिर चोर, राजा, अग्नि आदिक अनेक प्रकार के उपद्रवों का बड़ा संकट मानते हैं । तो रोज-रोज संकट आते हैं और उन संकटों का उपाय भी बनाते हैं, और बनते हैं । मगर वे सब शमनरूप हैं, पर तेरे में एक ऐसी कला है कि जिसका प्रयोग करे तो एक-दो ही नहीं, सारे संकट एक साथ समाप्त हो जायेंगे । वह क्या कला है कि तू है ज्ञानस्वरूप, ज्ञानसरोवर में तू बस रहा है तो तू अपनी इस उपयोग की चोंच को अपने ही ज्ञानसरोवर में मग्न कर दे तो सारे संकट एक साथ तेरे से दूर हो जायेंगे और उस समय जो सहज आनंदस्वभाव का अनुभव करेगा उसके प्रताप से पूर्वबद्ध कर्म भी क्षीण हो जायेंगे । अत: एक ही उपाय करें कि आत्मा का जो यथार्थ स्वरूप है उसके ध्यान में रहें, फिर जैसे भी कल्याण होना होगा सो होगा और निर्वाण भी प्राप्त कर लेंगे ।


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