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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 26

From जैनकोष



जो इच्छइ निस्सरिदुं, संसारमहण्णवस्स रुंदस्य ।

कम्मिधणाण उहण सो झायइ अप्पय सुद्ध ।।26।।

संसारमहार्णव से निकलने का उपाय शुद्धात्मतत्त्व का ध्यान―जो महापुरुष इस संसाररूपी महासमुद्र से पार होना चाहते हैं, कर्मईंधन की अग्नि को बुझाना चाहते हैं तो वे शुद्ध आत्मा का ध्यान करते हैं । शुद्ध आत्मा का तथ्य जानना बहुत आवश्यक है धर्म का पालन करने वालों को । इस तथ्य को यदि न जान सके तो वास्तव में धर्म न बनेगा । और जो अपने शुद्धआत्मस्वरूप के तथ्य को जान सके वे धर्ममार्ग में बढ़ते चले जायेंगे, इस कारण सर्व प्रयत्न करके तन, मन, धन, वचन, प्राण सर्वस्व समर्पण करके भी यदि शुद्ध आत्मा के तथ्य को जान लिया तो आपने सब पा लिया । वह शुद्ध आत्मतत्त्व क्या है ? एक दृष्टांत लो, जैसे किसी बर्तन में मान लो 8-10 तरह के अनाज के दाने रखे हैं―गेहूँ, चना, ज्वार, मक्का, सांवा, कोदो आदिक । मगर यह तो बतलावो कि प्रत्येक अनाज का दाना अपने-अपने दाने में ही है या किसी दूसरे दाने में घुस गया ? अपने ही दाने में है । तो शुरु का अर्थ यह जानें कि अपनी सत्ता अपने में रहे, अपनी सत्ता पर में न जाये, पर की सत्ता मुझमें न आ जाये, ऐसा शुद्ध, अपने-अपने सत्त्व में रहने को शुद्ध कहा करते हैं । जिसे कहो एकत्व विभक्त । समयसार में यह शब्द दिया है याने पर से निराला और अपने स्वरूप में तन्मय ꠰ ऐसे अपने आत्मा को देखें तो कहलायेगा कि यह शुद्ध आत्मा का ध्यान कर रहा है ।

पर्यायशुद्धि और द्रव्यशुद्धि का विश्लेषण―परमात्मा तो पर्याय से शुद्ध है । यहाँ पर्यायशुद्धि की बात नहीं कह रहे, वह तो एक उत्कृष्ट पद है, जहाँ हमको पहुंचना है । वे परमात्मपद अरहंत सिद्ध हैं मगर उस पद तक पहुंचने का उपाय क्या है ? वास्तव में कि अपने आपको समस्त पर से निराला, विकार से निराला केवल अपनी सत्तामात्र जो अपने में स्वभाव है, उस स्वभावमात्र अपने को निरखने का नाम है शुद्ध आत्मा का ध्यान करना । जैसे शुद्ध दूध । शुद्ध दूध क्या कहलाता कि कोई चीज उस दूध में मिली न हो और दूध में रहने वाले तत्त्व दूध में पूरे के पूरे हों, उसे कहते हैं शुद्ध दूध । यहाँ व्रती त्यागी जनों के खाने-पीने में काम आने योग्य शुद्ध दूध की बात नहीं कह रहे । उसमें तो अठपहरा पानी मिला दिया जाये फिर भी शुद्ध कहलायेगा । ऐसे शुद्ध की बात नहीं कह रहे किंतु दूध स्वयं द्रव्य में कैसा शुद्ध होता है, जैसा शुद्ध होवे उस द्रव्यशुद्धि की बात कह रहे हैं, याने दूध में एक बूंद भी काई चीज न तो डाली गई हो और न निकाली गई हो, दूध मात्र दूध रहे वह कहलाता है शुद्ध दूध । उसमें मान लो एक भी बूंद पानी डाल दिया या उसमें से क्रीम निकाल लिया गया तो अब वह शुद्ध दूध न रहा । तो यहाँ द्रव्यदृष्टि से शुद्धि की बात बोल रहे हैं कि उस दूध में कोई अन्य चीज मिलाना नहीं और उससे में कोई चीज निकालना नहीं, उसे कहते हैं शुद्ध । तो अपने आत्मा को जो इस तरह से निरखना है कि यह मैं आत्मा देह से अत्यंत जुदा हूँ । सत्ता को निरख रहा है ज्ञानी । कर्म से अत्यंत जुदा और कर्म का संबंध होने से जो रागद्वेष का प्रतिफलन हो रहा है उससे भी अत्यंत जुदा केवल चैतन्यस्वभावमात्र यह मैं आत्मा हूँ । इस तथ्य तक जो आया वह महाभाग धन्य है, पवित्र है, पूज्य है, उसने संसार के सारे संकट समाप्त कर लिये, नियम से वह मुक्ति पायेगा ।

अपने पर विवेकपूर्ण प्रयोग का अनुरोध―भैया! तृष्णा करना है तो इस स्वभाव की आराधना की तृष्णा करना है । बाह्य पदार्थों की तृष्णा में संकट ही संकट है । मान लो आपमें मायाचारी करने की आदत पड़ी है तो तन मन वचन से चूंकि ऐसी गृहस्थी की परिस्थिति में रहते हैं सो राग प्रीति का व्यवहार करें और अंतरंग में अविकार ज्ञानस्वभाव की आराधना में मस्त रहें । यह माया बुरी नहीं है । यह तो सम्यग्दृष्टि की सही लीला की बात कह रहे । यदि घमंड ही करना है, एक गौरव अपने में अनुभव करना है तो आत्मा का जो सहज सामर्थ्य है, अनंतज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत आनंद, अनंतशक्ति, उसको, निरख करके अपने में तृप्त होइये । क्रोध करने की आदत पड़ी है तो क्रोध करिये अपने दोषों पर, दूसरे जीवों पर नहीं । ये विषय के भाव क्यों जगते हैं ? यह संसार में अपना नाम फैलाने का भाव क्यों जगता है ? यह सब कूड़ा करकट है, बेकार बात है । ये दोष क्यों जग रहे हैं, ऐसे दोषों पर गुस्सा कीजिए और जैसे गुस्सा करके दूसरों की झोंपड़ी उखाड़ देते हैं लोग ऐसे ही अपने दोषों पर गुस्सा करके दोषों के आश्रयभूत इन परिग्रहों को उखाड़ फैंकिये । अपने आपको समस्त परपदार्थों से निराला अपने ही स्वरूप में तन्मय चैतन्यमात्र अपने को देख लें तो यह अपने ऊपर वास्तविक दया होगी और विषयों में रमना, विषयों में लगना, इस संसार को अपना वैभव समझना यह सब अपना घात किया जा रहा है । तो देखो जो एक मनुष्य का घात करता है उसको यहाँ लोक में प्राणदंड दिया जाता है, किंतु जो अपने भगवान आत्मा पर प्रहार कर रहा है, अपने चैतन्यस्वभाव का घात कर रहा है, स्वरूप-विकास की दृष्टि ही नहीं है, दोषों से भरा जा रहा है तो उसके लिए निगोद में उत्पन्न होना, नरक में उत्पन्न होना यह ही दंड मिलता है । इस कारण अपने भगवान ज्ञानघन आत्मा पर, परमात्मा पर विषयकषायों का आक्रमण न करें तो संसार के संकटों से हम सदा के लिए छूट सकेंगे । सो बतलाया जा रहा कि जो संसार से छूटने की इच्छा करता है वह इस शुद्ध आत्मा का ध्यान करता है ।


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