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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 29

From जैनकोष



जं मया विस्सदे रूवं तण जाणादि सव्वहा ।

जाणगं दिस्सदे णेत तम्हा जंपेमि केण ह ।꠰29꠰꠰

ज्ञानी योगस्थ श्रमण के मौनव्रत का कारण―उक्त गाथा में यह बताया है कि सारे पाप-पुण्य की प्रवृत्तियों को छोड़कर मौनव्रत में रहता हुआ यह योगी शुद्ध आत्मा के प्रकाश में रह रहा है । अब योगीजन अधिकतर मौन क्यों रहते हैं ? तो उसका उत्तर इस गाथा में है । ये महापुरुष जानते हैं कि जो मेरे द्वारा दिख रहा वह जानता ही नहीं । क्या दिख रहा ? यह भींत खंभा वगैरह, यह शरीर, शरीर भी नहीं जानता । जो ये मृतक शरीर खंभा, मिट्टी, पत्थर आदि दिखते ये भी नहीं जानते । ये स्थावर जीवों के मृतक शरीर हैं । ये सड़ते गलते नहीं । मांस की तरह ये दुर्गंध पैदा नहीं करते क्योंकि स्थावर जीवों के देह में मांस नहीं होता, अंगोपांग नहीं होते, हाथ-पैर नहीं होते, पीठ-पेट भी नहीं होते । वह तो एकमात्र स्पर्शन इंद्रिय वाला ही शरीर है । पर जो भी दिखता है वह जानता नहीं है और जो जाननहार है वह दिखता नहीं, और यह मैं ज्ञायकस्वरूप आत्मा हूँ, यह किसी को दिखता नहीं है । तो जब मुझे कोई ज्ञायक नहीं दिखता तब किसी को मैं ज्ञायक नहीं दिख रहा हूँ । तब फिर किससे बोलनाचालना । जैसे कोई-कोई पुरुष अपनी स्त्री में इतना अधिक मोहित होवे कि उस स्त्री के गुजर जाने के बाद स्त्री के फोटो से बातचीत किया करते । अब भला बताओ यदि कोई ऐसा करे तो उसे लोग क्या कहेंगे ? शायद उसे पागल ही बतायेंगे । एक घटना बनारस की ऐसी ही है, गुरुजी सुनाते थे, उन्हीं के सामने की घटना है । कोई एक गणित का प्रोफेसर वहीं किसी धर्मशाला में रहता था, पास में ही दूसरे कमरे में गुरुजी भी थे । गुरुजी ने क्या देखा कि उस बगल के कमरे से कुछ आवाज आ रही है । क्या आवाज आ रही थी कि अरे ! उठो, सवेरा हो गया, क्या मंदिर न चलोगी, हमारे खाने पीने के लिए चाय-नाश्ता का इंतजाम न करोगी क्या ?....इस प्रकार की अनेक आवाजें सुनकर गुरुजी ने मन में विचार किया कि देखो इस कमरे में दूसरा तो कोई नहीं है, सिर्फ अकेला प्रोफेसर है, पर यह बातें किससे कर रहा, चलकर देखना चाहिए । जब गए तो क्या देखा कि अपनी स्त्री का फोटो लिए उस फोटो से बातें कर रहा था । गुरुजी ने उससे पूछा कि भाई ! तुम इस फोटो से क्यों बात कर रहे हो ? तो उसने अपनी सारी कथा सुनायी । बताया कि मेरी स्त्री मर चुकी है, उस पर मुझे बड़ा मोह था । यहाँ तक कि वह स्त्री यदि धूप में मंदिर जावे या बरसात में कहीं बाहर जावे तो मैं स्वयं उसके ऊपर छाता लगाकर उसे पहुंचाने जाया करता था, इतना तीव्र मोह था । वह स्त्री मेरे से यह भी कहा करती थी कि तुम हम से इतना अधिक मोह क्यों करते ? कहीं मैं मर गई तो तुम पागल न हो जावो । आखिर वही हुआ । उस स्त्री के पीछे मेरी वृत्तियां पागलों जैसे हो गई । तो यहाँ यह जानें कि ये जो बाह्य पदार्थ दिख रहे वे जानने वाले नहीं । जो जानने वाले हैं ये दिखने वाले नहीं । ऐसा योगीजन जानते हैं और अपने आत्मा को समझते हैं कि यह मैं ज्ञायकस्वरूप हूँ । इसमें बोलने की कला ही नहीं पड़ी हैं ।

शब्दनिष्पत्ति के विधिविधान के ज्ञाता का मौनव्रत―भैया ! यह जो बोल निकलता है सो आत्मा नहीं बोल रहा । फिर निकलते कैसे हैं ये शब्द? यदि आत्मा न हो तब तो ऐसी वाणी कोई बोल नहीं सकता । फिर कैसे कहा जा रहा कि आत्मा बोलता नहीं? तो भाई ! बात यह है कि पहले आत्मा का स्वरूप समझें कि क्या है? एक ज्ञानमात्र पदार्थ है,आकाश की तरह अमूर्त है । पर हां, ज्ञानस्वभाव को लिए हुए है । तो वह जो ज्ञान―स्वभावी आत्मा है उसके मुख कहां है, उसके दांत कहां हैं? उस सत् को देखो―जो ज्ञानस्वभावी आत्मतत्त्व है उसके जीभ कहां है? वहाँ इसका प्रवर्तन कैसे हो सकता है? यह तो भाव भर करता है भावों के सिवाय अन्य कुछ नहीं कर रहा, पर निमित्तनैमित्तिक योग है ऐसा कि इस जीव ने तो भाव किया, इच्छा की कि मैं ऐसा बोलूं । तो उन शब्दों के निकलने में देर नहीं लगती लगातार एक शब्द के बाद निकलता जा रहा है । तो यह व्याख्याता क्षण-क्षण पर भाव और इच्छा उस-उस प्रकार की बनती रहती है जैसा कि बोला जाता है । तो आत्मा में तो भाव और इच्छा हुए, अब उस इच्छा और ज्ञान का संयोग पाकर आत्मा के प्रदेशों में कंपन हुई । आत्मप्रदेशों के योगपरिस्पंद का निमित्त पाकर एक क्षेत्रावगाह में रहने वाले इस शरीर में वायु चली । वायु भी उसी अनुरूप चली जैसा योग हो गया । योग भी उस अनुरूप हुआ जैसी कि इच्छा की । तो निमित्तनैमित्तिक भावपूर्वक यहाँ वायु चलने लगी और उस वायु के चलने का निमित्त पाकर ओंठ हिलने लगे, जीभ हिलने लगी, दांत नीचे ऊपर आने लगे, कंठ में भी जोर बनने लगा तो इसका निमित्त पाकर शब्द वर्गणायें, भाषा वर्गणायें शब्दरूप परिणमने लगी । जैसे हारमोनियम में जो स्वर उठाया वहाँ की वायु से वह पीतल का तार टकराकर उस प्रकार की आवाज देता है ऐसे ही ये ओंठ, जिह्वा, तालू ये लगकर अलग होकर उस प्रकार के शब्द को उत्पन्न करते हैं और इसी कारण इन सब अक्षरों के स्थान नियत हैं । क ख ग घ कोई बोलेगा तो कंठस्थान की प्रधानता से बोल पायगा । च छ ज झ कोई बोलेगा तो तालू में जीभ का स्पर्श करके ही कोई बोल पायेगा । ट ठ ड ढ बोलेगा तो जीभ को मूर्धा के याने ऊपर के दांत में ऊपर के मांस पर जीभ को ठोकर देकर ही बोल पायगा । कोई त थ द ध बोलेगा तो दांतों में जीभ की ठोकर लगाकर ही बोल पायेगा । कोई प फ ब भ बोलेगा तो ओंठ को ओंठ में चिपका कर ही बोल पायेगा । फिर इसके भीतर और भी योग हैं । जैसे प बोला तो उसमें अल्प प्राण है । उसमें फोर्स नहीं है, पर फ बोलेंगे तो वह महाप्राण है, उसमें गर्म वायु का फोर्स साथ में रहता है, और इसी बात को इंगलिश भाषा में पीएच=फ मान करके बताया है कि पी में एच की हवा और आये, डंडा लगे तो फ बन पायेगा, ऐसे ही जितना इन अक्षरों में अंतर है वह सब अक्षरों में कोई न कोई निमित्त के भेद से हैं । तो यह मैं जीव बोलता नहीं हूँ, मैं भाव और इच्छा करता हूँ । उसका निमित्त पाकर इस प्रकार की परंपरा निमित्त में ये शब्द मुद्रायें बन जाती हैं । मैं कैसे बोलूं ? मैं स्वयं तो हूँ एक ज्ञायकमात्र और जो कुछ दिखता है वह सब है अचेतन, और मुझमें बोल है नहीं तो अब मेरा किससे बोलना बने ? ऐसा योगियों के मनन रहता है तो वे अधिक समय मौनपूर्वक रहकर अपने आत्मा के सहज स्वभाव की आराधना किया करते हैं ।


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