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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 50

From जैनकोष



चरणं हवइ सधम्मो धम्मो सो हवइ अप्पसमभावो ।

सो रागरोसरहिओ जीवस्स अणण्णपरिणामो ।।50।।

चारित्र की स्वधर्ममरूपता―चारित्र आत्मा का धर्म है, आत्मा का स्वरूप जानकर जैसा स्वरूप है ऐसा ही रहना उसका नाम चारित्र है । आत्मा का स्वरूप क्या है ? चेतन, जानना-देखना, ज्ञान-दर्शन । तो ऐसा ही रहना मायने सबका ज्ञातादृष्टा रहना, रागद्वेष, इष्ट-अनिष्ट के विकल्प न होना, ऐसी आत्मा की जाननहार स्थिति को चारित्र कहते हैं । ऐसा चारित्रपालन सबका स्वाधीन और सुगम है । बाह्य पदार्थों की कमायी में तो संदेह है, श्रम है, अनेकों की चापलूसी करनी पड़ती है, ग्राहकों से निपटना पड़ता है, अफसरों की पराधीनता है, इसमें तो बड़ा कष्ट है और आत्मा अपने भीतर अपने स्वरूप को देखें और इष्ट-अनिष्ट विकल्पों को छोड़े, खाली जाननहार रहे तो उसमें कौनसी पराधीनता है? दूसरा कौन रोकता है कि तुम अपने में मत रमो । तुलना करके देख लो, आत्मा का चारित्र पालने में कुछ भी खेद नहीं, कष्ट नहीं, दो पैसे खर्च करने की भी जरूरत नहीं । किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता ही नहीं, केवल अपनी दृष्टि भीतर की और अपने को ज्ञातादृष्टा देखा । इष्ट-अनिष्ट विकल्प न करें वह चारित्र है,कितना सुगम है, देखो कोई बहुत बड़ा बलिदान किए बिना ऊ̐चा काम नहीं बनता । तो अपने ही भाव में मोह का लगाव रखना एक व्यर्थ की बात है । त्याग किए बिना सदा के लिए संकटों से छूटने का काम न बन पायेगा । विषयकषाय इच्छा आदि विकारों का परिहार करके स्वच्छ स्वरूप की दृष्टि करें । भैया ! अब यह अपने पसंद की बात है कि संसार के जन्म-मरण के संकटों से सदा के लिए छूटने का आपका निर्णय है या एक इस भव में राग करके, प्रेम करके, मोह करके मिल-जुल करके और इंद्रियविषयों को खूब भोग करके, खूब खा-पीकर लोगों में अपना नाम फैला करके जिंदगी बिताना है? इन दो में क्या निर्णय करते हो, उसके आधार में आगे गाड़ी चलेगी । अपना भीतरी निर्णय तो बनाओ ।

परिवारादिव्यामोह से व्यामोही का दुर्गमन―दूसरों के जो बड़े-बड़े परिवार हैं, कुटुंबीजन हैं, धन वैभव आदिक हैं उनमें क्यों नहीं आप लगाव रखते? और चाहे अपने घर में कानी लड़की हो, टेढ़ा लड़का हो, कुपूत हो, कुरूप हो, कैसी ही हो, उसके प्रति बड़ा मोह होता और दूसरों के कुटुंब जिनमें बड़े सुंदर लोग हैं, सभ्य हैं, पढ़े-लिखे हैं उनमें क्यों नहीं लगाव होता? खुद के घर के जीव भी उतने ही भिन्न हैं जितने कि दूसरों के घर के । और फिर अगर आपके हैं आपके घर के लोग तो उन्हें फिर अपने ही घर में सदा रखो, क्यों उन्हें मरने देते? या आप स्वयं बने रहें सदा अपने घर में, क्यों यहाँ से मरकर कहीं जाते? अरे ! यहाँ आपका कुछ नहीं है, जैसे जगत् के अन्य सब जीव भिन्न हैं वैसे ही आपके घर में आये हुए जीव भी पूरे भिन्न हैं, कुछ भी अंतर नहीं है, वस्तुस्वरूप की दृष्टि से देख लो, आपके घर के लोग आपके कुछ नहीं लगते, मगर आपका तन, मन, धन, वचन सब कुछ उनके ऊपर ही न्योछावर हो रहा है । यहाँ तक कि आपका लड़का यदि कुछ अन्याय करे तो भी आप अपने लड़के का ही पक्ष लेंगे । कितना तीव्र व्यामोह है, आखिर उसका फल क्या होता कि कष्ट भोगना पड़ता । अनेकों दृष्टांत ऐसे मिलते हैं कि अपने लड़के के व्यामोह में बड़े-बड़े राजावों ने राज्य छोड़ दिया पर लड़कों का व्यामोह न छोड़ सके । कितना तीव्र व्यामोह लगा है जीवों के, और व्यर्थ का व्यामोह । इस व्यामोह से आत्मा को लाभ क्या मिलता है सो तो बताओ । आत्मलाभ की दृष्टि से देखें तो खुद के परिवार के लोगों से अच्छे तो गैर लोग हैं क्योंकि उनके प्रति कोई राग नहीं, मोह नहीं, विकल्प नहीं, आकुलता नहीं, क्षोभ नहीं । परिजनों के प्रति तो रातदिन व्याकुलता, विह्वलता रहती है । लोग तो यह सोचते हैं कि हम बड़े चतुर हैं, हमने घर को ऐसा बना रखा है कि घर के लोग हमारी आज्ञा के खिलाफ नहीं जाते, उन पर हमारा शासन है, और लड़के लोग हमको बड़ा आदर देते हैं और हम उनको कष्ट नहीं होने देते हैं, हमारी व्यवस्था बहुत बढ़िया है, हम बड़े महान हैं, बड़े चतुर हैं, पर भीतर में देखो हो क्या रहा है? दुर्गति में जाने की तैयारी चल रही है । यह ही बात यहाँ घर में रहकर की जा रही है ।

निर्लेप रहकर कर्तव्य करने में सफलता की सिद्धि―निर्लेप होकर, अनासक्त होकर घर में रहने की जरूरत है । चूंकि घर-गृहस्थी के बीच रह रहे हैं सो मेल-मिलाप एक कर्तव्य है ऐसा जानकर किया जाता होता तब तो खतरा न था, पर उनमें लिप्त होकर जो कर्तव्य किए जा रहे हैं उनसे इस जीव को खतरा हैं । कभी धार्मिक कार्य करने की भी भावना बनती है और कुछ धन वैभव का त्याग करने की भी बात मन में आती है तो वहाँ लोगों की दृष्टि रहती है अपने यश प्रतिष्ठा की । लोग जान जायें कि अमुक ने इतना बड़ा नाम किया, इतने धन का दान किया । एक नामवरी के लिए कुछ त्याग भी किया तो वह भी एक प्रकार का परिग्रह है न कि त्याग । उससे तो उसका पुण्य भी क्षीण हो गया, मोक्षमार्ग भी रुक गया । त्याग के फल में जो चाहिए था सो इसी वक्त चाह लिया, आगे के लिए अब उससे क्या आशा । तो कभी धर्ममार्ग में भी चलता मोही गृहस्थ तो कुछ धन खर्च करके भी पुण्य का अर्जन नहीं कर पाता, अपने शुभ भाव नहीं बना पाता । जैसा लगाव घर में, कुटुंब में है वैसा ही वहाँ भी है, इस जीव की मोह की विचित्रता तो देखिये कहीं चैन नहीं । चैन कैसे मिले? जब आत्मा का परिचय हो, आत्मा की सुध हो, ज्ञानमार्ग में आये तब इसको शांति मिलेगी । जिसको ज्ञान पाने की रुचि है, ज्ञानमार्ग से अपना महत्त्व जाना है, ज्ञान के विकास से ही हमारा मोक्ष होगा ऐसा जिसके निर्णय बना है उसके तन, मन, धन, वचन, प्राण सब ज्ञान के लिए चलेंगे ꠰ जिनका मन केवल इस देह में है और इस देह की फोटो छपे, इस देह का जो नाम धरा हुआ है वह नाम सब जगह लिखा जाये, लोक में सब जगह जाहिर हो जाये कि यह कितने महान हैं, ऐसी जिसने चाह की तो बताओ उसने भौतिकता की चाह की या आध्यात्मिकता की? भौतिकता की । उस भौतिकता के लिए ही उसका तन, मन, धन, वचन सब कुछ लगेगा । इस व्यामोही की दशा तो देखिये―ज्ञानप्रकाश कहां मिलता है? ज्ञानप्रकाश मिले बिना धर्म रच नहीं होता । ज्ञान की दिशा में हमें बढ़ना चाहिए और अपना यह रहा सहा जीवन सफल करना चाहिए । उसके लिए अगर कुछ त्याग करना पड़े, कुछ समय को सत्संग में रहना पड़े या जो भी करना पड़े, सब करने के लिए उमंग रखिये और अपना यह निर्णय बनाइये कि किसी भी प्रकार से मेरे को सत्य ज्ञान मिले । सत्य ज्ञान वह है जहाँ इष्ट-अनिष्ट भाव नहीं जगता, रागद्वेष परिणाम नहीं जगता । अब देखिये, परिग्रह का संचय करना कितना कठिन है और आत्मस्वरूप में रम जाना कितना सुगम है । दोनों बातों को सामने रक्खें, ऐसा सबको मालूम है कि परिग्रह के छोड़ने में कितनी कठिनाइयां भोगी जाती हैं । यद्यपि परिग्रह भी विशेष श्रम करने से नहीं जुड़ता, पूर्वकृत पुण्य के उदय में समागम ऐसा होता है और वहाँ थोड़ा बहुत प्रयास करना होता है मगर परिग्रह-संचय की धुन वाले लोग अपने जीवन के सारे क्षण कष्टों में बिता रहे हैं, और एक यह चारित्र मायने आत्मा के स्वरूप का ज्ञान करना यह ही हितकर है, यह ही मेरा सहजस्वरूप है, जो है सो ही रहना चाहिए, ऐसे भावपूर्वक इस ही स्वरूप में दृष्टि रहें, इस काम के लिए कौन बाधा देता है? किसी में सामर्थ्य नहीं जो इसको ज्ञानमार्ग में चिगा सके । यह जीव खुद ही कायर होकर, निर्बल होकर, मोही बनकर, ज्ञानस्वरूप से भ्रष्ट होकर कष्ट में पड़ता है, दूसरा कोई इसकी कष्ट में डालने वाला नहीं है।

आत्मज्ञान के बिना व तत्त्वज्ञान की प्रभावना के बिना किये गये अन्य कार्यों में धर्मभावना की मान्यता करने का विभ्रम―भैया ! जैनधर्म की जय बोलें और उसकी प्रभावना में बहुत-बहुत कष्ट करें, बहुत कुछ धन भी खर्च करें, सारे दिन भारी श्रम भी करें, सब कुछ करें और प्रभावना जरा भी नहीं हुई, इसको भी तो देखिये ꠰ प्रभावना कहते किसे हैं? तत्त्वज्ञान की प्रभावना करने को प्रभावना कहते हैं । क्या इसका नाम प्रभावना है कि लोग जान जायें कि इनका जुलूस बहुत तेज निकला, बैंड बाजे थे, लोगबाग पसीने से बड़े लथपथ हो रहे थे, ऐसा लोग देख लें इसके मायने प्रभावना है या जो जैनशासन में सत्य वस्तु का स्वरूप कहा है और उस पर चलने से ही हमारे संकट दूर हो सकते हैं, यह बात लोग जान जायें इसमें जैनधर्म की प्रभावना है? इन दोनों में तुलना तो करो । जलूस बड़ा भारी निकला, लोग बड़े अच्छे धनिक है, यह लोगों ने जाना तो बताओ यह जैनधर्म की प्रभावना है या भौतिकवाद की प्रभावना है? और आपने व्याख्याता बुलाये, स्वयं भी कुछ लोगों ने बोला और सुनने वाले लोगों के चित्त में यह बात आयी कि यह संसार का सारा समागम धोखा है, यह मोह लगाव नरकादिक गतियों में जाने की तैयारी है, इन सबमें कुछ तत्त्व नहीं रखा है । प्रभु ने, जिनेंद्रदेव ने जो आत्मा का स्वरूप बताया, अपनी बात बतायी कि यह मैं सबसे निराला केवल ज्ञानमात्र आत्मतत्त्व हूँ, इसका किसी भी जीव से, किसी भी परमाणु से जरा भी संबंध नहीं है, जो कि साफ भी दिख रहा, मरने पर कोई साथ नहीं जाता । इससे इस बाह्य व्यामोह को हटाना और आत्मा के स्वरूप में दृष्टि देना, यह शांति का मार्ग है । यह बात यदि लोगों के चित्त में घर कर गई तो वह हुई जैनधर्म की प्रभावना । अज्ञान-अंधकार से हटकर ज्ञानमार्ग को जता देना इसे आचार्यों ने प्रभावना कहा है । कार्य सब करते हैं पर आत्मपरिचयन के बिना वे सब कार्य ऐसे हैं जैसे कि सिनेमा के पर्दे पर आने वाले चित्रण ꠰ जान वहाँ जरा भी नहीं और कार्य सब होते दिख रहे, यहाँ गए वहाँ गए, यहाँ दौड़े वहाँ भागे, यह किया वह किया, कितने ही काम वहाँ दिख रहे हैं उस सिनेमा के पर्दे पर, पर वे सब जानरहित हैं, ऐसे ही धर्म के कार्य बहुत दिख रहे हैं पर आत्मपरिचयन नहीं है तो सब क्रिया में जानरहित हैं । वहाँ धर्ममार्ग नहीं मिल पाता ।

आत्मसमभाव की चारित्ररूपता―धर्मपालन कितना सुगम है, स्वाधीन है यह इस गाथा में चारित्र का स्वरूप कह कर जता रहे हैं । चारित्र है सो आत्मा का धर्म है और वह धर्म आत्मसमभावरूप है । सब जीव अपने समान नजर आने लगें, ऐसी ज्ञान-ज्योति जहाँ मिले वहाँ चारित्र होता है । सब जीव अपने समान कैसे ज्ञान में आयें? स्वरूपदृष्टि के, जहाँ भगवान भी अपने समान दिखने लगें, भगवान के समान खुद दिखने लगें, भगवान और खुद के समान जगत् के समस्त जीव दिखने लगें, ऐसी दृष्टि जब मिलेगी तब चारित्र बनेगा । कैसा दिखने लगे? बाहरी क्रिया से नहीं, परिणति से नहीं, पर्याय से नहीं, परिणमन से नहीं किंतु स्वरूप से, स्वरूप जैसा प्रभु का है वैसा ही मेरा है । भीतर के विकल्प बनावें, बाहर के विकल्प बनावें तो इसमें जरा भी बड़प्पन नहीं है । लौकिक बड़प्पन में केवल घमंड ही हाथ आता है, पर अपने आत्मीय गुणों की दृष्टि में आत्मलीनता रूप बड़प्पन आता है । सब जीव मेरे समान हैं, दया का आधार यह भाव है, चलते जा रहे, कहीं चींटी न मर जाये, क्यों न मरे ऐसा कोई प्रश्न कर सकता? मर जाये तो मर जाये, फिर पैदा हो लेगी, कौड़ी मरेगी तो फिर कौड़ी ही तो बनेगी, इसमें उसका क्या नुक्सान हो गया? भाई ! दया का आधार आत्मसम्मान है । यह कौड़ी का जीव मेरे स्वरूप के समान है, पर कर्म के वश होकर यह कौड़ी का जीव इस योनि में आया है जहाँ तीन इंद्रियां मिलीं, इतना सा ज्ञान मिला, तो ऐसा केवल ज्ञानशक्ति से संपन्न यह प्रभु आत्मा कर्मों के वश होकर आज ऐसी निम्न पर्याय में आया है, परस्वरूप तो इसका वही है कि जो मेरा है और प्रभु का है । इस प्राणी के दबने की, दबकर मरने की घटना न बने, नहीं तो यह संक्लेश-सहित मरण करेगा और इस भव से नीचा भव पायेगा, इस भगवान आत्मा का और भी अनर्थ होगा, ऐसी दया है साधुवों की, जिस दृष्टि के कारण वे जीवों की हिंसा नहीं करते, और जिनको आत्म-समभाव के आधार का परिचय नहीं है ऐसे लोग भी दया करते हैं मगर इस भाव से करते कि जीवों की दया करें तो स्वर्ग मिलेगा, जीवों की हिंसा न करें तो पुण्यबंध होगा, वैभव मिलेगा, संसार में सुख-साता मिलेगी । अज्ञानियों का यह आधार है जीवदया करने का और ज्ञानियों का आधार है जीवदया का आत्म-समभाव ।

ज्ञानियों का सर्वत्र उपेक्षासंयमरूप प्रवर्तन―ज्ञानियों का जीवन जीवदया करते रहने के लिए ही नहीं है किंतु उपेक्षासंयम द्वारा सबका ख्याल छोड़कर आत्मा में रमने के लिए है । अब चूंकि यह शरीर साथ लगा है इसलिए विहार और आहार करना जरूरी पड़ जाता, सो जब आहार विहार करना है तो वहाँ जीवदया की प्रवृत्ति रखकर करना है कि मेरे द्वारा किसी भगवान आत्मा की दुर्गति न हो । आहार-विहार करना एक अपने ज्ञान को पवित्र रखने के लिए है । ज्ञानी के आहार-विहार की बात कह रहे । जैसे सरसों के तेल का दीपक जिसमें एक लंबी बत्ती डाल दी जाती है और दीपक के किनारे पर से उजेला चलता है तो उजेला बना रहे, इसके लिए लोग क्या करते हैं कि वे दो काम करते हैं, एक तो उस दीपक में तेल डालना और दूसरे उस बत्ती को आगे करते जाना । जब वह बत्ती थोड़ी जल गई तो उसका प्रकाश बिल्कुल कम हो जाता और यह बुझ भी जाती, तो जैसे वहाँ दो काम करने होते, एक तो दीपक में तेल डालना और दूसरे बत्ती आगे बढ़ाते जाना, ऐसे ही ज्ञानी संत अपने ज्ञानप्रकाश को पवित्र सुरक्षित बनाये रखने के लिए पेट में तेल डालते हैं अर्थात् आहार डालते हैं और शरीर को उकसाते हैं अर्थात् विहार करते हैं । एक स्थान पर रहना ज्ञान को मलिन करने का साधन हो सकता है इसलिए विहार करते हैं, और आहार किए बिना शरीर में बल न रहेगा जिससे संयम न सध पायेगा, इसलिए आहार करते हैं । इसका भी प्रयोजन ज्ञान को पवित्र सुरक्षित बनाये रखना है, कैसा तत्काल का लाभ है, और बाहरी बातों में पड़ने से तो बड़ी पराधीनता है, कहो काम बने कहो न बने, बड़ी प्रतीक्षा करनी होती, बड़ा परिश्रम करना होता पर आत्मचारित्र के काम में, भीतर दृष्टि दें और भीतर ऐसा ही लखते रहें तो समझो कि आपने अपना धर्म पा लिया । उसको सदा निभाने के लिए गृहस्थी का त्याग करने की, परिग्रह का त्याग करने की आवश्यकता है, मगर करना पड़ता है खुद को अपने में अपनी ज्ञानदृष्टि का ही काम, और यह चारित्र है । सो यह चारित्र रागद्वेष-रहित जीव का अभिन्न परिणाम है । रागद्वेष न होकर जो ज्ञान का परिणाम है सो चारित्र है ।

कोई किसी का कुछ नहीं यह तथ्य जानकर परमात्मतत्त्वोपासना में उपयुक्त होने का प्रतिबोध―लोग यह सोचते हैं कि जहाँ मान लो 100 राग कर रहे वहाँ एक और सही । यों उस राग को बढ़ाने की बात तो सोचेंगे, पर उसके दूर करने की बात न सोचेंगे । भला बताओ राग कर करके मरण करेंगे तो उसका फल दूसरा कौन भोगेगा? खुद को ही भोगना होगा, कोई किसी का साथ न देगा, मददगार न होगा । एक घटना सुनी है कि कोई कषायी किसी बाजार से गुजरता हुवा एक बकरा लिए जा रहा था, रास्ते में किसी सेठ की दूकान पर वह बकरा चढ़ गया और उसे सेठ के चारों ओर घूमने लगा, सेठ के शरीर से चिपक-चिपककर बड़ा प्यार दिखाने लगा, अब वह नीचे उतरे ही नहीं । कषायी बड़ा हैरान हुआ । उस कषायी ने कहा―सेठजी हमारा बकरा जल्दी दूकान से नीचे करो, नहीं तो 1000) इस बकरे की कीमत दे दो, हम इसे तुम्हारी ही दूकान में छोड़कर चले जायेंगे । अब वह कैसे 1000) दे दे, सो उसने बड़ी तेजी से धक्का मारकर दुकान से नीचे गिरा दिया, आखिर वह कषायी उसे ले गया कषायीखाने और वहाँ जो करना था सो किया ꠰ इधर वह सेठ जो कि बड़ा धार्मिक पुरुष था वह मंदिर पहुंचा, वहाँ किसी मुनि से सारा वृतांत बताया, तो वह मुनि थे अवधिज्ञानी । उन्होंने अपने अवधिज्ञान से विचार कर बताया कि वह बकरा तेरे पिता का जीव था, तुझसे वह प्यार कर रहा था । तो सेठ को अपने पिता के जीव को धक्का देकर गिराने का भारी पश्चाताप हुआ, और सोचा कि मैं अभी-अभी जाकर 1000) उसे देकर वह बकरा छुड़ा लूंगा । कम-से-कम मेरे पिता की इस कषायी के द्वारा हत्या तो न हो पायेगी । यह विचार कर 1000) लेकर सेठ पहुंचा उस कषायी के पास तक, मगर वहाँ तो वह बकरा मार दिया गया था । तो बात यहाँ यह देखो कि बाप का जीव बकरे के रूप में जब उस सेठ से चिपक रहा था तब तो उसके ऊपर करुणा नहीं जगी और जब उसकी हत्या कर दी गई तब उसके प्रति करुणा जग रही, तो उस करुणा से अब होगा क्या? तो यहाँ का सारा समागम बेकार है, कौन किसका है? मोह करने का फल दुर्गति है, अब कोई कहे कि मोह का छूटना तो बड़ा कठिन है, छूटता नहीं, तो भाई ! ठीक है, खूब करते जावो मोह मगर इसका फल दुर्गतियों में परिभ्रमण करना है । यदि इन दुर्गतियों से बचना है तो स्वरूपदृष्टि करो, अपने आत्मवैभव को लखकर प्रसन्न रहो, सो यह रागद्वेषरहित परिणाम आत्मा का चारित्र है, इस चारित्र से ही मोक्षमार्ग चलता है और निकट में भी कभी आगे चलकर मोक्ष की प्राप्ति होती है ।


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