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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 53

From जैनकोष



उग्गतवेणण्णाणी जं कम्मं खवदि भवहि वहुएहिं ।

त णाणी तिहि गुत्तो खवेइ अंतोमुहूत्तेण ꠰꠰53।।

ज्ञानी के कोटिभवांतरबद्ध कर्मों का अंतर्मुहूर्त में नाश हो जाने का कारण―ज्ञानी पुरुष दिगंबर भेष रखकर भी और बड़े ऊ̐चे-ऊ̐चे तपश्चरण करके भी लाखों-करोड़ों भवों तक मानो तपश्चरण करे, ऐसा योगी मिलता नहीं किसी को, पर एक अनुमान-अलंकार से ज्ञानी की विशेषता बतला रहे, करोड़ों जन्म तप तपने पर भी अज्ञानी पुरुष के जितने कर्म झड़ पाते हैं उतने कर्म तो ज्ञानी जीव के क्षणमात्र में आत्मदृष्टि और गुप्ति के बल से सहज ही झड़ जाते हैं । मोटर चलाने वाला कुशल ड्राइवर चलाने का पेंच है उसी को मरोड़ता है, मोटर चल जाती है और उसके विषय में अनभिज्ञ है, अंजान है तो वह कभी कोई पेंच मरोड़ेगा कभी कोई, यों मोटर खराब भी हो जायेगी । मानो चल भी गई तो वह या तो किसी गड्ढे में पटक देगा या एक्सीडेंट कर देगा । तो ज्ञानी और अज्ञानी में सर्वत्र इसी प्रकार का फर्क मिलेगा । ज्ञानी पुरुष जानता है कि कर्मों के दूर करने का तंत्र यह है, क्या है? अपने आपको अविकार ज्ञानस्वभावमात्र निरखना, स्वभावदृष्टि करना और अपने आप अपनी सत्ता से अपने में जो भाव-स्वभाव हो उसका ध्यान करना इस प्रकार ज्ञानी ने अविकार ज्ञानस्वभावमात्र अपने को माना और उसरूप आचरण कर रहा, उसका प्रताप है कि भव-भव के बाँधे हुए कर्म स्वयं ही झड़ जाते हैं । कोई यह उपाय तो जाने नहीं और व्रत, तप, उपवास, 10-10, 15-15 दिन तक का उपवास, बड़ी कठिन-कठिन साधनायें, ये सब करते हुए भी, ये कर्मक्षय के पेंच नहीं हैं जो इससे कर्मक्षय पा लें, मगर जैसे मोटर में केवल एक चलाने का ही पेंच हो तो बात तो नहीं बनती, अनेकों उसमें यंत्र होते, जिनके बीच सुरक्षित रहते हुए उस एक पेंच से मोटर चलती है । तो ऐसे ही व्यवहारधर्म शील, तप, व्रत आदिक से अपने आपको सुरक्षित रखते हुए एक स्वभाव-दृष्टि के पेंच से अपने आपको मोक्षमार्ग में चलाना है । कहीं भी जावो, किसी भी पद में रहो, श्रावक हो तो, मुनि हो तो, गरीब हो तो, धनिक हो तो, इज्जतवान हो तो, जिसकी इज्जत न हो ऐसा हो तो, सबके लिए मोक्षमार्ग का एक ही उपाय है―आत्मस्वभाव में आत्मत्व की दृष्टि रहना ।

धर्मपालन के विषय में आत्मनिरीक्षण का अनुरोध―अपने ज्ञानस्वरूप को जानना-मानना कि मैं यह ही हूँ, और ऐसे ही स्वरूप को देखकर केवल ज्ञातादृष्टा रहना यह ही एक तंत्र है जिससे कर्मों का विध्वंस होता है, सो इसके लिए क्या कुछ रुचि है? अगर इस ज्ञानसाधना या इस ज्ञानप्रसार के लिए रुचि नहीं जगती तो जैसे रुचि जगी हो वैसा फल मिलेगा । अगर ज्ञान में रुचि जगी हो तो केवलज्ञान मिलेगा, अगर ईंट, भींट, सोना, चांदी आदिक जड़ पदार्थों में रुचि जगी हो तो जड़ता मिलेगी, ज्ञानहीनता मिलेगी, दुर्गतिगमन मिलेगा । सो यह तो बड़ा चेतने का भव है, परिवार के लिए तो आपका सारा त्याग चलता है और सब हिसाब बनाते हैं―तीन हजार रुपया महीने का खर्च, चार हजार रुपया महीने का खर्च, और कहते कि इससे कम में गुजारा ही नहीं होता । मगर अपने आपकी दया के लिए, अपने को ज्ञानमार्ग में स्थिर रखने के लिए हम आपने तन लगाया, मन भी लगाया, धन भी लगाया क्या? जो इस तत्त्वज्ञान का रुचिया होगा वह वर्ष में दो-एक बार बड़ी-बड़ी दूर भी जायेगा, कितना ही खर्च हो जाये पर बड़ी उमंग से वह तत्त्वज्ञान की बात सीखकर संतोष मानता है, कोई ज्ञानी-ध्यानीजन मिलें तो उनकी सेवा-शुश्रुषा करने में किसी का यह विचार जगे कि यह तो सब लोगों का काम हैं, हम अकेले क्यों इनकी सेवा-शुश्रुषा के लिए खर्च करें ? साधर्मी योगी मुनिजनों के प्रति तो इस प्रकार विचारें और अपने घर में बसने वाले दो-चार प्राणियों के प्रति अपना तन, मन, धन, वचन सर्वस्व अर्पित करने के लिए तत्पर रहें तो बताओ यह कहां का न्याय है? यह तो एक विकट मोह की, अज्ञानता की बात है, हाँं जितना अनुराग अपने परिजनों के प्रति किया जाता उतना अगर साधर्मी ज्ञानी साधुसंतों के प्रति किया जाये तब तो समझा जाये कि इन्हें ज्ञान में अनुराग है, नहीं तो बाहरी और धर्म करने के अनेक उद्देश्य होते हैं । उनमें प्रथम उद्देश्य होता है नामवरी का । ऐसा-ऐसा त्याग करके नाम होता है, इस प्रकार का भाव रखकर कोई धर्म करे तो समझो उसे आगे कुछ लाभ नहीं मिलने का, क्योंकि तुरंत ही अपना नाम लिखाने आदि क्रिया कराके उसका फल पा लिया । किसी बात की चाह रखकर अगर कोई किसी चीज का त्याग करे तो वह वास्तविक त्याग नहीं है, हाँं ज्ञान और ज्ञानियों के प्रति वात्सल्य रखकर जो कुछ त्याग किया जाता है वह है वास्तविक त्याग । सो ज्ञान की धुन बनावें और ज्ञान के अर्जन के लिए प्राण भी अर्पण करने पड़े तो भी सहर्ष स्वीकार करें । ऐसा ज्ञानस्वभाव का ध्यान करने वाला पुरुष योगी कहलाता है ।


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