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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 58

From जैनकोष



अच्चेयणं पि चेदा जो मण्णइ सो हवेइ अण्णाणी ।

सो पुण णाणी मणिओ जो मण्णइ चेयणे चेदा ꠰꠰58꠰।

अचेतन को चेतन व चेतन को ज्ञानरहित मानने वालों की अज्ञानता―जो अचेतन को भी आत्मा मानता है वह अज्ञानी है और जो चेतन को आत्मा मानता है वह ज्ञानी है । जैसे शरीर को माने कि यह मैं हूँ तो ऐसा मानने वाला अज्ञानी है ꠰ दार्शनिक विधि में चलें तो चार भूतों के मिलने से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के मेल से चेतन जीव बन जाता है, ऐसा जो मानता है वह अज्ञानी है, और भी दार्शनिक दृष्टि से चलें तो जो आत्मा को चेतन तो मानता है, पर ज्ञानवाला नहीं मानता वह भी अज्ञानी है । तीन तरह की बात कही गई हैं―(1) पहली बात जो देह को माने कि यह मैं हूँ, वह अज्ञानी, ऐसे जो दुनियां में प्राय: सभी लोग पड़े हुए हैं, और जो चार भूतों से जीव की उत्पत्ति मानते हैं वे हैं चार्वाक । जो जीव को अलग नहीं मानते, किंतु पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु इनका संयोग हो गया तो उससे जीव निकल आते हैं । तीसरे लोग हैं सांख्य, जो आत्मा को तो कहते कि आत्मा चेतन है, पर उसका स्वरूप ज्ञान नहीं है, जानन नहीं है । ज्ञानस्वरूप है प्रधानता का, अजीव का, उस अजीव पदार्थ से परिणति से ज्ञान निकलता है, और उस ज्ञान का आत्मा में संबंध जुड़ता है तब आत्मा जानने वाला बनता है, तो इसने भी आत्मा को अचेतन मान लिया मायने ज्ञानशून्य मान लिया । तो ये तीनों ही अज्ञानमय हैं, अब इनका परिहार देखिये ꠰ जो लोग मानते हैं कि यह देह जीव है, यह देह मैं हूँ तो वह मिथ्या है या नहीं? प्रकट दिखता कि जीव इस शरीर को छोड़कर निकल जाता है, देह यहीं पड़ा रहता है । अगर देह ही जीव होता तो जीव के निकलते ही इस जीव के साथ देह भी उड़ जाता, मगर ऐसा तो नहीं होता, देह यहीं पड़ा रह जाता, जीव निकल जाता, तो इससे प्रकट सिद्ध हो जाता कि जीव न्यारा है और देह न्यारा है, लक्षण से भी ये जीव और देह दोनों अलग-अलग हैं । शरीर का लक्षण है पुद्गल रूप, रस, गंध, स्पर्श का पिंड और आत्मा का लक्षण है ज्ञानदर्शन । तो जो देह जीव को एक गिने बहिरात्म तत्त्व मुधा है ।

भूतसमुदाय को चेतन मानने वालों की अज्ञानता―अब दूसरी चर्चा देखिये―जो लोग मानते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु इन 4 के संयोग होने से जीव पैदा हो जाता जैसे कि पानी गर्मी आदिक के संयोग होने से बिजली पैदा हो जाती । तो उनकी भी बात देखिये कि यदि इन चार चीजों के मिलने से जीव पैदा होने लगें, जीव क्या―घोड़ा, बैल, हाथी, शेर, सूकर, गधा, कीड़ा-मकोड़ा आदिक तो रसोईघर में तो आफत आ जायेगी । कैसे ? कि मानो मिट्टी की हांडी में कोई खिचड़ी पका रहा हो तो उस समय देखो मिट्टी (पृथ्वी) भी है, जल तो उस हांडी में भरा ही है, अग्नि भी नीचे से खूब तेज जल रही और हवा भी वहाँ खूब भरी है तभी तो उसके ऊपर रखा हुआ ढक्कन उछला-उछला फिर रहा तो अब उस रसोईघर में चारों चीजें इकट्ठी हो गई ना? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, फिर तो वहाँ पर हाथी, घोड़ा, शेर, चीता, बाघ, आदि अनेकों जानवर उत्पन्न हो जाने चाहिये, क्योंकि तुमने इन चारों चीजों के मिलने से जीव की उत्पत्ति मान ली, पर ऐसा तो नहीं देखा जाता । तो फिर तुम्हारी यह बात ठीक न रही कि इन चार चीजों के संयोग से जीव उत्पन्न होता है । अरे ! इनके संयोग से जीव उत्पन्न नहीं होता, जीव स्वतंत्र सत् वाला पदार्थ है और ये पृथ्वी, जल आदिक ये सब एक पुद्गल में ही शामिल हैं । तीसरी चर्चा थी कि आत्मा तो माना और उसको चेतन भी कह रहे, पर ज्ञान नहीं है उसमें ज्ञान के संबंध से आत्मा जानता है, पर ज्ञानस्वरूप नहीं है जीव का । उसने भी चेतन आत्मा को चेतन मान लिया, सो भला सोचो कि ज्ञान न हो जिसका स्वरूप वह आत्मा कैसा ? ज्ञानस्वरूपरहित भी कोई आत्मा होता है क्या? सो यों जो अचेतन को चेतन माने, चेतयिता माने, देखने-जानने वाला माने वह अज्ञानी है, और जो चेतन को ही चेतयिता माने वह ज्ञानी है । मैं-मैं तो सभी कहते हैं, पर उस मैं का सही पता नहीं है प्राय: कि मैं किसको कह रहे? उन्होंने तो इस देह को मैं कहा, जो कुछ पर्याय मिली है उसे मैं कहा, पर वह मैं नहीं हूँ, मैं हूँ एक ज्ञानमात्र पदार्थ ।


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