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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 72

From जैनकोष



णिंदाए य पसंसाए दुक्खे य सुहएसु य ।

सत्तूणं चेव बंधूणं चारित्तं समभावदो ꠰꠰72।।

निंदा-प्रशंसा में, दुःख-सुख में, समता के धारण में चारित्र की उपलब्धि―योगी पुरुषों के समता-परिणाम होते हैं और उस समता-परिणाम के कारण इसको चारित्र माना गया है । समता का ही नाम चारित्र है । आत्मा में आत्मा के लीन होने का नाम चारित्र है किन्हीं भी शब्दों में बात कहो, बात एक ही आयगी, याने उस चारित्र में तीन तारीफ हैं ꠰ आत्मा में लीन हो गया, समता भाव आ गया, कषाय की वहाँ उपशांति है । तो जहाँ समताभाव है वहाँ चारित्र है । निंदा और प्रशंसा में समताभाव होना, अब जो मुनि-निंदा की बात सुनकर या अपने आप कुछ कल्पनायें करके अपना अपमान महसूस करता है उसकी तो मिथ्याबुद्धि हो गई । देह में आत्मबुद्धि हो गई, तब वह कल्पनायें करता है कि मेरा अपमान हो गया । अरे ꠰ चैतन्यस्वभाव में आत्मा आत्मतत्त्व को देखने का काम था तब ही तो परमेष्ठी का नाम दिया है । अब परमेष्ठी जैसा भेष धारण कर अगर अपमान-सम्मान महसूस करे तो खुद दुर्गति में जायेगा और ऐसे लोगों के सेवक भी दुर्गति में जायेंगे । यह जैन सिद्धांत का वचन है । तो मुनि का मुख्य गुण है समता । प्रशंसा सुनकर कुप्पा हो गए, भक्तजनों में राग करने लगे, उन्हीं का बड़ा आदर सत्कार करने लगे, बाकी दुनियां के जीवों का कुछ नहीं, बस एक प्रशंसा की बात चाहा तो उनका सत्कार करने की बात बोल रहे, इसमें मुनि की शोभा की बात तो दूर रही, मुनिपद भी नहीं रहता । वे तो समता की मूर्ति हैं, मोक्षमार्ग यों नहीं मिलता । संसार की सारी बातों का परिहार कर दिया और केवल आत्मस्वरूप में आत्मभावना बनी रहे तो वहाँ रहता है मुनिपना । ऐसे ही दु:ख और सुख में जिनको समता है उनके चारित्र है ꠰ सुख क्या और दुःख क्या? इंद्रिय को सुहावे सो सुख और इंद्रिय को न सुहाये सो दुःख । तो इंद्रिय को सुहाये ऐसी स्थिति यदि मुनि पसंद करते तो गृहस्थ में और मुनि में अंतर क्या रहा? इंद्रिय को न सुहाये, ऐसी स्थिति से वह उद्विग्न होता है तो फिर गृहस्थ में और मुनि में क्या अंतर रहा? तो सुख और दुःख में समताभाव हो तो चारित्र कहलायेगा ।

शत्रु-बंधु में समता के धारण में चारित्र की उपलब्धि―शत्रु और बंधु में समताभाव हो तो चारित्र है । अपने परिवार के लोगों को देखकर राग आ जाये, उनको रुपया-पैसा भी लोगों से दिलवाये, उनकी खूब खुशामद भी करवाये तो वहाँं मुनिपना नहीं है । उसके लिए बंधु और शत्रु दोनों ही बराबर हैं, अपनी जन्मभूमि पर बहुत-सी धर्मशालायें, मंदिर, नसिया आदि धर्म के ही स्थान सही, यदि बहुत-सी चीजें तैयार करा दे, बहुत दूर-दूर के लोगों से पैसा मांग-मांगकर तो उसको अपने बंधुजनों से, परिजनों से ममता ही तो कहलायी । नहीं तो वही गांव उसके लिए क्यों प्रधान बना? दुनियां में अनेक गांव हैं । शत्रु से द्वेष नहीं होता मुनि को । जो विरोध करता है, नमस्कार नहीं करता, उलटी बात करता उसके प्रति भी मुनि का द्वेष नहीं होता, अन्यथा मुनिपना क्या? तो जो शत्रु और बंधु में समताभाव रखता है उसका चारित्र माना गया है । शिक्षा तो हम आपको भी लेना चाहिए कि ऐसा वस्तुस्वरूप का विचार करें कि निंदा-प्रशंसा में जहाँ तक हो, समता-भाव बनाने की कोशिश करें । प्रशंसा है सो भी भाषा वर्गणा के परिणमन हैं, पुद्गल के परिणमन हैं, उनसे मेरे में कौन-सी भलाई होती, कौन-सी बुराई होती? तो तत्त्व को जानें और अंत: समताभाव बढ़ायें । सुख-दुःख में ये कर्म के विपाक हैं, मायामयरूप हैं, ये कोई परमार्थ तो हैं नहीं, उसकी उपेक्षा करके अधिक-से-अधिक समय कोशिश अपने आत्मा की भावना में बनायें, यह अपना सबका कर्तव्य है, शत्रु और बंधु में समताभाव लायें । और, अधिक बात नहीं तो इतना तो सोचें कि जो प्रेम होता है, राग होता है वह दो कारणों से होता है, एक तो ममता से और एक जिम्मेदारी से । ममता से राग करने वाला अधिक पापी है, चारित्र से राग करने वाला परिस्थितिवश पाप कर रहा, यह मेरा है ऐसी ममता जगे, मेरा सब कुछ है । इस ममता से जो राग बनता है उसका फल होता है अन्य जीवों से घृणा या अन्य जीवों से उपेक्षा । पर क्या करें? गृहस्थी में रह रहे हैं तो इन जीवों की जिम्मेदारी है और उस चारित्र के कारण राग करना पड़ रहा है तो उसके अन्य जीवों से द्वेष नहीं रहता, घृणा नहीं रहती और अपने बंधुवों पर भी ममता नहीं, पर परिस्थितिवश चारित्र से यह कर्तव्य करना पड़ता है । तो किसी भी स्थिति से सही, अपना यह पुरुषार्थ होना चाहिए कि सर्व पदार्थों में समता परिणाम बनाये रहें ।


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