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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 78

From जैनकोष



जे पावमोहियमई लिंगं घेत्तूण जिणवरिंदाणं ।

पावं कुणंतिपावा ते चत्ता मोक्खमग्गम्मि ꠰꠰78।।

पापमोहितमति दिगंबर मुद्रावेष की पापी जीवों की मोक्षमार्गबहिर्भूतता―जिनकी बुद्धि पाप से मोहित हुई है ऐसे मनुष्य जिनेंद्रदेव का लिंग धारण करके अर्थात् निर्ग्रंथ दिगंबर भेष धारण करके पाप करते हैं वे पापी हैं, मोक्षमार्ग से पतित हैं । जो साधु तो हो गए किंतु चित्त में से विषयवासना नहीं निकली, विषयों में अनुराग बना हुआ है और उन पापों से जिनकी बुद्धि व्यामुग्ध है, पाप क्रिया करके जो पापकर्म का बंध करते हैं ऐसे साधु पापी हैं और मोक्षमार्ग से पतित हैं । इन साधुवों की गति खोटी है और जन्म-मरण की परंपरा इनकी बढ़ती है । साधु परमेष्ठी का जैसा बाह्य भेष धारण करके गृहस्थजनों जैसा भाव रखना एक बड़ा कलंक है और इससे ऐसे तीव्र पाप का बंध होता है कि जिसके कारण भव-भव में इसे यातनायें सहनी पड़ती हैं । अन्य लिंग से किया गया पाप जिनलिंग से नशता हैं याने अन्य भेषों को धारण कर करके जो पापकर्म बांधा वह निर्ग्रंथ दिगंबर भेष धारण करके छूट जाता है, पर यदि कोई दिगंबर भेष धारण करके पाप करे तो उसका पाप वज्रलेप होता है, उसके छूटने का फिर और कोई उपाय नहीं है । इस कारण दिगंबर भेष धारण करके आत्मज्ञान करके सावधान रहने में ही भला है ।


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