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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 83

From जैनकोष



णिच्छयणयस्स एवं अप्पा अप्पम्मि अप्पणे सुरदो ।

सो होदि हु सुचरित्तो जोई सो लहइ णिव्वाणं ।।83।।

आत्मरत सुचरित्र योगियों को निर्वाण का लाभ―निश्चयनय के मत में जो आत्मा अपने आत्मा में अपने आत्मा के लिए लीन होता है वह सम्यक्चारित्रवान कहलाता है और वह निर्वाण को प्राप्त होता है । कौन-सा कार्य है ऐसा जो संसार के संकटों से छुटा दे । बाहर में किसी पदार्थ पर चित्त देना, उपयोग लगाना, ममत्व रखना―यह तो कोई योग्य कार्य नहीं है जिससे संसार संकट छूटे । और यह आत्मा बाहर में किसी के पास नहीं जाता, न किसी में लीन होता, यह अपने अंदर ही कल्पनायें बनाकर अपनी कल्पना में बना रहता है । तो जब यह कुछ करता ही नहीं, अपने आपमें अपनी कल्पना करता है, अपने भावों के सिवाय कुछ कर पाता नहीं तो वहाँ ही यह छांट कीजिए कि कैसे अपने भाव हों कि संसारसंकट कटे? केवल आत्मस्वरूप में ध्यान हो, वह किसलिए? आत्मकल्याण के लिए । होता कहां है? अपने ही आत्मा में । तो जो आत्मा अपने आपमें लीन होता है वह सम्यक्चारित्र है । जो जितना आत्मा की ओर लगा है वह उतना चारित्रवान कहलाता है । जो बाहरी चारित्र हैं उनका भी प्रयोजन यह ही है कि यह आत्मा अपने आपके स्वरूप में रमे । इस कारण बाहरी चारित्र भी चारित्र कहलाते हैं । तो निश्चय से आत्मा केवल अपने भाव भर कर पाता है । भावों के सिवाय और कहीं कुछ नहीं करता । दूकान में हो, जंगल में हो, उपदेश में हो, पूजा में हो, किसी भी जगह हो, आत्मा अपने भाव ही बना रहा, दूसरे पदार्थ का कुछ नहीं कर रहा । क्योंकि एक पदार्थ दूसरे पदार्थ की परिणति कर ही नहीं सकता । वह वस्तुस्वरूप है, निमित्त होना अलग बात है । निमित्त तो होते हैं परद्रव्य किंतु परद्रव्य किसी की परिणति करते नहीं हैं । एक कल्पना करो, अगर कोई पदार्थ किसी दूसरे की परिणति करने लगे तो सब अटपट बात बन जायेगी, कोई व्यवस्था ही न रहेगी । किसी ने किसी का परिणमन कर दिया तो अब वह वह न रहा, दूसरा कुछ बन गया, और ऐसी गड़बड़ी में फिर लोक में कुछ भी वस्तु नहीं रहती । सबका अभाव हो जायेगा, तो आत्मा केवल अपने भावभर करता है, अन्य बात कुछ नहीं करता । तो अब उस भाव में यह सुधार बनायें कि मैं अपने भावों में अपने आत्मा को ही ध्याऊं अथवा जो आत्मा सिद्ध हो गए हैं, ऐसे परमेष्ठी पुरुषों को ध्याऊं, अन्य किसी में मेरी शरणबुद्धि न होवे । इस तरह से जो अपने आत्मा में आता है, ध्यान करता है, रत होता है वह है सम्यक्चारित्र । पहले तो आत्मा को पहिचानें भेद डाल-डालकर, जिसमें ज्ञान-दर्शन हो वह हूँ मैं, जिसका आनंदस्वरूप हो वह हूँ मैं । पहिचानो, जो इस देह प्रमाण है वह हूँ मैं, अनेक तरह से पहिचाने आत्मा को, मगर जब आत्मा में लीन होने को होगा तब ये विकल कुछ न रहेंगे सिर्फ एक ज्ञानमात्र अपने आपको निहारेगा याने गुणपर्याय के भेद से परे केवल चैतन्यस्वरूप अपने आपको देखेगा और उसमें लीन होगा ꠰ वह है सम्यक्चारित्र ।


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