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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 90

From जैनकोष



हिंसारहिए धम्मे अट्ठारहदोसबज्जिए देवे ।

णिग्गंथे पव्वयणे सद्दहणं होइ सम्मत्तं ꠰꠰90।।

अहिंसामय धर्म में श्रद्धान होने की सम्यक्त्वरूपता―सम्यक्त्व कहां बनता है इसका वर्णन इस गाथा में किया । हिंसारहित धर्म में श्रद्धान करना सम्यक्त्व है । धर्म हिंसारहित है याने अहिंसामय है, जिनके यहाँ बलि की प्रथा है उनके यहाँ हिंसारहित धर्म कहां रखा है । हिंसा में धर्म नहीं, धर्म तो अहिंसारूप है, अर्थात् आत्मा में किसी प्रकार का विकार न होना, केवल एक शुद्ध चेतनामात्र ज्ञातादृष्टा रहना यह है अहिंसा का पूरा रूप । इस स्थिति को धर्म माने वहाँ सम्यक्त्व है ।

प्रभु की क्षुधातृषाजरादोषरहितता―18 प्रकार के दोषों से रहित देव में श्रद्धान होना सम्यक्त्व है । 18 दोष कौन से हैं? रत्नकरंड श्रावकाचार में बताया है―क्षुत्पिपासाजरांकजन्माडकभयस्मया: आदि । क्षुधादोष―भगवान के क्षुधादोष नहीं होते । केवलज्ञान होने पर भगवान होते हैं, भगवान आहार नहीं ग्रहण करते । कल्पना करो कि यदि भगवान आहार लेवें, कौर उठायें, मुख से चबायें, उसे गुटके तो यह वृत्ति उनकी दीनता सिद्ध करती है, कायरता सिद्ध करती है । भगवान अनंत बल के धनिक हैं, उनके क्षुधा दोष नहीं है । अनेक लोगों ने ऐसे भी देव मान रखा कि अमुक देव ने अमुक जगह मांस-भक्षण किया, कभी नहीं खाया, कभी कुछ खाया, इसके संबंध में अनेकों कथानक भी गढ़ दिये, पर यहाँ बता रहे कि जो सच्चा देव होगा उसमें क्षुधा का दोष नहीं होता । भगवान के क्षुधा नहीं होती । केवलज्ञान होने के बाद करोड़ों वर्षों तक भी अरहंत भगवान रहते हैं लेकिन उनके क्षुधा तृषा की वेदना नहीं होती । उनमें अनंत बल होता, शरीर उनका स्फटिक की तरह स्वच्छ होता जिसमें किसी प्रकार का दोष नहीं होता, भगवान के बुढ़ापा भी नहीं आता । मान लो कोई वृद्ध पुरुष केवलज्ञान हो जाने से भगवान बन गया तो वहाँ वह बुढ़ापा न रहेगा । नहीं तो कोई भगवान बूढ़ा नजर आये तो वहाँ भगवत्ता नहीं प्रकट होगी । केवलज्ञान होने पर शरीर पूर्ण युवा की तरह भरा-पूरा हो जाता है । मान लो किसी मुनि के हाथ पैर वगैरह किसी अंग में चोट लग जाये, कोई अंग सूज जाये अथवा कोई अंग बिगड़ गया हो तो वहाँ वे सब देह के ऐब खतम हो जाते हैं और सुंदररूप हो जाता है, पर कोई पुरुष वृद्ध है, बुढ़ापे से ग्रस्त है वह देव नहीं ।

प्रभु की रोग जन्म, मृत्यु, भय दोषरहितता―प्रभु के रोग नहीं होता, उनका शरीर निगोदरहित स्फटिक मणि की तरह आरपारदर्शी होता, इस कारण उनके शरीर की छाया भी नहीं पड़ती । जैसे स्फटिकमणि धूप में रख दी जाये तो उसकी छाया नहीं पड़ती ऐसे ही भगवान का शरीर स्फटिकमणि की तरह स्वच्छ हो जाने से उनके शरीर की छाया नहीं पड़ती । प्रभु के अब जन्म नहीं होते । बहुत से लोग तो प्रभु का अवतार मानते हैं ईश्वर ने अब अमुक का अवतार लिया । अरे ! जो प्रभु हो गए वे अब अवतार नहीं लेते । अवतार तो उतरने का नाम है । प्रभु उतरते नहीं हैं, नीचे नहीं आते हैं, वे जन्म से रहित हैं, और मृत्यु भी उनके नहीं होती । यद्यपि आयु का क्षय होता है, निर्वाणप्राप्त होता है, पर मृत्यु मानते हैं उसको कि जिसके बाद जन्म हुआ करते हैं । जन्म तो उनका होता नहीं इसलिए मृत्यु भी नहीं होती । प्रभु में भय नहीं होता, अनेक देवांगनावों की ऐसी कथायें बनी हैं कि ये अमुक से डर गए, जैसे कोई भस्मासुर से डर गये, इत्यादि बताया है, पर प्रभु में भय का काम नहीं । प्रभु अरहंत चेष्टा नहीं करते, रागप्रवृत्ति नहीं करते, प्रभु रागद्वेषरहित वीतराग हैं, प्रभु के भय नहीं है । जिनके भय नहीं है वे हथियार नहीं रखते । और कोई देव त्रिशूल रख रहा, कोई चक्र रख रहा, कोई तलवार रख रहा, तो वह क्यों रख रहा? जब उसे कोई प्रकार का भय है तब ही तो रख रहा, वीतराग परमात्मा निर्भय होता है इसलिए वह शस्त्रादिक से रहित होता है ।

प्रभु की विस्मयरागद्वेष दोषरहितता―प्रभु को कभी आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि “सकल ज्ञेय ज्ञायक तदपि निजानंदरस लीन ।” प्रभु का यह स्वरूप है कि वे समस्त ज्ञेयों को जान रहे फिर भी अपने आनंदरस में लीन हैं । उन्हें तीनों लोक सब ज्ञात हो रहे हैं फिर आश्चर्य किस बात में हो? आश्चर्य होता है उन मनुष्यों को जिनको ज्ञान नहीं है और कुछ अनहोना-सा देखने लगें, प्रभु के लिए कुछ भी अनहोना नहीं दिखता । प्रभु राग से रहित हैं, प्रभु की चेष्टायें नाना तरह की नहीं होती, जो एक अरहंत का स्वरूप है, अरहंत की जो वृत्ति है, बस विराजना, उपदेश देना, विहार होना आदिक, यह होता है सबका । उनमें भिन्न-भिन्न वृत्तियां नहीं है जबकि लौकिक पुरुषों ने कैसे-कैसे कथानक बनाये हैं अपने देवताओं के बारे में । किसी का देवता अपनी स्त्री के आधे शरीर में पहुंच गया या आधे शरीर को धारण कर रहा, किसीने अपनी जटाओं में नदी समुद्र को बाँध रखा, किसी को कुछ प्रिय है, स्त्री भी रखे हैं, सूर्य, चंद्र को भी भगवान मानते और बताते वे अपनी देवियों में रमण करते हैं, उन सबमें राग पाया जाता है पर वीतराग भगवान के राग भाव नहीं है, उनके द्वेष भी नहीं होता । वीतराग हैं, जबकि लौकिक पुरुष अपने देवताओं का ऐसा चरित्र बतलाते कि जिनमें द्वेष स्पष्ट रहता है । किसी ने कोई नगर जला दिया, किसी ने किसी को मार डाला । यों कितने ही मारने के प्रसंग वाले कथानक आते हैं देव मानने के, पर प्रभु का काम केवल विराजना, विहार करना, दिव्योपदेश करना है । प्रभु में और खटपट नहीं होते ।

प्रभु की मोहचिंतनादि सर्वदोषरहितता―प्रभु मोही नहीं होते, कुछ लोगों ने देवताओं के ऐसे कथानक गढ़े कि उसका उससे बड़ा मोह था, पुत्र से मोह था, अमुक से बड़ा स्नेह था आदिक और उसे देवता कहते, पर वह देवता नहीं है । साधारणसा कुछ लौकिकता में चढ़ा हुआ वह पुरुष है, लोगों ने प्रसिद्धि कर रखा कि यह देव है । प्रभु को चिंता नहीं होती, क्योंकि उनका काम बस ज्ञातादृष्टा रहना है, किसी वस्तु से उन्हें प्रयोजन ही नहीं, जबकि लौकिक पुरुष अपने देवताओं की बड़ी चिंता दिखाते हैं । अमुक को मारने की चिंता, अमुक को रचने की चिंता, अमुक को सुखी-दुःखी करने की चिंता आदि, पर जिसके चिंता है वह भगवान नहीं । भगवान तो केवलज्ञानी होता है और अपने सहज सुख में लीन रहता है ꠰ प्रभु क्रीड़ा नहीं करते, जो क्रीड़ा करे वह देव नहीं है, देव तो अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतआनंद और अनंतशक्तिमय होता । प्रभु के निद्रा नहीं होती । उनकी पलक न तो पूरी खुली हुई होती न पूरी मुंदी हुई होती और न वह पलक गिरती-उठती है, एक समान रहती है । कैसी स्थिरता है प्रभु की और कैसी वीतरागता है जबकि अनेक लोगों ने अपने देवता को किसी को कैलास पर्वत पर सोने वाला बताया है, किसी ने जल में नाग पर सोने वाला बताया, निद्रा में बताया, पर प्रभु के निद्रा कभी नहीं होती । उनके विषाद आदिक कोई दोष नहीं हैं, ऐसी प्रभु की श्रद्धा करना यह सम्यक्त्व कहलाता है ।

निर्ग्रंथ गुरु में व परमागम में श्रद्धान होने की सम्यक्त्वरूपता―अहिंसामय धर्म में व 18 दोषों से रहित देवों में श्रद्धान होना सम्यक्त्व है । इसी प्रकार निर्ग्रंथ गुरु का श्रद्धान होना सम्यक्त्व है । गुरु निर्ग्रंथ ही होते हैं, जिनके भीतर किसी प्रकार की गांठ नहीं, ममता नहीं, केवल एक आत्मा की ही धुन में हैं, सर्व परिग्रहों के त्यागी हैं ये ही मोक्षमार्ग के गुरु हैं, ऐसा श्रद्धान सम्यक्त्व में होता है । और स्याद्वादमय वचन ही वास्तविक आगम हैं, उसका श्रद्धान सम्यक्त्व है । देखिये, जो पदार्थ होते हैं वे सदा रहते कि नहीं । मेरा कभी मूलत: नाश नहीं होता, लेकिन पर्याय भी समय-समय पर बदलती रहती है । याने कुछ भी हो, उसमें सदा रहना और पर्याय बनना ये दो बातें होनी ही पड़ती हैं । अगर पर्यायें न बनें तो वस्तु ही न रहेगी, अगर सत्ता न रहे तो पर्यायें बदलना न बनेगा । तो वस्तु द्रव्यपर्यायात्मक है, द्रव्यांश तो सदा रहने वाला और पर्याय बदलने वाली होती है । सो जब वस्तु ही द्रव्यपर्यायात्मक है तो बातें दो-दो प्रकार दिखेगी हर एक वस्तु में, द्रव्यदृष्टि से भी, पर्यायदृष्टि से भी । स्वरूप ही ऐसा है, कहीं वहाँ संदेह या अज्ञान की बात नहीं है, सब जीव नित्य हैं क्योंकि द्रव्यदृष्टि से सदा रहते हैं, जीव अनित्य हैं क्योंकि पर्यायदृष्टि से ये बदलते रहते हैं । तो अब जो भी वचन उपदेश होगा वह स्याद्वाद से गर्भित होगा । तो ऐसा जो प्रवचन है, आगम है, प्रभु का उपदेश है उसमें श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है । इस प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव अपने सम्यक्त्व को कभी स्वप्न में भी मलिन नहीं करता ।


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