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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 94

From जैनकोष



सम्माइट्ठी सावय धम्मं जिणदेवदेसियं कुणदि ।

विवरीय कुव्वंतो मिच्छादिट᳭ठी मुणयव्वो ꠰꠰94।।

सम्यग्दृष्टि के जिनेंद्रोपदिष्ट धर्म का आचरण―सम्यग्दृष्टि श्रावक जिनेंद्रदेव द्वारा उपदिष्ट धर्म को करता है, किंतु जो इस सुधर्म से विपरीत आचरण करता है वह मिथ्यादृष्टि ही है । यहाँ संबोधन यद्यपि सावय शब्द से किया है तो भी इसका अर्थ श्रावक भी है और मुनि भी है । श्रावक तो प्रसिद्ध ही है―श्रद्धान, विवेक, क्रिया वाले गृहस्थ श्रावक हैं । और जो धर्मोपदेश सुनावें वे मुनि हैं । सो ये सभी सम्यग्दृष्टि जिनोपदिष्ट धर्म को करते हैं । जो जीवों को संसार-दुःख से छुड़ाकर उत्तम सुख में, मोक्षपद में पहुंचा दे वह धर्म है । वह धर्म है आत्मस्वभाव का आश्रय लेना । आत्मस्वभाव आत्मा का धर्म है । धर्म के प्रसाद से शेष संसार रहे तब इंद्रादि उत्तम पद मिलते हैं और शीघ्र ही अंत में आत्मसाधना की उत्कृष्टता से निर्वाणपद प्राप्त होता है । जो धर्म से विपरीत आचरण करता है वह अज्ञानी है, मिथ्यादृष्टि है उसका संसार में भटकना बना रहता है । इस गाथा में तथ्य वृत्तांत बताकर कल्याणार्थी पुरुषों को जैनशासन के अनुसार भक्ति वंदना उपासना आदि की प्रेरणा दी गई है ।


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