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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 99

From जैनकोष



किं काहिदि बहिकम्मं किं काहिदि बहुविहं च खवणं च ।

किं काहिदि आदावं आदसहावस्स विवरीदो ꠰꠰99꠰।

आत्मस्वभाव से विपरीत साधु के बाह्यकर्म उपवास आतापयोग आदि की व्यर्थता―स्वभाव से विपरीत कुछ भी बाह्य प्रवर्तन आत्मा के मोक्ष के अर्थ तनिक भी सहयोगी नहीं हो सकता । जिस साधु के आत्मस्वभाव की दृष्टि नहीं ज्ञानमात्र सहजभाव की रूचि नहीं वह कितना ही पठन-पाठन, प्रतिक्रमण पाठ आदि करे तो भी वह बाह्यकर्म क्या करेगा, कुछ भी नहीं करेगा, मोक्ष को करेगा ही नहीं । अनशनस्वभाव ज्ञानमात्र सहजभाव का जिन्हें परिचय नहीं प्राप्त हुआ उन साधुवों का नाना प्रकार का उपवास क्या करेगा, मोक्ष को तो दे ही न सकेगा । अमूर्त ज्ञानमात्र सहजानंदमय निज सहजपरमात्मतत्त्व की जिनके प्रतीति ही नहीं वे साधु तेज धूप में पहाड़ की खुली शिलावों पर बड़े-बड़े आतापनयोग जैसे तपश्चरण करें तो भी ये आताप आदि इसका क्या करेंगे, कुछ भी लाभ नहीं पहुंचा सकते । जिनको सहजात्मस्वरूप की सुध नहीं है वे धर्म के नाम पर देहादि में अहंभाव रखकर मैं मुनि हूँ, मुझे ऐसे-ऐसे तपश्चरण उपवास प्रतिक्रमण आदि करने चाहिये ऐसे संकल्प से परभाव में ही रमते रहते हैं, फिर अविकारस्वभाव अंतस्तत्त्व के आश्रय से होने वाला मोक्षमार्ग भी उन्हें प्राप्त नहीं हो सकता । सम्यग्दर्शन धर्म का मूल है, सम्यक्त्वशून्य साधु की सारी क्रिया, चेष्टायें तनिक भी आत्मलाभ नहीं कर सकतीं ।


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