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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-14

From जैनकोष



दर्शनमोहांतराययोरदर्शनालाभौ ।। 9-14 ।।

दर्शनमोह के उदय में अदर्शन परीषह की तथा अंतराय के उदय में अलाभ परीषह की संभवता―अदर्शन परीषह और अलाभ परीषह ये दर्शन मोह के उदय से और अंतराय के उदय से होते हैं । अदर्शन परीषह में ज्ञानातिशय न होने पर श्रद्धान विपरीत की संभावना में ज्ञानबल द्वारा मुनि अपने श्रद्धान को बिगड़ने नहीं देता । यह है अदर्शन परीषह विजय । पर यह अदर्शन परीषह आया कैसे? तो दर्शन मोह की प्रकृति का किस प्रकार का उदय होने पर यह अदर्शन परीषह बनता है और अलाभ परीषह लाभांतराय के उदय से बनता है । लाभांतराय कर्म के उदय में जीव को लाभ नहीं हो पाता, और जब लाभ नहीं है तो उसकी आशा तृष्णा में यह जीव व्याकुलता मानता है । तो ऐसी स्थिति में अपने ज्ञानबल से मुनिराज उस अलाभ में अपने को व्याकुल नहीं होने देते, यह ही है अलाभ परीषह विजय । तो अदर्शनपरीषह दर्शन मोह के उदय में हुई और अलाभ परीषह लाभांतराय कर्म के उदय में हुई । यद्यपि इन परीषहों की उत्पत्ति में अन्य-अन्य भी कारण हो जाते हैं लेकिन जो प्रधान कारण हैं, जिनके बिना ये परीषह बन ही नहीं सकते हैं उक्त कारणों को बताना आवश्यक है । जैसे अलाभ परीषह केवल वीर्यांतराय के उदय में तो नहीं बनी, यदि उस विषयक कल्पना न जगे, कुछ चारित्र मोह उदयकृत विकार साथ न बने तो वह परीषह ही क्या हुई? लेकिन अन्य कारण तो गौण रहते हैं और मुख्य कारण वह होता है जिसके साथ अन्वय व्यतिरेक होता है । तो यह अदर्शन परीषह दर्शनमोहनीय के उदय से हुआ और अलाभ परीषह लाभांतराय के उदय से हुआ, यह कथन समीचीन है ।


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