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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-2

From जैनकोष



स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षा परीषहजय चारित्रै: ।। 9-2 ।।

संवर के उपायों में सर्वप्रथम उपाय गुप्ति―आस्रव निरोध गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहजय और चारित्र के भावों से होता है । संसार के कारणों से बचना इसका नाम गुप्ति है । गुप्ति शब्द गुपू रक्षणे धातु से बना है और इसमें इक्तिन् प्रत्यय लगा है जिसका अर्थ होता है―जो रक्षा करे, बचावे उसे गुप्ति कहते हैं । गुप्ति के तीन भेद हैं―(1) मनोगुप्ति, (2) वचन गुप्ति और (3) काय गुप्ति । मन, वचन, काय से आस्रव हुआ करता था । तो उन मन, वचन, काय की प्रवृत्तियों को रोक देना सो ये गुप्तियाँ कहलाती हैं । मन को वश में करना, संसारी प्राणियों का मन इंद्रिय के विषयों में, विषयों के साधनों में यत्र तत्र डोला करता है और जिसके कारण चित्त अस्थिर रहता है । ज्ञानी साधु संत इंद्रिय के विषयों पर विजय प्राप्त करते हैं और मन से भी किसी का ख्याल नहीं रखते, उनका मन वश में है और मन का उपयोग आत्म स्वभाव की दृष्टि के लिए हुआ करता है । उन साधु संतों के मनो गुप्ति है जिसके प्रताप से कर्मों का संवर होता है । वचन डोलने की प्रवृत्ति से भी आस्रव । होता है । तो जो उच्च ज्ञानी संत है, जिनको आत्मा की पूर्ण धुन हुई है वे आत्मस्वभाव में ही उपयुक्त रहा करते हैं । वचन व्यवहार उनका समाप्त होता है और अंत: ही विचार रहता है, उन साधु संतों के वचनगुप्ति है जिसके प्रताप से कर्मों का संवर है । कायगुप्ति―शरीर की प्रवृत्ति न करना, स्थिर शरीर करके जहाँ जैसे पड़े हैं पड़े हैं, उसका विकल्प न करना, काय की चेष्टा न करना, इस प्रकार काय को वश करता हुआ आत्मा सहज चैतन्य स्वभाव में ही उपयुक्त रहना कायगुप्ति है । जिनके ये तीन गुप्तियाँ हो जाती हैं उनके

अवधिज्ञानादिक ऊंचे ज्ञान होते हैं ।

गुप्तिसिद्धि के प्रभाव का अनुमापक एक उदाहरण―गुप्ति परीक्षण के संबंध में एक घटना भी हुई कि जब राजा श्रेणिक ने चेलना से धर्म के संबंध में विवाद किया और कहा कि हमारे संन्यासी सर्वज्ञ होते हैं तो रानी चेलना ने उन भिक्षुवों के भोजन का प्रसंग बनाकर परीक्षा की और उस प्रसंग में उन्हीं भिक्षुवों के चमड़े के जूतों के टुकड़े कराकर खीर में मिलाया । बाद में जब जूते न मिले तो वे भिक्षु हैरान हुए । अंत में जब ज्ञात हुआ कि उन बूतों का इस प्रकार उपयोग हुआ तो उससे भिक्षु थोड़ा लज्जित हुए पर राजा श्रेणिक भी लज्जित हुए । उसका बदला चुकाने के लिए राजा श्रेणिक ने चेलना से कहा कि तुम मुनियों को आहारदान दो । तो राजा श्रेणिक ने एक जगह हडि्डयां गड़वाकर, वहीं कोठरी बनवाकर उसमें रसोई बनवाया । जब चेलना वहाँ पड़गाहने खड़ी हुई तो इस प्रकार पड़गाहा कि हे त्रिगुप्तिधारी मुनिराज अत्र तिष्ठ तिष्ठ, तो वहाँ कोई मुनि न ठहरे, कारण यह था कि जिनके तीनों गुप्तियाँ सिद्ध न थीं उनको तो पड़गाहा ही न था, वे ठहरें कैसे और जिनको गुप्ति सिद्ध थी उन्होंने अवधिज्ञान के बल से जाना कि यह रसोई घर का स्थान अपवित्र है इसलिए नहीं आये । यह तथ्य बाद में उन मुनियों से चर्चा करने पर विदित हुआ । एक बार राजा श्रेणिक ने जंगल में बैठे हुए किसी मुनिराज पर मरा हुआ एक सर्प डाल दिया और आकर चेलना से कहा कि हमने तुम्हारे साधु पर जंगल में एक मरा हुआ साँप डाला है, तो राजा की यह बात सुनकर रानी चेलना बड़ी दुःखी हुई । तब राजा श्रेणिक ने समझाया कि अरे अब क्यों दुःख मानती? वह तो साँप को फेंककर कहीं के कहीं चले गए होंगे । तो रानी चेलना बोली नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता । यदि वह सच्चे मुनि हैं तो उपसर्ग आने पर वह कहीं नहीं जा सकते । वह तो वहीं ध्यान लगाये बैठे होंगे । आखिर जब दोनों पहुँचे तो क्या देखा कि वह मुनिराज ध्यानस्थ बैठे हुए थे । उनके गले में मरा सर्प पड़ा होने से चींटियों का समूह चढ़ा हुआ था । वहाँ रानी चेलना ने नीचे शक्कर डाला जिससे सारी चींटियाँ नीचे उतर गईं । यह काम इसलिए किया कि कहीं उपसर्ग दूर करने में किसी जीव की हिंसा न हो जाये । अब उपसर्ग दूर हुआ तो मुनिराज ने आँखें खोली और सामने खड़े हुए दोनों को एक ही आशीष दिया―धर्मवृद्धिरस्तु जिस घटना को देखकर राजा श्रेणिक पर बड़ा प्रभाव पड़ा । जिसने पहले सप्तम नरक की आयु बाँध रखी थी, उसकी इस आत्मविशुद्धि के प्रताप से केवल पहले नरक का आयु बंध रह गया । तो गुप्ति संवर का विशेष कारण है ।

संवर के उपायभूत समिति का विवरण―समिति―भली प्रकार चलना, प्रवृत्ति करना समिति कहलाता है । समिति 5 प्रकार की होती है―(1) ईर्यासमिति (2) भाषासमिति (3) एषणासमिति (4) आदान निक्षेपण समिति और ( 5) प्रतिष्ठापना समिति । ईर्यासमिति―सूर्य के प्रकाश में चार हाथ आगे जमीन देखकर चलना ईर्यासमिति है । इस ईर्यासमिति को प्रकट करने वाले मुनि को यदि अच्छे कार्य के लिए गमन है और अच्छे भावपूर्वक गमन है तो वह ईर्यासमिति कहलाती है । अर्थात् ईर्यासमिति में 4 बातें आवश्यक हैं । किसी अच्छे धर्मादिक कार्य के लिए जाना, अच्छे भाव रखते हुए जाना, सूर्य के प्रकाश में जाना अर्थात् दिन में जाना और चार हाथ आगे जमीन शोधकर चलना । भाषा समिति―हितमितप्रिय वचन बोलना भाषा समिति है । साधु संत जन दूसरे से कुछ वचन बोलते हैं तो हितकारी ही वचन बोलते हैं । जिनको आत्महित का निरंतर ध्यान है वे दूसरे से बोलेंगे तो परहित का ध्यान रखते हुए ही बोलेंगे । साधु संत जन अत्यंत कम शब्दों में वचन व्यवहार करते हैं । अधिक बोलना यह क्षोभ का कारण बन जाता है । जो लोग अधिक बोलते हैं उनके बोलने में कुछ शब्द ऐसे निकल बैठते हैं जो स्वयं के लिए अफसोस उत्पन्न करते हैं । साधु संत जन परिमित वचन ही बोलते हैं । तो साधु हितमित प्रिय वचन बोलते हैं । किसी भी जीव का हित अप्रिय वचन व्यवहार करके नहीं कराया जा सकता । प्रिय वचन से ही आकर्षण होता है । और वह वहाँ हित की बात सुन सकता है । तो हितमित प्रिय वचन बोलना भाषासमिति है । एषणासमिति―विधिपूर्वक आहार के लिए चर्या करना और आदर से पड़गाहने वाले श्रावक के यहाँ अंतराय टालकर निर्दोष आहार करना यह एषणासमिति है । साधुजन स्वयं रसोई का आरंभ नहीं करते क्योंकि उसमें हिंसा है और समय उन विषयों के साधन जुटाने में अधिक लगता है जिससे आत्म साधन में बाधा होती है । अतएव साधु जन स्वयं रसोई का आरंभ नहीं करते, किंतु शुद्ध भोजन बनाने वाले गृहस्थ के यहाँ यदि गृहस्थ आदरपूर्वक पड़गाहे तो वहाँ साधु जन भोजन करते है । तो इसी आहार चर्या को निर्दोष संपादित करना एषणासमिति कहलाती है । आदाननिक्षेपण समिति―दया, ज्ञान शुद्धि के उपकरणों को शोधकर उठाना, शोधकर रखना आदान निक्षेपण समिति है । साधु संत जन दया के लिए कोमल पिछी रखते है तो कमंडल आदिक उठाते समय कमंडल को पिछी से साफ करते हैं और थोड़ा उठाकर उसकी तली भी साफ करते हैं । और फिर जहाँ रखेंगे उस जगह को पिछी से शोध कर रखेंगे । ऐसी वस्तुओं को शोधकर हिंसा टालकर धरना उठाना आदान निक्षेपण समिति कहलाता है । प्रतिष्ठापनासमिति―शरीर के मल सूत्र पसेव आदिक को ऐसी जगह में फेंकना जहाँ हिंसा न हो, निर्दोष निर्जंतु जमीन पर मल आदिक का क्षेपण करना प्रतिष्ठापनासमिति है । इन समितियों में बाहर से व्यापार दिखता है लेकिन इनमें निवृत्ति का भाव है और उस निवृत्ति के भाव के कारण संवर है । प्रवृत्ति संवर का कारण नहीं है, लेकिन इस प्रवृत्ति में इंद्रिय की प्रधानता है । जब जीव रक्षा का भाव चल रहा है तो वहाँ उन जीवों का सहज चैतन्यस्वरूप उनकी दृष्टि में आता है । अपने स्वरूप पर भी दृष्टि होती है । ऐसे अंतस्तत्त्व की उपासना समितियों में भी निरंतर चल रही है, इस कारण समितियों में कर्मप्रकृति का संवर चला करता है ।

संवर के उपायभूत धर्म के अंगों में उत्तम क्षमा का विवरण―धर्म―इष्ट स्थान में जो धारण करे उसे धर्म कहते हैं । आत्मा का इष्ट स्थान तो मुक्ति है और फिर इसी धर्म के प्रताप से रागांश के शेष रहने पर नरेंद्र सुरेंद्र मुनींद्र आदिक के स्थानों में भी यह आत्मा पहुंचता है । तो जो आत्मा को इष्ट स्थान में धारण करा दे उसका नाम धर्म है । धर्म तो वास्तव में आत्मा के स्वभाव का नाम है और आत्मस्वभाव की उपासना करना, धर्म पालन करना कहलाता है । तो जो आत्मस्वभाव की उपासना करता है उसमें 10 प्रकार के भाव बनते हैं जिन्हें दस धर्म कहा करते हैं । उनमें प्रथम धर्म है उत्तम क्षमा । कोई दूसरा जीव साधु से अपराध करे, सताये, दुर्वचन बोले तो उस पर साधु संत जन क्रोध नहीं करते, किंतु वस्तु के स्वरूप का मनन करते रहते हैं । यह दुर्वचन बोलने वाला आत्मा मेरे ही समान सहज चैतन्यस्वरूप है, किंतु अनादि काल से परंपरा से चले आये कर्म के उदय काल में यह जीव अपने स्वभाव को भूलकर और बाह्य विषयों में लगकर, उन विषयों में विघ्न जानकर क्रोध किया करता है । यह जीव क्रोध नहीं कर रहा किंतु कर्म के उदय की छाया का यह रूप बन रहा है । यह तो ज्ञान और आनंद का निधान है, इस प्रकार विरोधी जीव में इस ही सहज ज्ञानानंद स्वभाव को ज्ञानी जन निरखते हैं और अपने में उत्तम क्षमा को बनाये रहते हैं । उत्तम क्षमा सम्यग्दृष्टि जीव के ही संभव है । जिनने स्वपर भेद विज्ञान किया और निर्विकल्प अविकार जो स्वभाव का अनुभव करके सहज आनंद पाया ऐसे पुरुष ही अन्य जीवों पर क्षमा भाव धारण करते हैं । क्षमा वीरों का भूषण है । कोई सोचे कि जिस बलवान पर वश न चले सो गम खाकर रहना क्षमा हो जायेगी, सो बात नहीं है । समर्थ होकर भी छोटे पुरुषों पर क्षमा भाव रखे तो उत्तम क्षमा कहलाती है । यह उत्तम क्षमा स्वभाव विकास का मूल है । जिसके अन्य जीवों पर क्रोध का संस्कार बना रहता है उसके आत्मा के सारे गुण फुक जाते हैं । उसके गुणों का विकास नहीं हो पाता । प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह हर स्थितियों में अपने आपको समझा-बुझाकर क्रोध में न आये । क्रोध में आने वाला पुरुष अपना अनर्थ कर डालता है । ज्ञानी संत उत्तम क्षमा शक्ति होते हैं और इस क्षमा के प्रताप से, आत्मस्वभाव के मनन में निरंतर बने रह सकते हैं । यह उत्तम क्षमा विशिष्ट धर्म है जिसके प्रताप से यह इस भव में तथा अगले भव में अगले भविष्य काल में यह इष्ट स्थान में अपनी स्थिति बनाये रखता है ।

धर्म आदि सभी संवर करणों के भेदों की सूत्रों में वक्ष्यमाणता―धर्म से संवर होता है । धर्म के दस लक्षण हैं, जिन में उत्तम क्षमा का कुछ वर्णन किया, इसी प्रकार उत्तम मार्दव आदिक धर्म भी संवर के कारण है, इन सबका वर्णन आगे सूत्रों में आयेगा । अनुप्रेक्षा―शरीरादिक के स्वभाव का धर्मानुरूप चिंतन करना अनुप्रेक्षा कहलाता है । परीषह―समतापूर्वक उपसर्ग सहन करने को परीषह कहते हैं । परिषह शब्द में परि तो उपसर्ग है और सह धातु है । जो सही जायें उन्हें परिषह कहते हैं । सह धातु में घञ् प्रत्यय लगाकर परीषह शब्द बना है । यद्यपि घञ् प्रत्यय लगाने के कारण षाह शब्द होना चाहिये अर्थात् परीषाह, किंतु व्याकरण के अपवादक सूत्रानुसार यहाँ दीर्घ न होगा और उपसर्ग संबंधी इकार को दीर्घ हो जायेगा । परीषह के विजय को परीषहजय कहते हैं । चारित्र का संकेत तत्त्वार्थसूत्र के प्रथम सूत्र में ही दिया गया है, जो आचरण किया जाये उसे चारित्र कहते हैं । चारित्र का भी वर्णन आगे के सूत्रों में होगा ।

संवर स्वरूप गुप्ति आदि की करण कारकता में प्रयुक्ति का प्रयोजन―इस सूत्र में गुप्ति आदिक शब्दों का द्वंद्व समास किया गया है और करणकारक में तृतीया विभक्ति का बहुवचन दिया गया है जिससे यह प्रकट सिद्ध है कि संवर करने वाले आत्मा के संवरण क्रिया का साधकतम यह गुप्ति आदिक है । यहाँ शंकाकार कहता है कि संवर ही गुप्ति आदिक है । तब इसमें तृतीया विभक्ति न लगना चाहिये । गुप्ति आदिक के कारण संवर होता है ऐसा अर्थ सही नहीं जंचता किंतु गुप्ति आदिक भाव स्वयमेव संवर हैं, फिर भेद पूर्वक निर्देश क्यों किया गया है? समाधान―भेदपूर्वक निर्देश करने से यह सिद्ध होता है कि आस्रव के निमित्तभूत कर्म का संवरण होता है । केवल भावसंवर की विवक्षा करें तो वहाँ भेद का निर्देश न किया जाये यह ठीक हो सकता है किंतु भेद का निर्देश करने पर भाव संवर का भी बोध हो जाता है और मुख्यतया द्रव्य कर्म संवर का बोध होता है अर्थात् गुप्ति आदिक परिणामों के कारण द्रव्यकर्म का संवर हो जाता है । इस सूत्र में स: शब्द देने से गुप्ति आदिक से संवर का साक्षात् संबंध सिद्ध होता है और उससे यह नियम बनता है कि वही संवर गुप्ति आदिक के द्वारा । होता है । अन्य उपायों से नहीं होता है । जैसे व्यवहार धर्म में अनेक बातें चलती हैं अथवा अन्य धर्मों में अनेक प्रकार के क्रियाकांड चलते हैं, अनेक देवताओं की आराधना यज्ञ आदिक किंतु वे सब संवररूप नहीं हैं, क्योंकि उन क्रियावों से कर्म की निवृत्ति नहीं हो सकती । कर्म का संवर होता है रागद्वेष मोह भाव से । सो उन सब क्रियाकांडों में रागद्वेष की प्रवृत्ति रहने से कर्म का संवर नहीं हो सकता । यदि नदी स्वान आदिक से कर्म की निवृत्ति होने लगे तो मत्सआदिक जो कि नदी के जल में सदा रहते हैं उनको तो मोक्ष सुलभ हों जायेगा । तो बाहरी क्रियाकांडों से या अज्ञान भरी लोकमूढ़ता के कल्पित धर्मों से कर्मों का संवर नहीं होता अब यहाँ जिज्ञासा होती है कि क्या गुप्ति आदिक इन कारणों से ही यह संवर बनता है या कुछ अन्य भी कारण है? तो इसके

अंतर में सूत्र कहते हैं ।


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