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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-20

From जैनकोष



प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ।। 9-20 ।।

अंतरंग छह तपों का निर्देश―ये तप उत्तर हैं अर्थात अंतरंग तप हैं अथवा उत्तर हैं मायने उत्तम हैं । ऐसे साधुजनों के द्वारा जिनका स्पर्श नहीं होता ये ऐसे अंतरड्ग तप हैं । इसलिए इनको उत्तर कहा गया है । अथवा ये अंतरंग तप क्यों हैं कि जिन तपों का नाम लिया है प्रायश्चित आदिक वे सब अंतरंग व्यापार के आलंबन से होते हैं । इनका भाव से सीधा संबंध है इसलिए इनको आभ्यंतर तप कहते हैं―तीसरी बात यह है कि अंतरंग तप किसी द्रव्य की अपेक्षा करके नहीं होते ये अंतरंग भाव से होते हैं, इस कारण इन्हें अंतरड्ग तप कहा गया है । ये अंतरड्ग तप 6 प्रकार के हैं―(1) प्रायश्चित, (2) विनय, (3) वैयावृत्य, (4) स्वाध्याय, (5) व्युत्सर्ग और, (6) ध्यान । इन 6 तपों के अनेक प्रकार के भेद हैं, जिन भेदों को आगे के सूत्रों में कहा जायेगा और जिन भेदों के वर्णन से इन तपों का विशेष बोध होगा फिर भी संक्षेपरूप से इन छहों का लक्षण कहते हैं । प्रायश्चित का अर्थ है दोषों की शुद्धि । गुरु से विनय करके, गुरु से सुनकर गुरु के द्वारा दिए गए दंड को झेलकर जो अंतरंग में स्वच्छता, शुद्धता जगती है, उसे प्रायश्चित तप कहते हैं । विनयतप सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का विनय अर्थात इन भावों को हितकारी मानना और रत्नत्रय के धारियों का विनय करना विनय नाम का तप है । तीसरा आभ्यंतर तप है वैयावृत्य । वैयावृत्य का जो भाव है उसे वैयावृत्य कहते हैं अर्थात निवृत्ति का, रिटायर्ड का जो आत्म कल्याण के लिये भाव जगता है और इन गुणों के प्रति आस्था बनती है, गुणवानों के प्रति विनय जगती है वह विनय नाम का तप है, जिनकी सेवा होना आवश्यक है अथवा जो आचार्यगत गुरुजन हैं उनकी सेवा करना वैयावृत्य नाम का तप है । स्वाध्याय जिसमें अपने आत्मा का अभ्यास बने उस विधि से शास्त्रों का स्वाध्याय करना स्वाध्याय है । स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है और उस ज्ञान के बढ़ने पर अनेक लोग उस मार्ग से चलित हो जाते हैं ज्ञान के घमंड के कारण पर वह वैयावृत्य तप नहीं कहलाता । जहाँ केवल आत्महित का उद्देश्य है इसके लिए जहाँ स्वाध्याय है वह स्वाध्याय तप कहलाता है । व्युत्सर्गतप―शरीरादिक द्रव्यों से ममत्व त्याग कर देना, शरीर को ख्याल में ही न लेना वह व्युत्सर्ग तप है । और ध्यान नामक तप―ध्यान के अनेक भेद कहे जायेंगे । तो शुभ ध्यान में, शुद्ध ध्यान में अपने उपयोग को टिकाये रहना यह ध्यान तप नाम का तप है । इस प्रकार ये 6 अंतरंग तप हैं, जिनके कारण कर्मों की निर्जरा होती है

प्रायश्चित आदि तपों की अंतरंग तपरूपता का कारण―प्रायश्चित आदिक तप अंतरड्ग तप क्यों कहलाते हैं, इसका कारण है यह कि अन्य मतावलंबियों द्वारा इसका अभ्यास नहीं होता । जैन शासन में ही इन तपों की विधि व्यवस्था है । तथा इन्हें अन्य जन बोला भी नहीं करते, इनका पार नहीं पाया जाता । जितने भी अंतरंग में गहरे जायें उतने ही यहाँ आत्मगुणों के विकास के रत्न मिलते हैं । ये तप बाह्य द्रव्य की अपेक्षा नहीं करते । केवल भाव से इनका संबंध है । भले ही शास्त्र हैं, गुरुजन हैं इनका संग समागम होता है, किंतु प्रयोग भीतरी ही होता है । ये सब मन के व्यापार से चलते हैं, इस कारण इन तपों को अंतरंग तप कहते हैं । जैसे प्रायश्चित किया तो अपने आत्मा की शुद्धि ही तो हुई, भीतर निर्मल परिणाम बना, विनयभाव किया तो गुणों में जब तक अनुराग न हो तब तक विनय नहीं आ सकता सो यह भीतरी ही एक गुण विकास ही तो हुआ । किसी धर्मात्मा जीव की सेवा वैयावृत्य तब तक नहीं हो सकती जब तक आत्मा के गुणों का वात्सल्य न हो । तो वैयावृत्य से भी आत्मा का विकास ही तो पाया । स्वाध्याय तो प्रकट स्व का अध्ययन है । यह तो अंतरंग से ही संबंध रखता है । जहाँ सर्व पदार्थों की ममता छोड़ा, शरीर से भी ममत्व छोड़ा तो वहाँ निज अंतस्तत्त्व में उपयोग और अभिमुखता बनती है । तो अंतरंग से ही तो संबंध रहा । इसी प्रकार ध्यान में भी अपने आपके अंत: स्वरूप से ही संबंध रहता है । तो चूँकि इनका अपने आत्मा से ही संबंध है, बाह्य द्रव्य की अपेक्षा नहीं । अन्य जनों से इनका पालन नहीं हो पाता । इनका पार पाना कठिन है, इस कारण से इन तपों को अंतरंग तप कहा है । अब अंतरंग तपों के कितने भेद हैं? यह बात सूत्र में कहते हैं ।


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