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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-22

From जैनकोष



आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गपश्छेदपरिहारोपस्थापना: ।। 9-22 ।।

प्रायश्चित का फल व प्रायश्चित के प्रयोजन―प्रायश्चित नाम का तप 9 प्रकार का है । प्रायश्चित, शब्द के अर्थ क्या हैं, उनमें पहला अर्थ तो यह है कि प्राय: मायने साधु लोग उनका जिस कर्म में चित्त हो उसे कहते हैं प्रायश्चित । अथवा दूसरा अर्थ है प्राय: मायने अपराध और चित्त मायने शुद्धि । अपराध की शुद्धि करना प्रायश्चित है । प्रायश्चित का प्रयोजन क्या है? तो इसका पहला प्रयोजन है प्रमाद के दोष का निराकरण, याने विशेष कषाय न रहे, प्रमाद न रहे अथवा प्रमाद नाम का दोष लगा हो, उसका निराकरण हो जाये, इसके लिए प्रायश्चित समर्थ है । दूसरा प्रयोजन है परिणामों की निर्मलता । यह मनुष्य लौकिक गलतियों का पुंज है । जब तक उत्तम साधना न हो तब तक इसमें दोष होते ही रहते हैं । और दोष के होने से परिणामों में मलिनता होती है तो प्रायश्चित के कर लेने से परिणामों में ऐसा प्रसाद उत्पन्न होता है कि मानो अब मैं यथार्थ निर्दोष हूँ । प्रायश्चित करने वाले साधु आचार्य आदिक से जिनसे प्रायश्चित लेते हैं उनके वचनों पर पूर्ण श्रद्धा होती है । जो हुक्म हो उसका पालन कर लिया तो वहाँ कोई भी दोष न ठहरेगा । प्रायश्चित के बाद अपने को निर्दोष अनुभव किया जाता है । प्रायश्चित का तीसरा प्रयोजन है नि:शल्यता । कोई दोष बना हो और उसका, प्रतिकार न करे तो उसके चित्त में बराबर शल्य बना रहता है । जहाँ विधिपूर्वक आचार्य आदिक से निवेदन करे जो प्रायश्चित ग्रहण किया है उससे उनका शल्य समाप्त हो जाता है । प्रायश्चित का चौथा प्रयोजन है अव्यवस्था का निराकरण । यदि प्रायश्चित की पद्धति न हो तो कोई व्यवस्था ही न रह सकेगी । कोई कुछ भी करे, कैसा ही रहे उन दोनों का कोई चित्त में तो सब अव्यवस्था बन जायेगी । फिर कोई तीर्थ पद्धति ही नहीं रह सकती, क्योंकि दोष तो सबसे होते ही हैं और दोषों का निराकरण करने के लिये प्रायश्चित का विधान न हो तब तो शासन में कोई व्यवस्था नहीं रह सकती है प्रायश्चित का 5 वाँ प्रयोजन है मर्यादा का बनाये रहना । यदि मर्यादा को भंग कर दिया गया तब प्रगति नहीं हो सकती । जैसे घर में रहने वाले पुरुष यदि मर्यादा को भंग कर दें तो वहाँ ही व्यवस्था नहीं बनती । और सभी स्वच्छंद हो जायें, सभी दुःखी रहेंगे । तो मर्यादा भंग न हों सके यह एक बहुत बड़ा काम है, इसकी शुद्धि है, प्रायश्चित से । प्रायश्चित का छठा प्रयोजन है संयम की दृढ़ता होना । दोष होने पर यदि प्रायश्चित न हो तो होगा क्या कि वह ढीला पड़ता चला जायेगा और वह अनाचार तक पहुंच जायेगा । तो नियम में कोई दोष आये और उसका प्रतिकार न बने तो संयम में दृढ़ता की बात तो दूर रही उसको तो असंयम में पहुंचने की नौबत आ जाती है । प्रायश्चित का 7वां प्रयोजन है आराधना । अपने अनादि अनंत सामान्य कारण समयसार की आराधना बने, यह बात बनती है जब जबकि चित्त में किसी प्रकार की दुविधा नहीं रहती । संयम व्रत लेकर उसमें शिथिलता करे, दोष लगाये और उसका प्रायश्चित न ले तो उसके चित्त में दुविधा रहेगी, उसमें वह पात्रता न आएगी जिससे कि यह समयसार की आराधना कर सके । इसी प्रकार अनेक प्रयोजन हैं प्रायश्चित के, जिन प्रयोजनों की सिद्धि होने पर साधु मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ सकता है ।

आलोचना नामक प्रायश्चित तप करने की सामान्य विधि―अब इसके 9 भेद बतलाये जा रहे हैं । प्रायश्चित का प्रथम भेद है आलोचना । एकांत में बैठे हुए प्रसन्न मन वाले गुरु से शिष्य विनयसहित अपना निवेदन करता है और वहाँ 10 दोषों से रहित अपनी आलोचना करता है, एकांत में ही आलोचन युक्त बताया गया है क्योंकि बहुजनों के बीच आलोचना करने वाला साधु निशंक आलोचना न कर सकेगा । बैठे हुये गुरु से ही आलोचना की जानी चाहिये । खड़े हुये अथवा चलते हुए गुरुओं से आलोचना जैसा एक विशिष्ट तप नहीं किया जाता है । जब गुरु प्रसन्न चित्त से हों, किसी शिष्य पर दंडादिक व्यवस्था न कर रहे हों, क्रोध न कर रहे हों, प्रसन्न चित्त में हों, ऐसी स्थिति वाले गुरु से आलोचना की जाती है । यह शिष्य भी आलोचना का पात्र तब ही बनता है जब उसको देश और काल का परिचय हो । तो बहुत ही विनय सहित अपने प्रमाद का निवेदन करना कि गुरुदेव मुझ से यहाँ यह दोष बना है । सो वह निवेदन 10 दोषों से रहित होना चाहिये तब ही वह सत्य आलोचना है और आलोचना मात्र से कितने ही अपराध दूर हो जाया करते हैं । कुछ अपराध ऐसे होते हैं कि आलोचना भी करे और और प्रतिक्रमण भी करे तो वे 10 दोष कौन से हैं जिनको टालकर गुरुओं से आलोचना करना चाहिए ।

आलोचना में वर्जनीय दस दोषों का वर्णन―(1) जिन गुरु महाराज से आलोचना करना है उनको पहले कोई पुस्तक देना इसलिए कि उपकरण देने पर ये गुरु महाराज हमको प्रायश्चित हल्का देंगे, ऐसा चिंतवन करके उपकरण आदिक देना यह आलोचना का प्रथम दोष है । (2) गुरुजनों से ऐसे वचनों से अथवा भावों से दोष निवेदन करना कि हे गुरुदेव मैं प्रकृति से दुर्बल हूँ, रोगी हूँ, उपवास आदिक कठिन तप करने में असमर्थ हूँ, यदि आप कोई लघु प्रायश्चित दे तो मैं दोष का निवेदन करूँ, इस प्रकार का भाव रखना और वचन बोलना यह आलोचन का दूसरा दोष है । (3) तीसरा है मायाचार दोष । जो दोष दूसरों ने न देखा हो उस दोष को तो छिपा लेना और जो दोष दूसरों को मालूम पड़ गया हो वह दोष गुरु से बताना यह मायाचार नाम का दोष है । (4) आलोचना का चौथा दोष है स्थूल दोष प्रतिपादन । आलस्य से या प्रमाद से अथवा जान बूझकर सूक्ष्म अपराधों का परिचय कराने में उत्सुकता नहीं है जिस शिष्य के और वह स्थूल दोषों को ही बताये । तीसरे दोष में तो यह बताया था कि दूसरों ने जिस दोष को न देखा हो उसे छुपा लेना और जिस दोष को दूसरों ने देख लिया हो उसका निवेदन करना, और इस दोष में यह बात कही गई कि सूक्ष्म दोष भी बताना और स्थूल (मोटे) दोष भी बताना, इसमें दुःख नहीं, दुःख का कोई संबंध नहीं है । (5) पाँचवाँं का दोष है बड़े दोष को तो छिपा लेना, क्योंकि उसका कठिन प्रायश्चित होगा, ऐसा भय लगा है और छोटे दोष को कहना यह 5वाँ दोष है । (6) आलोचना का छठा दोष है गुरुपृच्छना―गुरु से इस प्रकार कहकर प्रायश्चित जानना कि महाराज यदि ऐसा दोष हो जाये तो उसका क्या प्रायश्चित होगा, ऐसी तरकीब से प्रायश्चित जान लिया और फिर उसको गुरु सेवा करते हुये चापलूसी से दोष कह देना यह छठवां दोष है । (7) सातवें दोष का नाम है पूर्व दोष कथन―पाक्षिक, चातुर्मासिक या वार्षिक प्रतिक्रमण के समय जहाँ पहले से मुनि विराजे हैं और सभी आलोचना कर रहे हैं और वहाँ शब्दों का कोलाहल भी है उसी बीच अपने भी दोष कह डालना यह 7वाँ दोष है । (8) आलोचना का 8वां दोष है अन्यसाधुपरि प्रश्न―गुरु के द्वारा दिया गया यह प्रायश्चित युक्त है या नहीं, ऐसा आगमवेद्य है या नहीं यों अन्य साधुओं से पूछना यह आठवां दोष है । शिष्य ने गुरु से निवेदन किया, गुरु ने प्रायश्चित दिया, अब अन्य साधुओं से पूछें तो इसके मायने है कि गुरु में आस्था श्रद्धा नहीं है और ऐसा दोष करके प्रायश्चित भी करे तो भी दोषशुद्धि नहीं होती है । (9) नवाँ दोष है कि जिस किसी उद्देश्य से अपने ही मुनियों में से जो मुनि शिथिलाचारी है उसी से ही दोष निवेदन कर लिया यह सोचकर कि यह भी ऐसे ही हैं जैसे कि हम दोष किया करते हैं तो एक जापता पूरा हो जायेगा, दोष कह डालें तो वह आलोचना का दोष है । (10) 10वां दोष है यह कि इसका जो अपराध था किसी मुनि का उसी के समान मेरा भी दोष है, सो जो इनको प्रायश्चित दिया गया वही प्रायश्चित मैं कर लूँगा, ऐसा अपने आप ही दोष का निवेदन किये बिना ही प्रायश्चित ले लेना यह 10वाँ दोष है ।

आलोचना तप का माहात्म्य―दोषपूर्वक कठोर भी प्रायश्चित ले तो भी निष्फल होता है । दोष का निवेदन तो निष्कपट भाव से बालक की तरह सरलता पूर्वक करना चाहिए और जब दोष हो जाये तो प्रायश्चित लेने के लिए अधिक समय का अंतर न करना चाहिये । शीघ्र ही उसका प्रायश्चित लेना चाहिए । तो जो साधु अपने मन में दोष को अधिक समय न रखे और सरलता पूर्वक गुरुजनों से दोष निवेदन करे तो उसके यह दोष नहीं लगता, उसके शुद्ध आलोचना होती है । गुरु महाराज जो प्रायश्चित देते हैं उसका पालन करने पर वह साधु निर्दोष हो जाता है । कोई मुनि गुरु से आलोचना करता है तो वह एकांत में करता है । आचार्य महाराज और आलोचना करने वाला साधु दो ही वहाँ विराजे होते हैं, किंतु आर्यिका अगर अपना प्रायश्चित लेना चाहे । दोष निवेदन करे तो वह दो व्यक्तियों में न होगा । चाहे वह खुले सार्वजनिक स्थान में कहे अन्यथा कम से कम तीन व्यक्ति होना ही चाहिये, क्योंकि वह स्त्री प्रसंग का समय है । आर्यिका केवल एक साधु से ही निवेदन करे एकांत में तो वह जैन शासन में युक्त नहीं बताया । यदि कोई लज्जावश या मेरा अपमान होगा आदिक के कारण कुछ थोड़े बहुत दोषों का निवेदन भी कर ले, यथार्थ न कहे, उनका शोधन न करे तो वह इस तरह दुःख का पात्र है जैसे कि अपनी आमदनी और खर्च का हिसाब न रखने वाले कर्जदार दुःखी हुआ करते हैं । कोई साधु बहुत दुर्धर तप करे तिस पर भी दोष होना संभव है, सो वह दुर्धर तप करके भी यदि आलोचना नहीं करता, गुरुजनों से अपने दोष निवेदन नहीं करता, उसको इष्ट फल न प्राप्त होगा याने मोक्षमार्ग में प्रगति न हो सकेगी । जैसे कि विवेचना से शरीर में मलशुद्धि किये बिना औषधि कोई खाये तो उसे इष्ट फल नहीं मिलता, जैसे कोई ऐसा तो बीमार है कि पेट अधिक खराब है और उसको तो उचित यह है कि उसे विवेचना औषधि पहले दी जाये ताकि थोड़े दस्त हों और पेट साफ हो, फिर उसे अन्य औषधि दी जाये तो वह फायदा करेगी ऐसे ही पहले तो आलोचना कर ली जाये और फिर प्रायश्चित ले तो उससे सिद्ध होगी । और यदि कोई साधु आलोचना करके भी गुरु के द्वारा दिये गए प्रायश्चित को नहीं करता तो वहाँ भी इष्ट सिद्धि नहीं है । जैसे कि जो किसान अपनी खेती को नहीं सम्हालता है, उसका निराना, गोड़ना आदि नहीं करता है तो उसको वह महान फल नहीं दे सकती । जो साधु आलोचना सहित चित्त से प्रायश्चित को ग्रहण करे तो वह ऐसा चमक जाता है, उसकी आत्मा ऐसी पवित्र बन जाती है जैसे कि मांगे हुए, साफ किए हुये दर्पण में रूप चमकता है, क्योंकि प्रायश्चित से नि:शल्यता हो जाती है । उसके जो दोष हुये थे वे पूर्णतया निकल गए, शुद्ध हो गए, अब मैं निर्दोष हूँ ऐसी भावना से वह अपने आपके अंत: स्वरूप में उपयोग देता है और निर्विकल्प ध्यान कर पाता है ।

प्रतिक्रमण व तदुभय नाम के प्रायश्चित―पाप के प्रतिकार को प्रतिक्रमण कहते हैं । कर्मोदय वश प्रमाद होने पर जो दुष्कृत हुआ है उसके प्रति यह मेरा दुष्कृत मिथ्या हो, इस प्रकार से व्यक्त किया हुआ जो प्रतिकार है उसे प्रतिक्रमण कहते हैं । देखिए कोई कर्म तो केवल आलोचना से ही नष्ट हो जाते हैं कोई कर्म प्रतिक्रमण से दूर होते हैं और कोई कर्म पाप चेष्टा ऐसी होती है कि आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों होने पर शुद्धि को प्राप्त होता है । तो तदुभय नामक तीसरा प्रायश्चित वह है जहाँ आलोचना के प्रतिक्रमण दोनों प्रायश्चित होते हैं । यहाँ शंका होती है कि यह बात तो जरा जंचती नहीं कि कोई साधु आलोचना न करे और केवल प्रतिक्रमण कर ले, प्रायश्चित कर ले । और, कहा भी है कि जो साधु आलोचना न करके अर्थात गुरु से अपना दोष प्रकट न करके कितने ही कठिन तप कर ले तो भी वह दोष निवृत्त नहीं होता । और अब यहाँ कहा जा रहा हैं कि कोई कर्म ऐसे होते हैं कि जिनकी शुद्धि केवल प्रतिक्रमण से हो जाती है तो यह बात तो अयुक्त जंच रही है और यह बात मान लेने पर कि आलोचना पूर्वक प्रायश्चित हुआ करता है तो तदुभय नाम का तीसरा प्रायश्चित बताना व्यर्थ है, क्योंकि सभी प्रायश्चित आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों से बनते हैं । उत्तर―बात आमतौर से यही है कि प्रतिक्रमण आलोचनापूर्वक ही होता है । शिष्य गुरु से अपने दोष निवेदन करे फिर गुरु ने जो बताया है प्रतिक्रमण उसे शिष्य करे, यों प्रतिक्रमण आलोचनापूर्वक ही होता है । कोई दोष ऐसे होते हैं जो केवल आलोचना करने से ही शुद्ध हो जाते हैं । ये सब अभी बतायेंगे कि कौन से दोष केवल आलोचना से दूर होते हैं, कौन से प्रतिक्रमण आदिक से पर जो यहाँ बताया जा रहा है कि केवल प्रतिक्रमण ही करे उसके दोष की निवृत्ति होती है, तो यह गुरु अथवा आचार्य के लिये ही, क्योंकि शिष्य तो अपने दोष गुरु से निवेदन करेगा और गुरु जो प्रायश्चित देंगे पालेंगे, पर गुरु स्वयं किससे दोष निवेदन करने जायें? तो केवल प्रतिक्रमण से शुद्ध हों यह बात गुरु महाराज के लिए है ।

विवेक, व्युत्सर्ग, छेद नाम के प्रायश्चितों का निर्देशन―विवेक नामक तप―अन्नपान एक दूसरें में मिल जाये या उपकरण आदिक का संयोग हो जाएं तो उसे पृथक् करना विवेक नाम के तप कहलाता है। जैसे किसी चीज का त्याग हो जो मांस आदिक दोष वाला नहीं है, सर्व साधारणजनों के काम आता है ऐसी कोई चीज भोजन में मिली हो और वह साधु को लेना नहीं है तो उसे अलग बराबर लेने वाले अन्न को ग्रहण कर लेना यह विवेक कहलाता हैं, और जैसे ठंडे उपकरण में कोई गरम उपकरण का संयोग हुआ हो तो उसे अलग करना यह उपकरणों के संसर्ग का विवेक है, व्युत्सर्ग नामक तप समय का नियम करके कायोत्सर्ग आदिक करना व्युत्सर्ग तप कहलाता है । जैसे मैं रात्रि में तीन घंटे खड़े ही खड़े ध्यान करूंगा, तो उसने तीन घंटे को कायोत्सर्ग कर लिया । शरीर से ममत्व का त्याग कर लिया, वैसे तो ममत्व का त्याग रात-दिन है पर काय से राग भी, चेष्टा भी, कोई प्रमाद भी न करना ऐसे व्युत्सर्ग को यहाँ तप कहा गया है । एक तपश्चरण नाम का भी प्रायश्चित होता है, सो तप पहले बताये गये हैं अनशन ऊनोदर आदिक, याने बाह्य तप भी प्रायश्चित के रूप में लिये जाते हैं । मेरा उपवास है या मेरा ऊनोदर है आदिक तप प्रायश्चित रूप में भी होते हैं । छेद नाम का प्रायश्चित्त―कोई साधु बहुत काल से दीक्षित हो और उससे कोई ऐसा अपराध बन जाये कि जो छेद नामक तप से ही शुद्ध हो सके उसको दिन, महीना आदिक के विभाग से दीक्षा का छेदन कर दिया जाता हे । जैसे कोई मुनि तीन वर्ष का दीक्षित है, अब उससे कोई ऐसा अपराध बन जाये कि जिससे उसकी कुछ दीक्षा छेद देनी चाहिए, तो आचार्य वहाँ मानो उसकी 6 माह की दीक्षा अलग कर दें अर्थात आज्ञा कर दें कि इसकी 6 माह की दीक्षा खतम की जाती है तो उसका अर्थ यह हुआ कि अब वह साधु ढाई वर्ष का दीक्षित कहलायेगा, उससे अंतर कहां पड़ता है? जैसे मानो कोई दूसरा साधु पौने तीन वर्ष का ही दीक्षित हो तो अभी तक तो यह उस तीन वर्ष के दीक्षित को पहले नमस्कार करता था, अब 6 माह की उसकी दीक्षा छेद दी जाने से वह पौने तीन वर्ष के दीक्षित को भी नमस्कार करने लगता, क्योंकि अब वह उसकी अपेक्षा छोटा हो गया । तो कितने ही ऐसे अपराध होते हैं कि जिनमें कुछ समय की दीक्षा का छेदकर दिया जाता है ।

परिहार एवं उपस्थापना नाम के प्रायश्चितों का निर्देशन―परिहार नाम का प्रायश्चित―कोई और भी कठिन अपराध हो तो पक्ष महीना आदिक काल की अवधि से उस मुनि को संसर्ग से दूर कर देता है और वह दूर-दूर ही रहता है, यह परिहार नाम का प्रायश्चित कहलाता है । इस प्रायश्चित से उसके अपराध की शुद्धि हो जाती है । यद्यपि यह मुनियों को प्राय: रुचिकर न होगा कि हमको साथ से अलग कर दें और हम 20 हाथ दूर बैठे या 20 हाथ दूर चला करें, संग में न आ सकें, यदि ऐसा कर दिया जाये तो उसके चित्त में बड़ा आघात पहुँचेगा, किंतु जो ज्ञानी मुनि हैं वह इसमें प्रसन्नता मानता है कि मेरा अपराध इस दंड से दूर हो जायेगा और मैं सच्चे मोक्ष मार्ग में प्रगति करूँगा वह इसमें दुःखी नहीं होता, वह प्रसन्न मन से परिहार तप ही क्या, सभी प्रायश्चितों को स्वीकार करता है । उपस्थापना नाम का तप―कोई अत्यंत ही कठिन अपराध हो जिसका कि शुद्ध करने का कोई उपाय नहीं है तो उसे उपस्थापना प्रायश्चित दिया जाता है । इस प्रायश्चित में महाव्रत मूल से ही भंग कर दिया जाता है और यह कह दिया जाता कि अब तुम को मुनिव्रत नहीं रहा, अब तुम साधारण जनों जैसे हो गए, ऐसा मूल छेद करके फिर उसे दीक्षा दिया यह उपस्थापना नाम का तप है । अब चाहे वह 12 वर्ष का भी दीक्षित हो, पर उसे उपस्थापना प्रायश्चित दिया हो और आज ही पुन: दीक्षा दिया हो तो वह आज दिन का (एक दिन का) दीक्षित कहलायेगा । इस प्रकार 9 तरह के प्रायश्चित होते हैं ।

किन-किन अपराधों में करणीय प्रायश्चितों का विवेचन―अब कौन सा प्रायश्चित किस-किस अपराध में दिया जाता है उसका थोड़ा दिग्दर्शन कराते हैं । विद्या और ध्यान के साधनों के ग्रहण करने में पूछे बिना, विनय बिना प्रवृत्ति करना ऐसा दोष है कि उसका प्रायश्चित सिर्फ आलोचना होता है । केवल दोष निवेदन कर दिया इससे ही शुद्ध हो जाता है । जैसे विद्या का साधन शास्त्र है । किसी समय जिसके पढ़ने का वह शास्त्र है, वह मुनि वहाँ नहीं है और उसके शास्त्र को उठाकर कोई दूसरा मुनि स्वाध्याय करने लगे तो उसके आ जाने पर झट वह निवेदन करने लगे कि माफ करना, मैंने बिना आपके पूछे आपका शास्त्र पढ़ने को उठा लिया, तो लो सिर्फ आलोचना से ही शुद्धि हो गई । जैसे यहाँ भी गृहस्थों से ऐसे कितने ही अपराध बनाते हैं कि जिन्हें केवल बता भर दिया, उसका कोई अधिक दंड नहीं लेना पड़ता । मानो किसी ने किसी का पेन उठाकर लिख लिया और उसके आने पर निवेदन कर लिया कि भाई माफ करना मैंने आपका पेन आप से बिना पूछे उठा लिया था । तो सिर्फ आलोचना से ही शुद्धि हो गई । ध्यान का साधन जैसे माला, आसन आदि किसी ने वर्त लिया तो उसने अपराध तो किया मगर वह इतना कठिन अपराध नहीं है कि उसे इसके लिये 10-12 दिन का उपवास लेना पड़े । एक आलोचना भर कर लो बस हो गया । तो यह आलोचना तप कहलाता है । पर शिष्यजन प्राय: अपने गुरूजनों से आलोचना करते हैं कि आज मुझ से यह अपराध हो गया । कुछ कर्त्तव्य ऐसे हैं कि वहाँ प्रतिक्रमण प्रायश्चित लेना होता है । जैसे जिस देश में, जिस समय में जो करने योग्य कर्त्तव्य हैं ऐसे विधानों को धर्म कथा आदिक में लगे रहने के कारण भूल जाये और उसे पुन: करे तो उसका प्रतिक्रमण प्रायश्चित है । प्रतिक्रमण नाम का प्रायश्चित―जहां केवल प्रतिक्रमण ही किया जाता है वह आचार्य या गुरूजनों को ज्यादह मौके मिलते हैं । किसी को उपदेश कर रहे या कोई धर्मकथा में लगे रहे, लो सामायिक न कर सके, देर हो गई, भूल गए तो उस प्रसंग के बाद ध्यान आया―तो मैं पुन: करूंगा, मैं प्रतिक्रमण लूंगा, यह उनका प्रायश्चित है । यदि कोई भक्ति के कारण महापुरुष में कोई दोष लगे या शीघ्रता के कारण भूल जाने से अथवा ज्ञान की कमजोरी से आपत्ति आने पर कोई महाव्रत में दोष लग जाये, कुछ हल्के वचन व्यवहार किया या जल्दी-जल्दी चलना पड़ा । ईर्या समिति में थोड़ा जल्दी आयी, महाव्रत में कोई दोष लगा तो ऐसा दोष लगने पर उसकी (1) आलोचना, (2) प्रतिक्रमण, (3) तदुभय, (4) विवेक, (5) व्युत्सर्ग और, (6) तप ये 6 प्रायश्चित हो सकते हैं, कोई साधु अपनी शक्ति को न छिपाकर बड़ी सावधानी और प्रयत्न से दोषों का परिहार कर रहा है, ऐसी सावधानी बर्तते हुये भी किसी कारणवश अप्रासुक पदार्थ माना अचित्त किया हुआ नहीं है वह स्वयं ग्रहण करने में आ जाये या दूसरे को ग्रहण करा दे या जिस चीज का त्याग कर रखा था ऐसी प्रासुक वस्तु का भी विस्मरण हो जाये और विस्मरण होने से ग्रहण में आ गई तो जब उसका स्मरण हो जाये कि ओह यह भूल हुई है तो उस चीज को पहले से त्याग कर देना यह प्रायश्चित है ।

कुछ विशेष अपराधों की व्युत्सर्ग प्रायश्चित से शुद्धि―कुछ अपराध ऐसे होते हैं कि जिनमें व्युत्सर्ग प्रायश्चित होता है । जैसे खोटा स्वप्न आ जाये तो उसका विशेष कायोत्सर्ग करना पड़ता हे । कोई यह पूछ सकता है कि इस पर किसका वश है । अगर सोते हुये में कोई खोटा स्वप्न आ गया तो इसमें उसका क्या अपराध―ऐसा कोई सोच सकता, मगर अपराध उसका यह है कि उसने जगते में, दिन में ऐसा कुछ भाव किया या संस्कार बनाया हल्के गंदे जिसके आधार पर उसको खोटा स्वप्न आया है । तो खोटा स्वप्न आने पर कायोत्सर्ग प्रायश्चित करना पड़ता है । कोई खोटी चिंता आ जाये, बुरा विचार आ जाये तो उसका प्रायश्चित कायोत्सर्ग है । कहीं अचानक किसी भी स्थान पर दस्तादिक हो जाये तो उसका भी कायोत्सर्ग तप है । मलोत्सर्ग किया है और उसके प्रतिष्ठापन समिति है पर योग्य स्थान पर ही करना चाहिए । किसी जगह बैठे हुये ध्यान कर रहे या अन्य किसी धर्मकार्य में ऐसी जगह मलोत्सर्ग हो जाये तो वह कायोत्सर्ग तप से शुद्ध होता है । ऐसे ही किसी बड़ी महानदी को पार किया अथवा महान अटवी को (जंगल को) पार किया तो नदी पार करने में सूक्ष्म जंतुओं को बाधा तो संभव है, और घने जंगल में तो कीड़े पतिंगे बहुत होते हैं, कितना ही शोधकर चलें फिर भी वहाँ चलने में शीघ्रता करना होता है । भयानक जंगल है, जल्दी चलें, दूसरे कुछ प्रमाद भी संभव है, तो ऐसे पाप का प्रायश्चित व्युत्सर्ग है ।

अति विशाल दोषों का प्रायश्चित उपस्थापना―अंतिम प्रायश्चित है उपस्थापना । इसके अंतर्गत कुछ और प्रकार से भी प्रायश्चित हैं । ये प्रायश्चित महान् अपराध होने पर दिये जाते हैं । जैसे कोई साधु आवश्यक कर्त्तव्यों में बार-बार प्रमाद करे ऐसा अपराध कर ले कि जो बहुत जनों ने देख लिया हो, क्योंकि बहुत जनों के द्वारा देखे गए अपराध को मान लो माफ कर दिया जाये तो उससे तीर्थ प्रवृत्ति खोटी होती है, उसका असर जनता पर बुरा पड़ता है । यदि जनता को यह मालूम पड़ जाये कि इस अपराध का दंड भोगना पड़ा है तो उससे तीर्थ प्रवृत्ति नहीं बिगड़ती । कोई पुरुष साधु आचार्य आदिक गुरुओं के विरुद्ध व्यवहार करे तो उसका यह कठिन प्रायश्चित देना होता है । अथवा विरुद्ध दृष्टि हो जाये, सम्यक्त्व की विराधना हो जाये तो ऐसे कठिन अपराध का उपस्थापना प्रायश्चित है, पर एक तो होता है पूर्ण उपस्थापना । महाव्रत को मूल से ही भंग कर दिया जाये, और कुछ इस ही के अंतर्गत दो प्रकार के प्रायश्चित और होते हैं―(1) अनुपस्थापन और, (2) पारंचिक । अनुपस्थापन तो कहलाता है किसी दूसरे आचार्य से प्रायश्चित छिन जाना । जिस संग में रहता है उस संग में आचार्य से प्रायश्चित लेना और आचार्य यदि दंड दें कि इसका प्रायश्चित तुम दूसरे आचार्य से लो, जो कुछ इससे थोड़ा हीन भी हो तो ऐसे छोटे आचार्य के पास जाकर प्रायश्चित ले तो यह तो कठिन दंड है । अपने संग में रहने वाले गुरु से दंड लेने में उतना अपमान नहीं है जितना कि किसी छोटे आचार्य से प्रायश्चित दिलाया जाये । तो यह उससे कठिन दंड है, पारंचिक प्रायश्चित वह कहलाता कि यह अपराधी तीन आचार्यों तक जाता है । एक आचार्य से निवेदन किया, उसने कुछ न दिया प्रायश्चित, दूसरे से निवेदन किया फिर तीसरे से निवेदन किया, ऐसे तीन आचार्यों तक उसके दोष की शुद्धि के लिये भेजा जाये याने 3 संघों को दोष विदित हो जाये फिर प्रायश्चित देना वह पारंचिक है और मूल से ही दीक्षा छेद दी जाये और फिर से ग्रहण करे दीक्षा, चाहे उस संघ वाला आचार्य है या पारंचिक विधि से अन्य आचार्य से दीक्षा ले यह सब उपस्थापना कहलाती है।

आस्था सहित गुरूपदिष्ट प्रायश्चितों से साधु की निर्दोषता का अभ्युदय―उक्त 9 प्रकार के प्रायश्चित दोष के दूर करने के लिए औषधि की तरह ग्रहण करना चाहिये । जैसे रोगी जब रोग से ग्रस्त हो गया तो प्रसन्न होकर वह औषधि खाता है इससे कि मेरा रोग दूर हो जाये और मैं निरोग हो जाऊँगा ऐसे ही जिस मुनि से अपराध बना है उस मुनि को जो दंड दिया जाता है वह प्रसन्न मन से औषधि की तरह उस दंड को भोगता है । लौकिकजन तो दुःखी होकर दंड भोगते हैं पर साधुजन खुश होकर दंड भोगते हैं । वे जानते हैं कि इस प्रायश्चित करने से हमारे शेष दूर हो जायेंगे और हम मोक्ष मार्ग में चलने के पूर्ण काबिल हो जायेंगे । सो ये 9 प्रायश्चित देश, काल, शक्ति और संयम आदिक के अविरुद्ध अपराध के अनुसार ग्रहण किये जाते हैं । यद्यपि जीव के परिणाम अनगिनते लोक प्रमाण हैं तो अपराध भी उतने ही हो जायेंगे, पर प्रायश्चित तो उतने नहीं हो सकते, क्योंकि प्रायश्चित तो एक पारलौकिक काम है और वे अपराध होना विपाक के अनुसार है, वे एक आटोमेटिक नहीं हैं, सो अपराध तो होते हैं अनगिनते, पर उन सबका प्रायश्चित इन 9 प्रकारों में गर्भित है । सो व्यवहारनय से उन समस्त अपराधों का वर्गीकरण करके कि यह अपराध इस दर्जे का है । यह अपराध इस दर्जे का है ऐसे 9 प्रकार के प्रायश्चित के दर्जे बनाकर 9 प्रकार से प्रायश्चित देना, ऐसा स्थूल रूप से निर्देश किया है, प्रायश्चित तप लेने वाला शिष्य गुरु महाराज पर पूर्ण श्रद्धा रखता है और उनके द्वारा बताये गये प्रायश्चित को लेता है, पर वह पूरा निर्णय रखता है कि जैसे मानो मैंने वह दोष ही न किया हो, इतनी शुद्धि हो गई हो । यदि कोई संदेहशील शिष्य है, उसे किसी अपराध पर गुरु महाराज ने कोई प्रायश्चित दिया है और वह शिष्य यदि सोचे कि इतने प्रायश्चित से मेरा दोष कैसे शुद्ध हो जायेगा तो वह उसका ठीक-ठीक पात्र नहीं है । शिष्य को क्या सोचना कि मुझे छोटा प्रायश्चित दिया या बड़ा, उसके लिए तो गुरुवचन प्रमाण हैं । जो भी प्रायश्चित दिया वह दोष की निवृत्ति करने में पूर्ण समर्थ है, ऐसी आस्था शिष्यजनों में हुआ करती है । आचार्य महाराज भी देश, काल, शिष्य का स्वास्थ, शिष्य की पात्रता, योग्यता देखकर उस अनुरूप प्रायश्चित देते हैं । जैसे मानो कोई शिष्य बड़ा विद्वान् है, संघ का मान्य है, अथवा रुग्ण है आदिक, तो उसे देखकर उस लायक उसको प्रायश्चित दिया जाता है । एक ही तरह का अपराध मानो 5 मुनियों ने किया हो तो यह जरूरी नहीं है कि आचार्य महाराज उन पांचों को एक समान प्रायश्चित दें । होंगे करीब-करीब समान, फिर भी उनकी योग्यता पात्रता की परिस्थिति निरखकर आचार्य प्रायश्चित देते हैं, पर शिष्य के चित्त में पूर्ण निर्णय रहता है कि जो गुरु महाराज ने कह दिया बस वही सत्य है और उससे मेरे समस्त दोषों की शुद्धि हो ही गई, ऐसी आस्था और विनयपूर्वक शिष्यजन आचार्य का शरण गहते हैं और अपने को निर्दोष चारित्र में प्रवर्ताते हुये मोक्ष मार्ग में चलते हैं ।


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