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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-33

From जैनकोष



निदानं च ।। 9-33 ।।

निदान नामक चतुर्थ आर्तध्यान का लक्षण न परिणाम―चौथा आर्तध्यान निदान है । किसी रोग के वश या तीव्र तृष्णा, कामवासना आदिक के कारण यह भावना होती है कि मेरे को इस तप के बदले, इस धर्मसाधना के बदले अगले भव में विषयों के सुख मिलें, ऐसी भावना को निदान कहते हैं । यह निदान आर्तध्यान बहुत खोटा आर्तध्यान है । मुनिजनों के प्रथम तीन, आर्तध्यान तो हो जायेंगे पर निदान नाम का आर्तध्यान मुनि के संभव नहीं है । यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि पहले विपरीत मनोज्ञस्य यह सूत्र आया है, जिसका अर्थ यह है कि इष्ट पदार्थ का वियोग होने पर उसका ही ख्याल बना रहना कब मिले, वह कहलाता है इष्ट वियोगज आर्तध्यान । तो निदान भी उसमें शामिल हो जायेगा, क्योंकि निदान में भी इष्ट पदार्थों के संयोग का चिंतन किया है । फिर इस निदान को कहने का क्या अर्थ है? समाधान―इष्ट वियोगज में और निदान में यह अंतर है कि वहाँ तो इष्ट पदार्थ जो पहले मिला हुआ था उसका हो गया वियोग । अब उसके संयोग के लिए ख्याल चल रहा है और निदान में वह चीज मिली ही नहीं है । कभी पहले प्राप्त नहीं हुई इस भव में, और आगे भव के लिए उसकी आशा की जा रही, बंधन बाँधा जा रहा यह है निदान । तो यों निदान में और इष्ट वियोगज आर्तध्यान में अंतर है । तो निदान तो अप्राप्त चीज की प्राप्ति के लिए होता है और इष्ट वियोगज प्राप्त का वियोग होने पर संयोग के लिये होता है । निदान में परभव के विषय सुख की आशा की जाती है । आसक्ति रहती है और अगले भव में हमको इष्ट पदार्थ मिलें, उसके लिए निरंतर चिंतन रहता है । इष्ट वियोग में तो जब इष्ट का वियोग होता तब ही ख्याल आता है, पर निदान में सदैव चित्त में यह बात रहती है कि मेरे को अगले भव में विषय सुख प्राप्त न हों । ये चारों आर्तध्यान, कृष्णलेश्या, नीललेश्या और कापोतलेश्या वाले जीवों के होता है । यह आर्तध्यान अज्ञान मूलक है । जहाँ भेद विज्ञान नहीं जगा है वहाँ इसकी प्रबलता रहती है । इस आर्तध्यान में जीव श्रम करता है और यह आर्तध्यान पाप का प्रयोग करने में आधार है, आर्तध्यानवश यह जीव पाप का भी प्रयोग करता है । इस आर्तध्यान में नाना सरूप बसे हुए हैं जिनसे व्याकुलता बनी रहती है । विषयों की तृष्णा उस आर्तध्यान में भीतर पड़ी हुई है । धर्म के आधार का यहाँ कोई काम ही नहीं है । कषायें विशेष भरी हुई हैं । अशांति बढ़ती है और पापकर्मों के कारण इनमें असातावेदनीय का बंध होता है । यह ध्यान तिर्यंच गति में ले जाने वाला है ।


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