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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-39

From जैनकोष



पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातीव्युपरतक्रियानिवर्तीनि ।। 9-39 ।।

शुक्लध्यान के चार प्रकारों का कथन―इस सूत्र में शुक्लध्यान के भेदों का निर्देश किया है । शुक्लध्यान चार प्रकार का है―(1) पृथक्त्ववितर्कवीचार, (2) एकत्ववितर्क अवीचार, ( 3) सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाती और, (4) व्युपरत क्रिया निवर्ति । तो चार के लक्षणों का संकेत आगे के सूत्रों में किया जायेगा पर शब्दों के अनुसार साधारणतया यह समझ लेना कि जो ध्यान पृथक्-पृथक् विषयों का ध्यान करे, पर करे एक ही पदार्थ के संबंध में और पृथक्-पृथक् योगों में रहकर करे, पृथक्-पृथक् शब्दों द्वारा करे तो वह प्रथम शुक्लध्यान है । जो ध्यान एक ही विषय पर ध्यान लगाये और उसमें शब्दों का भी परिवर्तन न रहे । योगों का भी परिवर्तन न रहे तो वह कहलाता है द्वितीय शुक्लध्यान । जब अरहंत भगवान के सूक्ष्म काययोग रह जाता है अंतिम क्षणों में उस समय सूक्ष्म काययोग के विनाश के लिए जो ध्यान होता है वह तीसरा शुक्लध्यान है और जब योग रहता ही नहीं है 14वें गुणस्थान में तो वहाँ चौथा शुक्लध्यान कहा जाता है । अब जो यह चार प्रकार का शुक्लध्यान है सो यह किस जीव के होता है, किस आलंबन से होता है, इसका वर्णन करने के लिये सूत्र कहते हैं ।


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