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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-46

From जैनकोष



पुलाकवकुशकुशीलनिर्ग्रंथस्नातका निर्ग्रत्थाः ।। 9-46 ।।

पांच प्रकार के साधक महान आत्माओं में पुलाक और वकुश मुनि के स्वरूप का दिग्दर्शन―निर्ग्रंथ 5 प्रकार के हैं―(1) पुलाक (1) वकुश (3) कुशील (4) निर्ग्रंथ और (5) स्नातक । (1) पुलाक मुनि वे कहलाते हैं जिनके उत्तर गुण की तो भावना है और व्रतों में भी कभी कहीं परिपूर्णता नहीं हो पाती है वे मुनि पुलाक कहलाते हैं । पुलाक कहते हैं बिना पके धान्य को । जैसे―धान्य धान्य ही है और वह कुछ अच्छी अवस्था में आया है पर अभी परिपूर्ण नहीं पका है ऐसी ही स्थिति पुलाक मुनि की है । तद्गुणों की केवल भावना है पर उत्तर गुणों में विकास नहीं है और मूल गुणों को तो धारण करते हैं । पर कभी किसी समय मूल गुणों में भी परिपूर्णता नहीं हो पाती वे मुनि पुलाक हैं, ऐसे मुनि भी पूज्य हैं क्योंकि निर्ग्रंथ दिगंबर हैं और समिति आदि गुणों का पालन करते हैं, पर साधु कहते ही उसे हैं जो साधना करे । साधना करते हुए में कोई दोष भी आ जाते हैं । पर पुलाक मुनि के दोष ऐसे स्थूल नहीं हैं जिनसे मुनि व्रत भंग हो जाये । (2) दूसरे मुनि हैं वकुश―जिनके मूल गुण अखंडित हैं । उत्तर गुणों में भी प्रवेश है, किंतु ऐसा ही कुछ संज्वलन कषाय का तीव्र उदय है कि शरीर और उपकरण की सजावट में उनका चित्त रहता है ऋद्धि और यश की कुछ कामना रहती है । सात और गौरव उनमें पाया जाता है, उनके चित्त से परिवार वृत्ति नहीं निकलती है । जिस संघ में रहते हैं वही उनका परिवार जैसा लगता है, अर्थात गुणों में जिनका दोष चलता रहता है इस कारण वे चित्रित हैं ऐसे ये मुनि वकुश मुनि हैं । इनका मूल गुण पूर्णतया अखंडित है । भले ही कुछ उत्तर गुणों में दोष आता है और कुछ गौरव, यश आदिक का लगार भी होता है फिर भी ये दिगंबर हैं और पूज्य हैं ।

पंच प्रकार के साधकों में अंतिम कुशील, निर्ग्रंथ व स्नातक भव्यात्मा के स्वरूप का दिग्दर्शन―तीसरे मुनि हैं कुशील । कुशील का अर्थ यहाँ खोटा नहीं है, पर निर्ग्रंथ दिगंबरता बहुत अधिक ऊँची होना चाहिए उस ओर से यहाँ कुशील नाम रखा गया है । ये दो प्रकार के होते हैं―(1) प्रति सेवना कुशील और (2) कषाय कुशील । जिनके परिग्रह की कुछ भावना है पर मूल गुण और उत्तर गुण में परिपूर्ण हैं, उत्तर गुणों की विराधना हो जाती है, ऐसे मुनिराज प्रतिसेवना कुशील कहलाते हैं, कषाय कुशील वे मुनि हैं जिनके अन्य कषायें तो सब वश में हो चुकी हैं, पर कभी संज्वलन कषाय जगने से कुछ चेष्टायें हो जाती हैं । जैसे गर्मी के समय में जंघाओं को धोना, मस्तक का प्रच्छालन करना, इस प्रकार की इच्छा जग जाती है ऐसे मुनि कषाय कुशील कहलाते हैं । (4) निर्ग्रंथ मुनि वे हैं जिनके इतनी मंद कषाय है कि जैसे पानी में खींची गई रेखा शीघ्र विलीन हो जाती है ऐसे ही जिनका कर्म का उदय बिलकुल अव्यक्त है और जिन्हें अंतर्मुहूर्त में ही केवलज्ञान और केवल दर्शन प्रकट होने वाला है ऐसे समाधिरत मुनि निर्ग्रंथ कहलाते हैं । (5) स्नातक अरहंत भगवान को कहते हैं । निर्ग्रंथ दिगंबर होने से यहाँ मुनि के भेदों में उनका नाम दिया है फिर भी उनसे कृतकृत्य हैं, चार घातिया कर्मों से रहित हैं, केवल ज्ञानादिक अतिशयों से शोभायमान हैं । शील के परिपूर्ण स्वामी हैं, ऐसे सयोग केवली भगवान स्नातक कहलाते हैं ।

पुलाक, वकुश व कुशील मुनिराजों के निर्ग्रंथपने का व्यपदेश―यहां एक प्रश्न होता है कि जैसे गृहस्थों को निर्ग्रंथ नहीं कहा जाता क्योंकि उनके चारित्र उत्कृष्ट नहीं है, तो इसी प्रकार पुलाक आदिक भी मुनि निर्ग्रंथ मुनि की अपेक्षा उत्कृष्ट नहीं है, मध्यम जघन्य जैसे भेदों के चारित्र हैं तो उन्हें निर्ग्रंथ न कहना चाहिए । केवल निर्ग्रंथ जैसा कि चौथे नंबर के प्रयोग में कहा है वे ही कहलायेंगे, बाकी मुनि निर्ग्रंथ नहीं कहला सकते । समाधान―श्रावक में और पुलाक आदिक मुनियों में बहुत अंतर है । ये सब दिगंबर हैं और उस साधु मार्ग की साधना में हैं । श्रावक गृहस्थ है, वस्त्र सहित हैं और उसकी क्रियायें और ही प्रकार हैं । एक संज्वलन कषाय के तीव्र मध्यम आदिक भेदों से तीन भेद पड़े हैं, पर इनके प्रत्याख्यानावरण कषाय नहीं है । सो भले ही निर्ग्रंथ मुनि की अपेक्षा इनका चारित्र अप्रकृष्ट है, तो भी ये निर्ग्रंथ ही कहलाते हैं । जैसे कि चारित्र अध्ययन आदिक का भेद होने पर भी सभी ब्राह्मणों को जाति की दृष्टि से ब्राह्मण का व्यवहार होता है इसी प्रकार पुलाक आदिक समस्त मुनियों में निर्ग्रंथ शब्द का प्रयोग होता है । संग्रहनय और व्यवहारनय की दृष्टि से कुछ गुणहीन साधुओं में भी निर्ग्रंथ शब्द का प्रयोग सबका संग्रह करने के लिए किया जाता है जैसे णमोकार मंत्र में णमोलोए सव्व साहूणं कहा जाता है, वे सर्व साधु कौन हैं? तो ये ही दिगंबरों में जो पुलाक वकुश आदिक भेद हैं वे सब भेद वाले साधु ही सब साधुओं में आते हैं, ये सभी मुनि भेषभूषा में समान हैं, सभी दिगंबर हैं, शस्त्र से रहित हैं, शुद्ध सम्यग्दृष्टि हैं अतएव पुलाक आदिक सभी निर्ग्रंथ कहलाते हैं । जैन शासन में निर्ग्रंथ रूप को प्रमाण माना गया है, तो भले ही कोई निर्ग्रंथ अपने व्रतों में कुछ थोड़ा हीन रहे तो भी उन मुनियों में निर्ग्रंथ शब्द का प्रयोग बनेगा श्रावकों में निर्ग्रंथ शब्द का प्रयोग नहीं बन सकता । ऐसा संदेह भी न किया जा सकेगा कि फिर तो जिस चाहे मिथ्यादृष्टि नग्न पुरुष में निर्ग्रंथ का प्रयोग किया जाने लगेगा । अरे उन मिथ्यादृष्टियों में न निश्चय सम्यक्त्व है, न व्यवहार सम्यक्त्व है, सम्यग्दर्शन रहित पुरुषों में निर्ग्रंथ शब्द का प्रयोग नहीं होता । जो सम्यग्दर्शन सहित नग्न दिगंबर हैं वे ही निर्ग्रंथ व्रती कहलाते हैं । हाँ ये जो भेद किए गए हैं पुलाक वकुश आदिक सो चारित्र गुण का क्रम विकास हो गया, क्रम से वृद्धि किस प्रकार होती है, यह तथ्य दिखाने के लिए इन पुलाक आदिक भेदों की यहीं चर्चा की गई है, अब इन पुलाक आदिक मुनियों में परस्पर क्या विशेषता है यह बताने के लिए सूत्र कहते हैं ।


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