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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 1

From जैनकोष



कीर्त्या महत्या भुवि वर्द्धमानं

त्वां वर्द्धमानं स्तुतिगोचरत्वम् ।

निनीष्व: स्मो वयमद्य वीरं

विशीर्ण-दोषाऽऽशय-पाश-बंधनम् ।।1।।

(1) वर्द्धमान स्वामी का स्तवन करने का संकल्प―इसका नाम युक्त्यनुशासन है । है तो यह महावीर स्वामी का स्तवन, किंतु इसमें वर्णन युक्तिपूर्वक है और इस ग्रंथ के इसी छंद में युक्त्यनुशासन का संकेत है । इस कारण इसकी प्रसिद्धि युक्त्यनुशासन के नाम से है । एक सूझ के अनुसार यहाँ एक प्रश्न होता है कि समंतभद्राचार्य ने 24 तीर्थंकरों की स्तुति की, जिसका नाम है वृहत᳭स्वयंभू स्तोत्र ꠰ उस स्तवन के बाद फिर कौनसी कसर रह गयी तो उस विषय में ऐसी झलक आती है कि मानो वृहत᳭स्वयंभू स्तोत्र तो भगवान की परीक्षा के लिए था कि मेरे द्वारा नमस्कार किए जाने योग्य कौन हो सकता है? और जब भली-भांति निर्णय कर लिया गया कि वीतराग सर्वज्ञ जिनेंद्रदेव ही स्तवन के योग्य हैं तब उसके बाद यह एक स्तवन प्रारंभ किया जा रहा है और इसमें महावीर जिनेंद्र की स्तुति है । सो 24 तीर्थंकरों के स्मरण के बाद यह निर्णय किया गया कि स्तवन योग्य तो ये जिनेंद्र हैं, तब यह स्तवन प्रारंभ हुआ । इस स्तवन में कहते हैं प्रथम छंद में कि हे वीर जिनेंद्र ! अब में इस लोक में महान कीर्ति से बढ़े हुए तुम वर्द्धमान स्वामी को जो कि दोषों के जाल से बंधन से विमुक्त है, दोष-जाल जिसने नष्ट कर दिया है, ऐसे तुमको मैं आज स्तुति का विषय बनाता हूँ अर्थात् आपके स्तवन का मैं संकल्प करता हूँ । इसमें जो ‘अद्य’ शब्द दिया है, अब मैं, आज मैं, इससे ही यह झलक होती है कि स्तवन तो पहले भी किया, क्योंकि जो भक्तिप्रधान पुरुष हैं वे करते ही हैं, लेकिन वह सब स्तवन एक स्याद्वाद और स्याद्वाद से बहिर्भूत शासन, उन दोनों की मानो मीमांसारूप था और अब मैं, हे प्रभु ! आपका स्तवन करता हूँ, आपको स्तवन का विषय बनाता हूँ, विषयपने को ले जाता हूँ । इससे यह ध्वनित हुआ कि अब प्रभु का स्तवन समंतभद्राचार्य एक विधानपूर्वक करते हैं ।

(2) प्रभु की वर्द्धमानता―प्रभु का वर्द्धमान नाम क्यों ? वह इस विशेषण से जाना जाता है कि इस लोक में बहुत बड़ी कीर्ति से बढ़े हुए चले जा रहे थे और बढ़े हुए थे । बढ़े हुए को वर्द्धमान कहा करते हैं । सो यहाँ वीर जिनेंद्र को संबोधन करके स्तवन किया गया है । वीर मायने क्या है? वीर शब्द में तीन अक्षर हैं―वि, ई और र । वि का अर्थ है विशिष्ट, बहुत अधिक । ई का अर्थ है लक्ष्मी, ज्ञानलक्ष्मी और र का अर्थ है देने वाला । एक धातु है र जिसका रूप चलता है राति । राति का अर्थं है ददाति । जो विशिष्ट ज्ञानलक्ष्मी को दे उसे कहते हैं; वीर । तो ऐसे हे वीर जिनेंद्र ! आप वीर हो, क्योंकि जो आपके गुणों का स्तवन करता है, स्मरण करता है उसे विशिष्ट ज्ञानलक्ष्मी प्राप्त होती है । अब विशेषण दिया है―विशीर्ण-दोषाऽऽशयपाश-बंधनम्, याने दोष और दोषों के आशय मायने पाप मिथ्यात्व । दोष और दोषाशय एक समान शब्द होने से एक का लोप हो जाता है । तो दोष से अर्थ हुआ कषायों का, रागद्वेष का और दोषाशय से मतलब हुआ मिथ्यात्व का याने समस्त मोहनीयकर्म के जाल को, बंधन को जिसने तोड़ दिया । बंधन तो मोहनीय ही है । इस जीव को बाँधने वाला और कोई नहीं । यह अमूर्त पदार्थ है । इसे कोई दूसरा बांध ही कैसे सकता है? कभी किसी ने आकाश को भी बाँधा क्या? तो जब आकाश न बंध सका तो कोई दूसरा मूर्त या अमूर्त कोई पदार्थ इस आत्मा को कैसे बांधेगा?

(3) मौह का विकट बंधन―शंका―बंधन तो दिख रहा है । यह शरीर में है, शरीर से बाहर नहीं बैठ सकता, नहीं आ सकता । शरीर का दृढ़ संबंध बन रहा । तो पकड़ रखा ना शरीर ने जीव को ? सो उत्तर यह है कि नहीं पकड़ रखा । इस जीव ने ही शरीर को पकड़ रखा, यों कह दीजिए । जब दो का एक जगह बंधन है तो इस ओर से ही क्यों देखा जा रहा है कि शरीर ने जीव को जकड़ रखा? इस ओर से क्यों नहीं देखते कि जीव ने शरीर को जकड़ रखा है और कहो शुरूआत हुई है भाव से, यहीं से है तो अनादि से सब, मगर जीव ही जब स्वयं राजी है शरीर में रहने के लिए; संकट आये, मरण जैसा अवसर आये तो यह नहीं मरना चाहता अर्थात् शरीर में ही फंसना चाहता । तो जहाँ भीतर में यह आशय पड़ा है कि यही मेरा सर्वस्व है, तो ऐसा आशय जब आत्मा का बन गया तो आखिर आत्मा तो एक ईश्वर है, बड़ा समर्थ है, तो जब इतना आशय बन गया तो क्या इतनी बात न बनेगी कि बस जैसी इस जीव ने इस शरीर में एक आत्मीयता का संकल्प किया, इस संकल्प के कारण बंध जावे । इसका नमूना है कि आज बँधा हुआ है । अब तक बंधा हुआ चला आ रहा है । कोई कहे कि मैं अभी सोचता हूँ कि मैं शरीर से न्यारा हूँ, मैं शरीर नहीं, फिर तो शरीर से अलग हो जाऊँगा ना? सो उसका यह सोचना, सोचना तो होगा, मगर भीतर में वह भेद त्वरित न बन पायेगा, क्योंकि चिरकाल के संस्कार से शरीर में जकड़ाव का आशय बना रखा है ꠰ टूटेगा शरीर, अलग होगा शरीर; यह तो दो द्रव्यों के बीच की एक बात है ।

(4) मोह के विकट बंधन से छूटने का उपाय―कैसे यह बंधन टूटेगा ? उस तरह ही टूटेगा, बड़ी समाधि भावना चाहिए, बहुत भेदबुद्धि चाहिए, और जितना अनादि से इसने खोटा पौरुष किया उसके एवज में कुछ काल तो दृढ़ता का पौरुष चाहिए कि वह केवल अपने को ज्ञानमात्र अनुभवता रहे । खुद भी सोच सकते हैं कि हम अपने में ज्ञानमात्र ही अनुभव कर रहे हैं क्या? कहां देखते ? किन्हीं पदार्थों का हमें ध्यान आता, किसी की ही बात सोचते, कुछ से कुछ ही किया करते । तो यह जकड़ाव देह में आत्मीयता के कारण बना हुआ है । तो इसके तोड़ने के लिए प्रथम तो अभिप्राय में सुधार करना होगा । अभिप्राय का सुधार हो तो सम्यग्दर्शन कहलाता है । तो सम्यक्त्व हुआ तो मिथ्यात्व दूर हुआ और उसके बाद जो समाधिभाव बनता है उससे रागद्वेष दूर होते हैं ।

(5) अनन्यचेतस्क होकर प्रभु की भक्ति के संकल्प की झांकी―हे प्रभु ! जिन्होंने दोष और दोषाशय के

जाल बंधन को नष्ट किया है ऐसे हे प्रभु ! अब मैं आपको स्तवन का विषय बनाता हूँ, स्तवन के गोचरपने को ले जाता हूँ । इसमें कितना रहस्य बना है कि मैं आपको स्तवन के विषयभूत रूप से ले जाता हूँ । कितनी प्रभु के प्रति अनन्यता है, अभेदरूपता है कि डरते-डरते ही कहा जा रहा । बड़े ऊँचे सभ्य बनावटी बातों में नहीं कहा जा रहा, किंतु मानो जैसे इस भक्त के बहुत ही एक भीतरी भाव में हो, इस तरह के भाव से उठा हुआ यह शब्द है कि लो, अब मैं आपको स्तवन के गोचररूप से ले जाता हूँ । भाव यह हुआ कि ग्रंथकार ने वीर जिनेंद्र के स्तवन की इसमें प्रतिज्ञा की है ।



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